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🇳🇵 नेपाल की नई सरकार: महत्त्वाकांक्षा बनाम दिशाहीनता

नेपाल की नई सरकार: महत्त्वाकांक्षा बनाम दिशाहीनता नेपाल की नई सरकार महत्त्वाकांक्षा बनाम दिशाहीनता 🔶 प्रस्तावना हिमालय की गोद में स्थित नेपाल आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ बड़ी आकांक्षाएं और नीतिगत असमंजस साथ-साथ चल रहे हैं। 🔶 सत्ता और अस्थिरता नेपाल की राजनीति गठबंधन और सत्ता-संतुलन पर आधारित हो चुकी है। सरकारें बनती हैं, गिरती हैं और फिर बनती हैं। नीतियों में निरंतरता की कमी दीर्घकालिक योजनाओं का अभाव राजनीतिक अवसरवाद का प्रभाव 🔶 महत्त्वाकांक्षा: विकास का सपना नेपाल खुद को भारत और चीन के बीच एक “ब्रिज नेशन” बनाना चाहता है। हाइड्रोपावर में निवेश पर्यटन का विस्तार अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी 🔶 दिशाहीनता: नीति की कमजोरी महत्त्वाकांक्षाओं के बावजूद, जमीन पर क्रियान्वयन कमजोर है। विदेश नीति में असंतुलन युवाओं का पलायन निवेश का अभाव 🔶 भारत के...

सीमा पर कर और पड़ोसी रिश्ते—नेपाल की नई नीति का अर्थ क्या है

शीर्षक: सीमा पर कर और पड़ोसी रिश्ते—नेपाल की नई नीति का अर्थ क्या है? नेपाल की राजनीति में बदलाव की चर्चाओं के बीच हाल के दिनों में एक और मुद्दा सुर्खियों में है—सीमा क्षेत्रों में खरीदारी और परिवहन से जुड़े नए कर प्रावधानों की बात। कहा जा रहा है कि 100 रुपये से अधिक की खरीद पर कर लगाया जा रहा है और भारतीय वाहनों पर भी शुल्क बढ़ाने जैसे कदम सामने आ रहे हैं। इन खबरों ने स्वाभाविक रूप से India और Nepal के बीच संबंधों को लेकर बहस को तेज कर दिया है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सीमा पर कर या कस्टम ड्यूटी जैसे प्रावधान किसी भी देश की आर्थिक नीति का सामान्य हिस्सा होते हैं। नेपाल जैसे छोटे और आयात-निर्भर देश के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करे और स्थानीय बाजार को संतुलित रखे। यदि सीमा पार से बिना नियंत्रण के सस्ती वस्तुएँ आती रहें, तो घरेलू व्यापारियों पर उसका सीधा असर पड़ता है। इसी संदर्भ में 100 रुपये से अधिक की खरीद पर कर की चर्चा को देखा जाना चाहिए। यह कदम सीमा क्षेत्रों में अनौपचारिक व्यापार को नियंत्रित करने और राजस्व संग्रह बढ़ाने की कोशिश...

मेयर रहते बालेन शाह का भारत के प्रति रुख—राष्ट्रवाद, प्रशासन और वास्तविकता

नेपाल की नई पीढ़ी की राजनीति में Balen Shah एक चर्चित नाम बनकर उभरे हैं। काठमांडू के मेयर के रूप में उनका कार्यकाल केवल शहरी प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके बयानों और फैसलों ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बहस को भी प्रभावित किया। खासकर India के प्रति उनके रुख को लेकर कई तरह की धारणाएँ सामने आई हैं—जिनमें कुछ तथ्य आधारित हैं, तो कुछ अतिशयोक्ति। मेयर रहते बालेन शाह की छवि एक सख्त प्रशासक की रही, जो नियमों को लागू करने में हिचकिचाते नहीं थे। अवैध निर्माण पर कार्रवाई, सार्वजनिक स्थानों से अतिक्रमण हटाना और प्रशासनिक अनुशासन स्थापित करना—ये उनके प्रमुख कदम रहे। इन नीतियों का भारत से सीधा कोई संबंध नहीं था, लेकिन उनके कुछ बयान और निर्णय ऐसे रहे जिन्होंने भारत-नेपाल संबंधों पर चर्चा को जन्म दिया। सबसे अधिक चर्चा उनके राष्ट्रवादी रुख को लेकर हुई। कई मौकों पर उन्होंने नेपाल की संप्रभुता और स्वाभिमान की बात जोर से उठाई। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर दिए गए कुछ बयानों को भारत के प्रति सख्त रुख के रूप में देखा गया। हालांकि, इन बयानों को आधिकारिक नीति नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह एक युवा नेता की...

भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध

भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध आज उस मुकाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ उन्हें केवल द्विपक्षीय सहयोग के दायरे में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह संबंध दरअसल बदलती हुई विश्व-व्यवस्था का दर्पण है—एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एशिया की ओर खिसक रहा है और जहाँ मध्यम शक्तियाँ (middle powers) अपनी स्वतंत्र भूमिका गढ़ रही हैं। भारत और दक्षिण कोरिया इसी नई कूटनीतिक भाषा के दो सशक्त अक्षर हैं, जो मिलकर वैश्विक राजनीति की नई इबारत लिख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में तीव्र परिवर्तन देखने को मिले हैं। चीन का उभार, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन संघर्ष और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का बढ़ता सामरिक महत्व—इन सभी ने देशों को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया है। ऐसे समय में भारत की “Act East Policy” और दक्षिण कोरिया की “New Southern Policy” का संगम केवल नीतिगत सामंजस्य नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि का संकेत है। यह दृष्टि प्रतिस्पर्धा के बजाय संतुलन और सहयोग पर आधारित है। आर्थिक मोर्चे पर यह संबंध और भी अधिक ठोस दिखाई देता है। दक्षिण कोरि...

🌍 भारत-ईरान तनाव और संभावित वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य

भारत और Iran से जुड़ी हालिया भू-राजनीतिक हलचलों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या विश्व राजनीति एक नए मोड़ की ओर बढ़ रही है। सतह पर यह संकट भले ही क्षेत्रीय दिखाई दे, पर इसके भीतर वैश्विक शक्ति-संतुलन के बदलते समीकरण छिपे हैं। विशेष रूप से United States और Iran के बीच बढ़ता अविश्वास, तथा China और Russia की सक्रिय उपस्थिति, इस पूरे परिदृश्य को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप दे सकती है। वास्तविक चिंता किसी तात्कालिक युद्ध की नहीं, बल्कि उस “धीमी दरार” की है जो विश्व व्यवस्था की बुनियाद में पड़ती दिखाई दे रही है। पिछले तीन दशकों से विश्व एक प्रकार की एकध्रुवीय स्थिरता का आदी रहा है, जिसमें United States की केंद्रीय भूमिका थी। किंतु अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं। China आर्थिक शक्ति के रूप में चुनौती दे रहा है, जबकि Russia अपने भू-राजनीतिक प्रभाव को पुनर्स्थापित करने में लगा है। ऐसे में यदि Iran पर दबाव बढ़ता है, तो वह स्वाभाविक रूप से इन शक्तियों के साथ अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करेगा। यह स्थिति विश्व को एक नए प्रकार की खेमेबंदी की ओर ले जा सकती है—एक ऐसी खेमेबंदी, जो पा...

🌏 तीसरी से छठी अर्थव्यवस्था: उभरते भारत की छलांग या वैश्विक दबावों का प्रतिबिंब?

  🌏 तीसरी से छठी अर्थव्यवस्था: उभरते भारत की छलांग या वैश्विक दबावों का प्रतिबिंब? पिछले एक दशक में India की अर्थव्यवस्था को लेकर एक दिलचस्प लेकिन जटिल कथा सामने आई है। कभी भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर बताया जाता है, तो कभी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आकलनों में उसकी स्थिति पाँचवीं या छठी के आसपास दिखाई देती है। यह विरोधाभास केवल आंकड़ों का भ्रम नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन, आर्थिक संरचनाओं और रणनीतिक दबावों का मिश्रित परिणाम है। यह समझना आवश्यक है कि “तीसरी” और “छठी” अर्थव्यवस्था का अंतर कैसे उत्पन्न होता है। यदि हम GDP (Nominal) के आधार पर देखें, तो भारत आमतौर पर पाँचवें या छठे स्थान के आसपास रहता है। लेकिन यदि Purchasing Power Parity (PPP) के आधार पर मूल्यांकन किया जाए, तो India पहले से ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसका अर्थ यह है कि यह गिरावट का नहीं, बल्कि मापदंडों (metrics) के अंतर का मामला भी है। फिर भी, इस अंतर के पीछे छिपी गहरी आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की आर्थिक यात्रा एक ऐस...

