भारत की विदेश नीति: त्रिकोणीय दबावों में संतुलन की चुनौती
भारत की विदेश नीति: त्रिकोणीय दबावों में संतुलन की चुनौती
परिचय
भारत आज एक ऐसे भू-राजनीतिक युग में खड़ा है जहाँ उस पर तीन महाशक्तियाँ—अमेरिका, रूस और चीन—अपनी-अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। वास्तविकता यह है कि भारत के लिए अपनी संप्रभु विदेश नीति बनाए रखना जितना आवश्यक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी बन गया है।
चित्र: भारत के चारों ओर रणनीतिक दबाव (USA, Russia, China)
1. अमेरिका का दृष्टिकोण: मित्रता या रणनीतिक स्वार्थ?
अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व के विरुद्ध एक सामरिक सहयोगी के रूप में देखता है। भारत को चीन के खतरे से डरा कर अपने पाले में लाने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि, जब भारत के हितों की रक्षा की बात आती है, तो अमेरिका प्रायः तटस्थ रहता है।
2. रूस की भूमिका: पुराना मित्र, नया समीकरण
भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंध दशकों पुराने हैं, लेकिन वर्तमान संदर्भ बदल चुका है। रूस अब पाकिस्तान के करीब आ रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस चीन के साथ और अधिक झुक गया है। भारत अभी भी ऊर्जा और रक्षा के लिए रूस पर निर्भर है, परंतु खुलकर विरोध भी नहीं कर सकता।
3. चीन से संबंध: विरोध और प्रतिस्पर्धा
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, व्यापार प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक टकराव हैं। डोकलाम और गलवान जैसी घटनाओं ने इस तनाव को और गहरा किया है। चीन-पाकिस्तान की नज़दीकी भी भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती है।4. भारत की विदेश नीति की खोखली संरचना
भारत अपने को "स्वतंत्र विदेश नीति" का पालन करने वाला राष्ट्र बताता है, लेकिन व्यवहार में अमेरिका, रूस और चीन तीनों की दिशा में संतुलन साधने की नीति अपनाई जा रही है। यह नीति अधिकतर मामलों में चुप्पी और अनिर्णय से भरी प्रतीत होती है।
5. व्यापारिक आंकड़े
चित्र: भारत का व्यापार अमेरिका, रूस और चीन के साथ (2015–2023)
| वर्ष | अमेरिका (अरब $) | रूस (अरब $) | चीन (अरब $) |
|---|---|---|---|
| 2015 | 67 | 7.9 | 71 |
| 2017 | 74 | 9.3 | 84 |
| 2019 | 88 | 10.1 | 92 |
| 2021 | 112 | 13.1 | 115 |
| 2023 | 118 | 49.3 | 113 |
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति आज एक जटिल जाल में उलझी हुई है। अमेरिका, रूस और चीन तीनों के साथ संबंध बनाए रखना एक संतुलनकारी कार्य है। भारत को चाहिए कि वह अपनी नीति को अधिक स्पष्ट, मुखर और आत्मनिर्भर बनाए। चुप्पी और अनिर्णय की रणनीति अब वैश्विक कूटनीति में टिकाऊ नहीं है।














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