भारत की वैश्विक उपस्थिति: शक्ति, छवि और औपनिवेशिक विमर्श का टकराव
भूमिका: 21वीं सदी को भारत की सदी कहा जा रहा है, लेकिन वैश्विक विमर्श, मीडिया और प्रतिष्ठित संस्थानों में भारत की उपस्थिति कहीं न कहीं अनदेखी, सीमित और कभी-कभी नकारात्मक भी दिखती है। TIME, Forbes, The Economist जैसी वैश्विक पत्रिकाओं में भारत की भूमिका या तो विवादों तक सीमित है या फिर उसे एक 'उभरते लेकिन अनिश्चित' राष्ट्र के रूप में चित्रित किया जाता है। यह विरोधाभास केवल मीडिया पूर्वग्रह नहीं, बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक, औपनिवेशिक और वैचारिक संरचना का परिणाम है। यह लेख इसी गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करता है: भारत की शक्ति, उसकी वैश्विक छवि, और औपनिवेशिक विमर्श के प्रभावों के बीच अंतर्द्वंद्व क्या हैं?
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I. भारत की वास्तविक स्थिति: शक्ति या भ्रम?
1. आर्थिक और सामरिक शक्ति:
भारत आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वह रक्षा, अंतरिक्ष, डिजिटल टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप्स, औद्योगिक विकास, ऊर्जा और AI जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण खिलाड़ी है। ISRO की उपलब्धियाँ, डिजिटल इंडिया की सफलता और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन इसके उदाहरण हैं। भारत G20 की अध्यक्षता कर चुका है और अब अफ्रीकी संघ जैसे संगठनों के साथ नेतृत्व साझा कर रहा है।
2. कूटनीतिक संतुलन:
भारत ने रूस, अमेरिका, फ्रांस, इजराइल, जापान और खाड़ी देशों के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से टकराव के बावजूद भारत की वैश्विक स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर और सम्मानजनक बनी हुई है।
3. वैश्विक भूमिका:
भारत संयुक्त राष्ट्र, BRICS, SCO, QUAD और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय है। वह अब 'विकासशील' नहीं, बल्कि 'उभरती महाशक्ति' के रूप में पहचाना जाता है।
तो फिर प्रश्न उठता है: इतनी शक्ति के बावजूद भारत की वैश्विक छवि सीमित क्यों है?
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II. वैश्विक मीडिया में भारत की अनुपस्थिति और पूर्वाग्रह:
1. TIME और Forbes की दृष्टि:
TIME की 'Most Influential People', Forbes की 'Powerful Nations', या The Economist की वैश्विक रिपोर्टों में भारत अक्सर या तो अनुपस्थित होता है या फिर उसे नकारात्मक घटनाओं के संदर्भ में देखा जाता है। CAA, किसान आंदोलन, कश्मीर, अल्पसंख्यक मुद्दे और धार्मिक टकरावों को मुख्य फ़ोकस बनाया जाता है।
2. मीडिया पक्षपात (Media Bias):
अमेरिका और यूरोप के प्रमुख मीडिया संस्थान भारत को 'अव्यवस्थित लोकतंत्र', 'धार्मिक राष्ट्रवाद' और 'मानवाधिकारों के उल्लंघनकर्ता' के रूप में चित्रित करते हैं। सकारात्मक पहलुओं – जैसे डिजिटल पेमेंट्स, स्टार्टअप संस्कृति, पर्यावरणीय नेतृत्व, या वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व – को बहुत कम स्थान मिलता है।
3. नैरेटिव पर नियंत्रण का अभाव:
भारत के पास कोई अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ नेटवर्क नहीं है जो Al Jazeera, CGTN या Russia Today की तरह वैश्विक परिप्रेक्ष्य से भारतीय दृष्टिकोण रख सके। भारत का नैरेटिव अकसर पश्चिमी लेंस से तय होता है, न कि उसकी अपनी संस्कृति या दृष्टिकोण से।
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III. पूर्वोत्त्यवादी (Orientalist) और औपनिवेशिक विमर्श का प्रभाव:
1. औपनिवेशिक कल्पना:
ब्रिटिश राज के दौरान भारत को एक 'उजड़ी हुई लेकिन प्राचीन' सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया गया। वह रहस्यमय, आध्यात्मिक, जातिवादी और अव्यवस्थित देश के रूप में देखा गया जिसे 'सभ्यता' और 'आधुनिकता' केवल ब्रिटेन ने सिखाई।
2. आज भी वही विमर्श:
आज TIME, BBC, NYT, या हॉलीवुड फिल्मों में भारत की छवि एक पौराणिक, भ्रमित, आध्यात्मिक लेकिन अविकसित देश की बनी हुई है। स्लम, धार्मिक टकराव, और योग जैसे प्रतीकों से भारत को अब भी एक “अतीत में जीता देश” माना जाता है।
3. पश्चिमी शैक्षिक संस्थानों में भारत:
ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, LSE जैसे विश्वविद्यालयों में भारत पर अध्ययन का केंद्र अब भी औपनिवेशिक सोच से ग्रस्त है। वामपंथी, उत्तर-औपनिवेशिक और सेकुलर विमर्शों के ज़रिये भारतीय समाज को जातिवादी, पितृसत्तात्मक और साम्प्रदायिक दिखाया जाता है, परंतु इसकी सकारात्मक पक्ष – जैसे ग्राम्य लोकतंत्र, पारंपरिक ज्ञान, वैदिक विज्ञान – को हाशिए पर डाल दिया जाता है।
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IV. आधुनिक भारत और दोहरा संकट: शक्ति है, पर छवि नहीं
1. Brand India की विफलता:
'Incredible India' और 'Digital India' जैसे अभियान सफल हुए हैं, लेकिन वे वैश्विक मीडिया विमर्श में स्थायी छवि नहीं बना सके। कारण यह है कि भारत ने अपने 'नैरेटिव इंफ्रास्ट्रक्चर' पर निवेश नहीं किया।
2. प्रवासी भारतीयों की भूमिका:
भारतवंशी आज वैश्विक कंपनियों, विश्वविद्यालयों और सरकारों में प्रभावशाली हैं – लेकिन भारत ने कभी उन्हें संगठित रूप से 'ब्रांड एंबेसडर' के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।
3. आत्महीनता की विरासत:
औपनिवेशिक पाठ ने भारतीय मानस में यह बैठा दिया कि श्रेष्ठता पश्चिम से आती है – इसलिए भारत अपने मूल्यों और उपलब्धियों को आत्मविश्वास से प्रस्तुत नहीं कर पाया।
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V. समाधान और भारत का मार्गदर्शन:
1. वैश्विक मीडिया नेटवर्क:
भारत को BBC या Al Jazeera की तर्ज पर एक वैश्विक मीडिया मंच स्थापित करना चाहिए जो भारतीय दृष्टिकोण को पेश करे।
2. शैक्षणिक विमर्श निर्माण:
भारतीय विचारकों, भाषाशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों में भारतीय सभ्यता और राजनीति पर पढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए।
3. वैश्विक साहित्य और सिनेमा:
भारत को अपनी कथा कहने के लिए साहित्य, फिल्म, वेबसीरीज और डॉक्युमेंट्रीज़ का उपयोग करना होगा। जैसे कोरिया ने K-Pop, तुर्की ने टीवी सीरियल्स और चीन ने फिल्म इंडस्ट्री के ज़रिए किया।
4. संस्कृति आधारित कूटनीति:
योग, आयुर्वेद, भारतीय खानपान, भारतीय संगीत, और शास्त्रों के ज़रिये वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करना होगा।
5. ब्रांड इंडिया को पुनर्परिभाषित करना:
भारत को केवल 'आध्यात्मिक गंतव्य' के रूप में नहीं बल्कि 'तकनीकी, वैज्ञानिक, और वैचारिक शक्ति' के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
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निष्कर्ष: भारत आज जिस दुविधा में है, वह केवल बाह्य शक्ति की नहीं बल्कि आत्मछवि और वैश्विक कथा के स्वामित्व की है। जब तक भारत अपनी कहानी स्वयं नहीं लिखेगा, तब तक TIME और Forbes जैसी संस्थाएँ उसे उनके नजरिए से ही परिभाषित करती रहेंगी। औपनिवेशिक पाठ की जड़ें आज भी गहराई से मौजूद हैं – उन्हें तोड़ने के लिए भारत को अपनी शक्ति के साथ-साथ अपने विमर्श का भी स्वामी बनना
होगा। तभी भारत केवल एक 'महाशक्ति की आकांक्षा' नहीं, बल्कि 'वास्तविक और सम्मानित महाशक्ति' बन सकेगा।









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