🌏 “भारत को चीन नहीं बनने देंगे”: अमेरिकी दृष्टि, वैश्विक शक्ति-संतुलन और उभरते भारत की परीक्षा

 अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ वाक्य केवल बयान नहीं होते, बल्कि वे पूरी रणनीति का संकेत बन जाते हैं। United States के कुछ नीति-निर्माताओं द्वारा व्यक्त यह धारणा—कि “भारत को चीन नहीं बनने देंगे”—ऐसा ही एक संकेत है। यह वाक्य अपने भीतर कई परतें समेटे हुए है: शक्ति-संतुलन की चिंता, आर्थिक प्रतिस्पर्धा का भय, और वैश्विक व्यवस्था को नियंत्रित रखने की इच्छा। इस कथन को समझने के लिए आवश्यक है कि हम इसे केवल भारत–अमेरिका संबंधों के संदर्भ में न देखें, बल्कि व्यापक वैश्विक परिदृश्य में रखकर विश्लेषण करें। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि China का उदय अमेरिका के लिए क्यों चुनौती बना। पिछले तीन दशकों में चीन ने जिस गति से औद्योगिक, तकनीकी और आर्थिक विकास किया, उसने उसे वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्र बना दिया। वह “दुनिया की फैक्ट्री” बन गया, और कई महत्वपूर्ण संसाधनों—विशेषकर rare earth minerals—पर उसका नियंत्रण स्थापित हो गया। इस स्थिति ने United States के लिए एक ऐसी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी, जिसे वह पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाया। यही अनुभव अमेरिका को सावधान करता है। वह नहीं चाहता कि कोई दूसरा...

🔥 “At the Blazing Zenith of Global Opportunism, India Stands Tested”

  🌏 विश्व राजनीति में अवसरवाद के मध्याह्न में तपता भारत: शक्ति, दबाव और अस्तित्व का संघर्ष 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति एक ऐसे दोपहर के समय में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ सूर्य सिर पर है—तेज, कठोर और बिना किसी छाया के। यह “मध्याह्न” केवल समय का संकेत नहीं, बल्कि उस स्थिति का प्रतीक है जहाँ वैश्विक शक्तियाँ अपने-अपने हितों के लिए पूरी तीव्रता से सक्रिय हैं। इस तपते हुए परिदृश्य में India एक ऐसे राष्ट्र के रूप में खड़ा है, जो न केवल उभर रहा है, बल्कि लगातार परखा भी जा रहा है। इस वैश्विक “मध्याह्न” के दो सबसे प्रखर स्रोत हैं— United States और China । दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल आर्थिक या सैन्य नहीं रही; यह तकनीक, व्यापार, समुद्री मार्गों, और वैश्विक संस्थाओं के नियंत्रण तक फैल चुकी है। इस प्रतिस्पर्धा का सीधा असर उन देशों पर पड़ता है, जो न तो पूरी तरह किसी एक के साथ हैं, और न ही पूरी तरह अलग—और भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत की स्थिति को समझने के लिए “दो पाटन के बीच” वाली कहावत सबसे उपयुक्त प्रतीत होती है। एक ओर अमेरिका, जो भारत को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है,...

🏹 “शिखंडी” की आड़ में खेल: अमेरिका–चीन की बिसात पर भारत और पाकिस्तान

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  “दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई”—आज यह कहावत केवल एक लोक-वाक्य नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की सच्चाई बन चुकी है। एक ओर United States की पुरानी महाशक्ति, दूसरी ओर China का उभरता वर्चस्व—और इनके बीच खड़ा India । लेकिन इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प और चिंताजनक भूमिका निभाता है Pakistan —जो कई बार महाभारत के Shikhandi की तरह सामने खड़ा दिखाई देता है। महाभारत में शिखंडी स्वयं युद्ध का निर्णायक नायक नहीं था, लेकिन उसकी आड़ लेकर भीष्म जैसे महायोद्धा को रोका गया। आज की भू-राजनीति में भी कुछ ऐसा ही दृश्य उभरता है—जहाँ भारत के सामने सीधे टकराने के बजाय, एक “मध्यवर्ती दबाव” बनाया जाता है। और यही भूमिका पाकिस्तान निभाता हुआ दिखाई देता है। चीन के लिए यह रणनीति स्पष्ट है। China ने पाकिस्तान को केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक रणनीतिक औजार में बदल दिया है—चाहे वह आर्थिक गलियारा हो, सैन्य सहयोग हो या कूटनीतिक समर्थन। भारत के साथ सीधे युद्ध का जोखिम उठाए बिना, चीन पाकिस्तान के माध्यम से एक स्थायी दबाव बनाए रखता है। यह “दो मोर्चों” की स्थिति भारत के संसाधनों, रणनीति और ध्यान को लगातार व...

