महबूबा मुफ्ती का पाखंड: आतंकियों के आँसू और पंडितों के आंसू में फर्क क्यों?

 

महबूबा मुफ्ती का पाखंड: आतंकियों के आँसू और पंडितों के आंसू में फर्क क्यों?

जब कोई नेता उस ज़मीन पर खड़ा होकर कश्मीरी पंडितों की वापसी की बात करे जहाँ से वे 1990 में आतंकवाद की आग में जिंदा जलाकर भगाए गए थे, तो एक उम्मीद जागती है। लेकिन जब वही नेता आतंकवादियों के घरों में मातमपुर्सी करते हुए दिखाई दे, तो सवाल उठना लाज़िमी है — क्या यह हमदर्दी है या महज़ एक और राजनीतिक नौटंकी?

मुफ़्ती का दिखावटी दर्द

महबूबा मुफ्ती का कहना है कि भाजपा ने कश्मीरी पंडितों को एक राजनीतिक मोहरा बना दिया है। लेकिन क्या उन्होंने खुद कभी पंडितों की वापसी के लिए कोई ईमानदार प्रयास किया? क्या उन्होंने उन परिवारों से मुलाक़ात की जिनके परिजन आतंकियों द्वारा मारे गए? उनके लिए आतंकी “शहीद” हैं और भारत सरकार “दमनकारी ताकत”।

महबूबा मुफ्ती और आतंकियों के परिवार

महबूबा मुफ्ती और आतंकियों के परिवार के साथ मुलाकात

महबूबा मुफ्ती आतंकियों के परिवार के साथ
महबूबा मुफ्ती आतंकियों के परिवार के साथ मुलाकात करती हुई।
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यह तस्वीर महबूबा मुफ्ती द्वारा आतंकियों के परिवारों के प्रति सहानुभूति और समर्थन की राजनीति को दर्शाती है।

style="color: #b30000; font-family: Mangal, Arial, sans-serif;">आतंकियों के आँसू: मुफ़्ती की राजनीतिक रणनीति

जब कोई आतंकी मारा जाता है, महबूबा मुफ्ती तुरंत ट्वीट करती हैं, उसे “गुमराह नौजवान” कहती हैं और उसके परिवार से मिलती हैं। लेकिन जब राहुल भटन जैसे कश्मीरी पंडित शिक्षक की हत्या होती है, तो मुफ़्ती मौन साध लेती हैं। क्या ये पक्षपात नहीं?

मुफ़्ती के लिए आतंकी “मानवाधिकार पीड़ित” हैं, लेकिन पंडितों के लिए उनके पास एक शब्द भी नहीं।

पंडितों की वापसी से डर क्यों?

मुफ़्ती जानती हैं कि अगर पंडित लौटते हैं, तो 1990 की सच्चाई फिर सबके सामने आ जाएगी। उनकी वापसी उस “एक धर्म, एक विचारधारा” के मिथक को तोड़ेगी जो वर्षों से घाटी में पनपाया गया है। इसलिए वह चुपचाप विरोध करती हैं या बयान देकर उसे नकारा बनाने का प्रयास करती हैं।

राजनीतिक अवसरवाद की मिसाल

जब अनुच्छेद 370 हटाया गया, तो महबूबा ने कहा “हम तिरंगा नहीं उठाएँगे।” यही तिरंगा पंडितों की एकमात्र शरण रहा है। उनके पूरे राजनीतिक जीवन का आधार अलगाववादी मानसिकता और आतंक के प्रति नरमी रहा है।

मुफ़्ती और आतंकी सोच का गठजोड़

महबूबा मुफ्ती ने कभी पाकिस्तान की आलोचना खुलकर नहीं की, न कभी घाटी में कट्टर इस्लामी सोच पर हमला बोला। बल्कि वे बार-बार कहती हैं कि कश्मीर में “गुस्सा” है। सवाल ये है: गुस्सा किसे है — पंडितों को या उनके हत्यारों को?

पंडितों की वापसी कश्मीर की अंतरात्मा का पुनर्जागरण है — और यही मुफ़्ती जैसे नेताओं को डराता है।

निष्कर्ष

महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं की राजनीति दोगलेपन, कट्टरपंथ से सहानुभूति, और राष्ट्रविरोधी विचारधारा की पोषण पर टिकी है। उनकी कथित “पंडित हमदर्दी” एक नकली मुखौटा है, जो तभी सामने आता है जब घाटी में वोट बैंक हिलता है।

कश्मीरी पंडितों की वापसी सिर्फ पुनर्वास नहीं, 1990 की आतंकी मानसिकता की पराजय का प्रतीक होगी। और यही बात महबूबा मुफ्ती को सबसे अधिक बेचैन करती है।

अब समय है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी को सिर्फ नीतिगत नहीं, बल्कि वैचारिक विजय के रूप में देखा जाए — एक ऐसी विजय, जो आतंक और उसके हमदर्द नेताओं को इतिहास के काले पन्नों में दफ्न कर दे।

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