पेंडुलम पाकिस्तान: इज़राइल-ईरान युद्ध की छाया में एक डांवाडोल राष्ट्र

पेंडुलम पाकिस्तान: इज़राइल-ईरान युद्ध की छाया में एक डांवाडोल राष्ट्र


जब दुनिया की नजरें इज़राइल और


ईरान के बीच छिड़े भयानक युद्ध पर टिकी हैं, तब एक देश ऐसा भी है जो इस पूरे टकराव में सीधे शामिल न होते हुए भी बार-बार उसकी दिशा और परिणामों को प्रभावित करता है। यह देश है पाकिस्तान। एक ऐसा राष्ट्र जो न तो पूरी तरह अमेरिका के पाले में आता है, न ही पूरी तरह ईरान के। इसकी विदेश नीति वर्षों से दो ध्रुवों के बीच झूलती रही है – ठीक किसी पेंडुलम (दोलक) की तरह।

इज़राइल-ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि

2025 में जब इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला बोला, तो इसके जवाब में ईरान ने इज़राइली शहरों पर मिसाइलों और ड्रोन से भीषण जवाबी कार्रवाई की। अमेरिका ने इज़राइल का साथ देते हुए ईरान के भीतर कई बंकरबस्टर हमले किए। इसने न केवल पश्चिम एशिया को युद्ध की आग में झोंक दिया, बल्कि समूचे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को भी तनावग्रस्त कर दिया। इसी परिस्थिति में पाकिस्तान की भूमिका और उसकी कूटनीति का विश्लेषण करना ज़रूरी हो जाता है।

पाकिस्तान का भूराजनैतिक संकट

पाकिस्तान एक इस्लामी गणराज्य है, जिसकी सीमाएं ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों से लगती हैं। साथ ही, वह दशकों से अमेरिका की सैन्य और आर्थिक सहायता पर निर्भर रहा है। वहीं चीन के साथ उसका नया सामरिक और आर्थिक गठबंधन भी उसे एक और ध्रुव की ओर खींचता है।

ईरान के साथ संबंध:

  • दोनों शिया-सुन्नी विभाजन के बावजूद ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़े हैं।
  • बलूचिस्तान क्षेत्र में अलगाववादी गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच समय-समय पर तनाव रहा है।
  • ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना लंबे समय से अमेरिकी दबाव में रुकी हुई है।

अमेरिका और पश्चिमी गुट:

  • पाकिस्तान को IMF और वर्ल्ड बैंक से मिलने वाली मदद अमेरिका की स्वीकृति पर निर्भर करती है।
  • अफगानिस्तान संकट में पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए “लॉजिस्टिकल हब” की भूमिका निभाई।
  • ड्रोन हमलों और “वॉर ऑन टेरर” के दौर ने पाकिस्तान को बार-बार अमेरिका के साथ और फिर उसके विरोध में खड़ा किया।

इज़राइल-ईरान युद्ध में पाकिस्तान की स्थिति

आधिकारिक बयानबाजी:

पाकिस्तान ने शुरुआत में तटस्थता का परिचय दिया, लेकिन जल्द ही संसद में कई सांसदों ने इज़राइल की कार्रवाई की निंदा की और “मुस्लिम उम्मा” का समर्थन करने की बात कही।

जनता और धार्मिक भावनाएं:

  • पाकिस्तान की जनता विशेष रूप से फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर संवेदनशील रही है।
  • सड़कों पर ईरान के समर्थन में प्रदर्शन हुए।
  • कट्टरपंथी धार्मिक दलों ने पाकिस्तान सरकार पर ईरान का समर्थन करने का दबाव डाला।

रणनीतिक चिंता:

  • यदि युद्ध बढ़ता है, तो ईरान से सटे पाक-ईरान सीमा पर अस्थिरता बढ़ सकती है।
  • शिया समुदाय पर हमला पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव को भड़का सकता है।
  • अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान कोई भी निर्णय लेने से हिचक रहा है।

“पेंडुलम” क्यों?

1. दो छोरों के बीच फंसी कूटनीति:

पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय एक ओर अमेरिका, चीन और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों की संतुष्टि चाहता है, दूसरी ओर उसे मुस्लिम देशों के प्रति अपनी “वैचारिक निष्ठा” भी जतानी होती है। यही उसे एक स्थिर नीति अपनाने से रोकता है।

2. आंतरिक अस्थिरता:

  • आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता के चलते पाकिस्तान के पास कोई ठोस कूटनीतिक पहल की क्षमता नहीं है।
  • सेना और सरकार के बीच शक्ति संतुलन भी विदेश नीति को प्रभावित करता है।

3. धार्मिक पहचान बनाम व्यावहारिक दबाव:

ईरान से नजदीकी बढ़ाने पर अमेरिका और सऊदी अरब नाराज़ होते हैं। अमेरिका के समर्थन पर जनता और कट्टरपंथी नाराज़ होते हैं। हर निर्णय के पीछे कई विरोधाभास जुड़ जाते हैं।

हालात का असर

1. अंतरराष्ट्रीय मंच पर भूमिका:

पाकिस्तान ने तुर्की, मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे कुछ मुस्लिम देशों के साथ मिलकर “इस्लामी एकता” की बातें कीं, लेकिन कोई ठोस पहल नहीं कर सका।

2. भारत के लिए क्या मायने?

  • भारत इस क्षेत्रीय अस्थिरता में अपनी कूटनीति को ज्यादा तटस्थ और संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है।
  • पाकिस्तान की अस्थिरता और दोहरे रुख से भारत को सामरिक बढ़त मिलती है।

निष्कर्ष: पेंडुलम से परे?

पाकिस्तान जब तक अपनी विदेश नीति को स्पष्ट, स्वतंत्र और व्यावहारिक आधार पर नहीं टिकाता, तब तक वह पेंडुलम ही बना रहेगा — न ईरान का पूरी तरह साथी, न अमेरिका का भरोसेमंद सहयोगी। उसे यह तय करना होगा कि वह अपनी भू-राजनीतिक स्थिति का उपयोग एक सकारात्मक शक्ति बनकर करेगा, या यूं ही डगमगाता रहेगा।

आज की दुनिया स्पष्ट रुख चाहती है। पेंडुलम की तरह झूलते रहना अब पाकिस्तान को महंगा पड़ सकता है — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी और आंतरिक स्थिरता के स्तर पर भी।

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