🌍 अमेरिका की वैश्विक नीति: शक्ति, पूर्वाग्रह और हितों की राजनीति का विश्लेषण

 “दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई”—यह कहावत आज की वैश्विक राजनीति पर असाधारण रूप से सटीक बैठती है। एक ओर United States की स्थापित महाशक्ति, दूसरी ओर China का उभरता वर्चस्व; और इनके बीच खड़ा India —एक ऐसी शक्ति जो बढ़ना भी चाहती है और बचना भी। इसी समीकरण में Russia एक दिलचस्प भूमिका निभाता है—कभी संतुलनकर्ता, कभी अवसरवादी, और कई बार तटस्थ दिखाई देने वाला खिलाड़ी। आज की दुनिया में टकराव केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि सप्लाई चेन, तकनीक, समुद्री मार्गों और आर्थिक नियमों के माध्यम से हो रहा है। अमेरिका और चीन के बीच यह प्रतिस्पर्धा खुली लड़ाई नहीं, बल्कि “धीमी लेकिन गहरी खींचतान” है। अमेरिका चाहता है कि उसकी बनाई वैश्विक व्यवस्था कायम रहे, जबकि चीन उस व्यवस्था को चुनौती देकर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। इस संघर्ष का सबसे बड़ा प्रभाव उन देशों पर पड़ता है, जो न तो पूरी तरह किसी एक के साथ हैं, और न ही पूरी तरह अलग—और भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत की स्थिति जटिल है। वह अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी करता है—इंडो-पैसिफिक, रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी—लेकिन साथ ही वह अपनी स्वतंत...

नस्लीय सोच, वैश्विक शक्ति और भारत का विकास: क्या अमेरिका की नीतियाँ भारत को बाधित कर रही हैं?

 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति को केवल शक्ति-संतुलन या आर्थिक प्रतिस्पर्धा के नजरिए से समझना अधूरा है। इसके भीतर एक और परत मौजूद है—विचारधारा, मानसिकता और पूर्वाग्रहों की। कई विश्लेषकों का मानना है कि United States की कुछ नीतियों और व्यवहार में एक प्रकार की “श्रेष्ठताबोध” (superiority complex) और कहीं-कहीं “नस्लीय सोच” के संकेत दिखाई देते हैं। यह सोच केवल सामाजिक या सांस्कृतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वैश्विक कूटनीति और आर्थिक नीतियों में भी परिलक्षित होती है। इसी संदर्भ में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह मानसिकता भारत जैसे उभरते राष्ट्रों—विशेषकर India —के आर्थिक विकास को अप्रत्यक्ष रूप से बाधित कर रही है। इस विषय को समझने के लिए सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “नस्लीय सोच” का अर्थ केवल प्रत्यक्ष भेदभाव नहीं होता। कई बार यह सोच नीतियों, प्राथमिकताओं और व्यवहार के पैटर्न में छिपी होती है। उदाहरण के लिए, किन देशों को प्राथमिकता दी जाती है, किन पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, और किनके साथ उदारता बरती जाती है—इन सभी में एक वैचारिक झुकाव देखा जा सकता है। Donald Trump के...

🌏 अमेरिका: भारत के लिए चुनौती, अवसर और कूटनीतिक परीक्षा—एक विस्तृत विश्लेषण

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21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति का स्वरूप बदल चुका है। अब यह केवल सैन्य ताकत का खेल नहीं, बल्कि आर्थिक प्रभाव, समुद्री मार्गों, तकनीकी वर्चस्व और कूटनीतिक चालों का जटिल मिश्रण है। इस बदलते परिदृश्य में United States , China और India तीन ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बीच संतुलन ही वैश्विक व्यवस्था को परिभाषित करता है। आम धारणा यह है कि अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती चीन है, लेकिन एक गहराई से देखने पर यह भी स्पष्ट होता है कि अमेरिका की नीतियाँ भारत के लिए भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं। बल्कि कई बार यह चुनौती अधिक जटिल और सूक्ष्म रूप में सामने आती है। भारत के संदर्भ में अमेरिका की भूमिका दोहरी रही है—एक ओर वह रणनीतिक साझेदार के रूप में सामने आता है, वहीं दूसरी ओर वह अपने आर्थिक और सामरिक हितों के लिए दबाव की राजनीति भी करता है। यही द्वंद्व भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। जब हम इस चुनौती को समझने की कोशिश करते हैं, तो हमें केवल व्यापारिक विवाद या सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को देखना होगा, जिसमें समुद्री चोकपॉइंट्स, ऊर्जा निर्भरता, वै...

