ईरान-इजराइल संघर्ष और तमाशबीन अमेरिका: एक भू-राजनीतिक सर्कस
परिचय: मध्य पूर्व का रंगमंच और पॉपकॉर्न की महफिल
मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक रंगमंच फिर से गुलज़ार है। ईरान और इजराइल, दो प्राचीन सभ्यताओं के वारिस, एक-दूसरे पर मिसाइलें और ड्रोन बरसाकर मानो कोई हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर का क्लाइमेक्स रच रहे हों। लेकिन इस तमाशे का असली मज़ा दर्शक दीर्घा में है। अमेरिका, जो खुद को विश्व शांति का मसीहा कहता है, VIP बालकनी में बैठा पॉपकॉर्न चबा रहा है। एक हाथ में इजराइल के लिए $3.8 बिलियन का सैन्य सहायता चेक, दूसरे में ईरान के लिए “कूटनीति” का खोखला भाषण। तमाशबीन? अरे, मित्र, ये तो सर्कस का सूत्रधार है, जो तमाशे को चलाए रखने में माहिर है। इस बीच, अरब देश, जो कभी फिलिस्तीन के लिए सड़कों पर उतरते थे, अब चुपके से अब्राहम समझौते की माला जप रहे हैं। और भारत? वो गुटनिरपेक्ष नीति का झंडा बुलंद किए, चाबहार बंदरगाह और राफेल सौदों के बीच संतुलन साध रहा है, जैसे कोई कूटनीतिक जादूगर जो बवाल में भी शांति का रास्ता ढूंढ ले।
इस तमाशे का केंद्र है इब्राहिम—वह पितामह, जिसे यहूदी, ईसाई, और मुस्लिम तीनों अपना कहते हैं। कुरान में सूरह इब्राहिम, बाइबिल में अब्राहम, और तोराह में अव्राहम—सब उसे एकता का प्रतीक मानते हैं। लेकिन आज उनके “बेटे”—इश्माइल और इसहाक के वंशज—एक-दूसरे के खिलाफ हथियार उठाए हैं। इजराइल ईरान को अपने अस्तित्व का खतरा बताता है। ईरान “ज़ायोनी शासन” को मिटाने की कसम खाता है। अमेरिका, इब्राहिम की ईसाई विरासत का दावा करते हुए, हथियार बेचकर मुनाफा कमा रहा है। अरब देश पेट्रोडॉलर के गणित में उलझे हैं, और भारत अपनी गुटनिरपेक्ष नीति के साथ क्षेत्रीय स्थिरता का मंत्र जप रहा है। सवाल यह है: क्या यह तमाशा कभी खत्म होगा, या इब्राहिम की एकता का सपना हमेशा के लिए धुंध में खो जाएगा?
ब्लॉककोट: “अमेरिका वो रिंगमास्टर है, जो तमाशा चलाता है, पॉपकॉर्न खाता है, और हथियारों का बिल भेजता है।”
अमेरिका की तमाशबीन नौटंकी: हथियार बेचो, शांति का ढोंग करो
अमेरिका की भूमिका को समझने के लिए किसी रॉकेट साइंस की ज़रूरत नहीं—बस एक हॉलीवुड थ्रिलर देख लीजिए, जहां डबल-एजेंट हीरो आग लगाता है और फिर उसे बुझाने का नाटक करता है। अमेरिका इजराइल को हर साल $3.8 बिलियन की सैन्य सहायता देता है—F-35 जेट, बम, और मिसाइल डिफेंस सिस्टम की पूरी फेहरिस्त। अप्रैल 2024 में, जब ईरान ने इजराइल पर 300 ड्रोन और मिसाइलें दागीं, अमेरिका ने इजराइल की हवाई रक्षा में मदद की, लेकिन साथ में बयान दिया, “हम युद्ध नहीं चाहते।” अरे भाई, तो इतने हथियार किसके लिए? 2015 का परमाणु समझौता (JCPOA) 2018 में ट्रम्प के “महान” फैसले से धराशायी हो गया, और बाइडेन प्रशासन 2022 से वार्ता को पुनर्जनन देने में नाकाम रहा। फिर भी, अमेरिका “कूटनीति” की बात करता है, जैसे कोई बच्चा होमवर्क भूलकर “कल कर लूंगा” का बहाना बनाए।
