भारत के लिए 'एकला चलो रे' का दौर
भारत के लिए 'एकला चलो रे' का दौर
विदेश नीति में आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता का नया अध्याय
1. प्रस्तावना
रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध पंक्ति – "यदि कोई साथ न दे, तो अकेले चलो" – आज भारत की विदेश नीति में मूर्त रूप लेती प्रतीत होती है। वैश्विक व्यवस्था के जटिल होते समीकरणों में भारत अब अपने निर्णयों का निर्धारण किसी गुट के प्रभाव में नहीं, बल्कि अपनी ज़मीनी आवश्यकताओं और वैश्विक यथार्थ के आधार पर कर रहा है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की अगुवाई की। शीतयुद्ध के दौरान भारत ने दोनों महाशक्तियों से दूरी बनाए रखी। 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की लहर के साथ भारत की विदेश नीति अधिक व्यावहारिक होती गई।
3. मोदी युग की विदेश नीति
2014 के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति को 'मल्टी-एलायंस, नो-एलायंस' रणनीति में बदला। रूस के साथ परंपरागत संबंध, अमेरिका से सामरिक भागीदारी, और चीन के साथ जटिल तनाव – सभी को संतुलित करते हुए भारत अब एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभर रहा है जो अपने हितों को प्राथमिकता देता है।
4. भारत की विदेश नीति टाइमलाइन (1947–2025)
5. वैश्विक ताकतों से भारत की स्थिति तुलना
6. निष्कर्ष
‘एकला चलो’ अब केवल कविता नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक सोच का हिस्सा बन चुका है। भारत अब अवसर आधारित जुड़ाव (issue-based alignment) के पक्षधर के रूप में उभर रहा है — जो न तो पूरी तरह से किसी गुट में शामिल है और न ही पूरी तरह से तटस्थ। यही भारत की नई वैश्विक पहचान है – आत्मनिर्भर, सक्रिय और स्वाभिमानी।









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