भारत के लिए 'एकला चलो रे' का दौर

 भारत के लिए 'एकला चलो रे' का दौर

नाम से शुरू हुआ विदेशनीति का सफर अब कर बहियां बल अपने पर आ पहुंचा

1. प्रस्तावना: 'एकला चलो रे' – एक नीति का रूपांतरण

'एकला चलो रे' – रवींद्रनाथ टैगोर की यह कालजयी पंक्ति कभी व्यक्तिगत साहस का प्रतीक थी। पर आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह भारत की विदेश नीति का संकेत बनती जा रही है।

1947 में स्वतंत्र भारत ने गुटनिरपेक्षता को अपनाया – न पश्चिम का साथ, न पूर्व का झुकाव। यह नीति नैतिक थी, पर व्यावहारिकता से दूर। 21वीं सदी में यह नीति पुनराविष्कृत हो रही है – अब भारत हर पक्ष से संवाद करता है, पर किसी का पिछलग्गू नहीं है।

2. शीतयुद्ध काल से बहुध्रुवीय विश्व तक: भारत का सफर

1950–1980: भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया, लेकिन वस्तुतः वह सोवियत संघ के करीब रहा।

1991: सोवियत संघ के पतन और उदारीकरण के बाद भारत ने पश्चिम के साथ संबंध गहराए।

2000 के बाद: भारत एक बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ा – अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन, जापान, और पश्चिम एशिया – सबके साथ अपने हित के अनुसार संवाद स्थापित किया।

अब भारत का लक्ष्य है – 'Issue-based alignment' यानी मुद्दों के आधार पर सहयोग और विरोध।

3. मोदी युग की विदेश नीति: नेतृत्व, जोखिम और आत्मबल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विदेश नीति में नए तेवर और आत्मविश्वास जोड़े हैं – 'नमस्ते ट्रंप' से लेकर 'Howdy Modi', 'Vaccine Maitri' से लेकर 'G20 अध्यक्षता' तक।

मोदी युग की विदेश नीति के प्रमुख स्तंभ:

- **Act East नीति**: ASEAN और पूर्वी एशिया से गहरे संबंध

- **Neighbourhood First**: बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका से संबंध सुधार

- **Strategic Autonomy**: रूस-अमेरिका के बीच संतुलन

- **Global South की आवाज़**: विकासशील देशों की चिंता को वैश्विक मंच पर लाना

भारत अब “मौन दर्शक” नहीं, “आक्रामक संवादकर्ता” है।

4. 21वीं सदी में उभरती शक्तियों के बीच भारत की स्थिति

21वीं सदी के आरंभ में वैश्विक शक्ति संतुलन फिर से बदलने लगा। अमेरिका अब भी महाशक्ति था, लेकिन चीन का तेज़ उभार, रूस का सैन्य पुनरुत्थान, और यूरोप की रणनीतिक जड़ता ने एक नई बहुध्रुवीय दुनिया की नींव रखी। भारत अब केवल “गुटनिरपेक्ष” नहीं, बल्कि “गुट-समर्थ संवादकर्ता” बन गया — जो हर गुट से बात करता है, पर किसी का पिछलग्गू नहीं।

भारत ने चीन की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए QUAD जैसे मंचों पर अमेरिका, जापान, और ऑस्ट्रेलिया के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाई। रूस से ऊर्जा और रक्षा व्यापार जारी रखकर रणनीतिक स्वतंत्रता का संकेत दिया। साथ ही इजराइल, सऊदी अरब और ईरान जैसे विरोधी देशों से भी अपने-अपने हितों के अनुसार संतुलन बनाए रखा।

भारत अब स्थायी गुटों का हिस्सा नहीं, बल्कि Issue-based Alignments को अपनाता है जैसे:

- QUAD: इंडो-पैसिफिक सुरक्षा के लिए

- BRICS: दक्षिणी देशों का आर्थिक सहयोग

- SCO: एशियाई क्षेत्रीय स्थिरता

- I2U2: पश्चिम एशिया में आर्थिक-सुरक्षा साझेदारी

5. रूस–यूक्रेन युद्ध, इज़राइल–गाज़ा संघर्ष और भारत की स्वतंत्र कूटनीति

भारत ने रूस–यूक्रेन युद्ध में रणनीतिक तटस्थता अपनाई — न रूस की आलोचना की, न पश्चिम का अंधानुकरण। उसने सस्ता तेल खरीदा, संयुक्त राष्ट्र में तटस्थ रहा, और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

इज़राइल–गाज़ा संघर्ष में भारत ने आतंक की निंदा की, इज़राइल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया, और फिलिस्तीनी मानवाधिकारों की बात भी की।

भारत अब Strategic Autonomy 2.0 के चरण में है — जहाँ नैतिकता, यथार्थ और स्वार्थ का संतुलन है।

6. क्वाड, ब्रिक्स, SCO और G20 में भारत की भूमिका

भारत ने QUAD में इंडो-पैसिफिक को सुरक्षित और स्वतंत्र रखने की पहल की। BRICS में दक्षिणी देशों की आवाज़ बनकर चीन के वर्चस्व को संतुलित किया। SCO में आतंकवाद पर कड़ा रुख दिखाया।

G20 की अध्यक्षता करते हुए 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के संदेश के साथ Global South की चिंता को मुख्यधारा में लाया और अफ्रीकी संघ को G20 सदस्यता दिलाने में मदद की।

भारत अब केवल भागीदार नहीं, वैश्विक एजेंडा-निर्धारक है।

7. 'एकला चलो रे' की ओर बढ़ता भारत: आत्मनिर्भर, संतुलित और नेतृत्वकारी

भारत अब वह राष्ट्र है जो अपनी ज़रूरतों और मूल्यों के अनुसार निर्णय करता है। Make in India, Digital India, और Vaccine Maitri जैसे प्रयास अब उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता का हिस्सा हैं।

भारत अब वैश्विक संकटों में उत्तरदाता है — मध्यस्थ, प्रेरक और संतुलनकर्ता के रूप में।

'एकला चलो रे' अब भारत की विदेश नीति का वह मंत्र बन गया है, जो कहता है — हम सबके

 साथ हैं, पर अपनी राह खुद तय करेंगे।

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