लेकिन असली मज़ा तो अमेरिका के हितों में है। मध्य पूर्व में तेल और हथियारों का बाज़ार अमेरिका की अर्थव्यवस्था का इंजन है। सऊदी अरब और खाड़ी देशों को 2023 में $2.4 बिलियन के हथियार सौदे किए गए, और इजराइल को थमाए गए हथियारों का हिसाब कौन रखे? यह तमाशबीन नीति नहीं, मित्र—ये सुनियोजित स्क्रिप्ट है। अमेरिका न सिर्फ तमाशा देखता है, बल्कि उसका टिकट भी बेचता है। एक तरफ इजराइल को ढाल बनाकर ईरान को “शैतान” बताता है, दूसरी तरफ खाड़ी देशों को हथियार बेचकर तेल की पाइपलाइन सुरक्षित करता है। और जब गाजा में बम गिरते हैं या सीरिया में हवाई हमले होते हैं, तो अमेरिका बस बयान जारी करता है: “हम शांति चाहते हैं।” तंज ये है कि शांति की बातें तो ठीक हैं, लेकिन हथियारों का ट्रक कभी रुकता नहीं।
ब्लॉककोट: “अमेरिका शांति की बात करता है, लेकिन हथियारों का बिल भेजना कभी नहीं भूलता।”
अरब देशों की चुप्पी: अब्राहम समझौता या पेट्रोडॉलर का गणित?
अरब देशों की खामोशी देखकर लगता है, मानो उन्होंने फिलिस्तीन का झंडा फ्रिज में रखकर इजराइल के साथ चाय-पकौड़े की महफिल जमा ली हो। 2020 का अब्राहम समझौता—जिसमें UAE, बहरीन, और मोरक्को ने इजराइल के साथ “दोस्ती” की—इब्राहिम की साझा विरासत का ढोंग कम, पेट्रोडॉलर और अमेरिकी हथियारों का सौदा ज़्यादा है। सऊदी अरब, जो कभी इजराइल को “दुश्मन नंबर 1” कहता था, अब चुपके से गैस पाइपलाइन और डील की बात कर रहा है। फिलिस्तीन का मसला, जो कभी अरब दुनिया का जज़्बा था, अब बस ट्विटर पर हैशटैग बनकर रह गया है। इब्राहिम के दो बेटों—इश्माइल (मुस्लिमों के पूर्वज) और इसहाक (यहूदियों के पूर्वज)—का इतिहास तो कुरान और तोराह में गर्व से दर्ज है, लेकिन आज अरब देश तमाशे में ताली बजा रहे हैं।
अब्राहम समझौता, जिसे धार्मिक एकता का प्रतीक बताया गया, असल में भू-राजनीतिक शतरंज की चाल है। UAE और बहरीन ने इजराइल के साथ व्यापार और पर्यटन बढ़ाया, लेकिन फिलिस्तीन के लिए उनकी आवाज़ धीमी पड़ गई। सऊदी अरब ने औपचारिक रूप से समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए, लेकिन 2024 में उनके अनौपचारिक सहयोग की खबरें सामने आईं। यह चुप्पी इब्राहिम की एकता की बात नहीं, बल्कि तेल, सुरक्षा, और अमेरिकी छत्रछाया का गणित है। तंज ये है कि अरब देशों ने फिलिस्तीन का झंडा छोड़कर पेट्रोडॉलर की माला जपनी शुरू कर दी है।
ब्लॉककोट: “अरब ने फिलिस्तीन का झंडा फ्रिज में रखकर अब्राहम समझौते की माला जपनी शुरू की।”









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