भारत के आर्थिक विकास पर अमेरिकी गिद्ध दृष्टि : मलक्का से हारमुज तक

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  21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था को समझने के लिए केवल जीडीपी, उद्योग या जनसंख्या के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं; असली खेल उन समुद्री मार्गों में छिपा है जिनसे होकर दुनिया का अधिकांश व्यापार गुजरता है। इन मार्गों में कुछ ऐसे संकीर्ण बिंदु हैं, जिन्हें “चोकपॉइंट्स” कहा जाता है—जहाँ से गुजरना अनिवार्य है, लेकिन विकल्प सीमित हैं। भारत जैसे उभरते आर्थिक राष्ट्र के लिए ये चोकपॉइंट्स केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता से सीधे जुड़े हुए हैं। विशेष रूप से Strait of Malacca और Strait of Hormuz ऐसे ही दो बिंदु हैं, जिनके बिना भारत की वर्तमान आर्थिक संरचना की कल्पना अधूरी है। मलक्का जलडमरूमध्य एशिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में गिना जाता है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया तथा वैश्विक व्यापार के लिए एक केंद्रीय कड़ी का काम करता है। भारत का दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों—सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम आदि—के साथ जो व्यापारिक संबंध है, उसका बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से संचालित होता ...

ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों को पाँच दिनों के लिए

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  विश्व राजनीति में कई बार घटनाएँ गोलियों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि शब्दों से दिशा बदलती हैं। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपने Truth Social अकाउंट पर किया गया एक ऐसा ही बयान अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है। इस बयान में उन्होंने ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों को पाँच दिनों के लिए टालने की बात कही। यह घोषणा सतही तौर पर शांति की ओर बढ़ता कदम प्रतीत होती है, लेकिन गहराई में जाने पर यह एक जटिल रणनीतिक संकेत के रूप में सामने आती है, जो केवल दो देशों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ईरान और अमेरिका के संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही दोनों देशों के बीच अविश्वास की गहरी खाई बनी हुई है। समय-समय पर यह तनाव आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य टकरावों और कूटनीतिक गतिरोध के रूप में सामने आता रहा है। हाल के वर्षों में यह टकराव और अधिक तीव्र हुआ है, विशेष रूप से ऊर्जा प्रतिष्ठानों को लेकर। आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल चुकी है, जहाँ केवल सैनिकों या सीमाओं पर हमला ही पर्याप्त नहीं मा...

फारस से ईरान तक: टूटन, परिवर्तन और पहचान की कहानी

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फारस से ईरान तक: टूटन, परिवर्तन और पहचान की कहानी   प्राचीन काल में ईरान , जिसे कभी “फारस” कहा जाता था, मानव सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में था। यहाँ की संस्कृति का आरंभ प्रागैतिहासिक काल से होता है और धीरे-धीरे यह आकेमेनिड साम्राज्य जैसे विशाल साम्राज्य में विकसित हुई। साइरस महान और दारायस जैसे शासकों के समय यह सभ्यता अपने चरम पर पहुँची—जहाँ प्रशासन, कानून, धर्म और कला का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। यह वह दौर था जब पहली बार “विश्व-सम्राज्य” की अवधारणा आकार ले रही थी। इस प्राचीन ईरान की आत्मा उसके धर्म— जोरास्ट्रियन धर्म —में बसती थी। यहाँ जीवन को अच्छाई और बुराई के संघर्ष के रूप में देखा गया, जहाँ मनुष्य को नैतिक चयन करना होता है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। इसी दर्शन ने ईरानी समाज को एक नैतिक आधार दिया, जिसमें सत्य, न्याय और धर्म प्रमुख थे। समय के साथ ईरान में पार्थियन साम्राज्य और फिर सासानी साम्राज्य का उदय हुआ। सासानी काल को ईरानी संस्कृति का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। इस समय स्थापत्य कला, मूर्तिकला और शिल्प अपने चरम पर थे— पर्सेपोलिस जैसे ...