नेहरू से मोदी तक: भारतीय विदेश नीति की यात्रा — 'कूटनीति का विकास या विघटन'

 



प्रस्तावना

भारत की विदेश नीति की शुरुआत एक ऐसे युग से हुई थी जहाँ गुटनिरपेक्षता केवल रणनीति नहीं, नैतिक दृष्टिकोण भी थी। पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में स्थापित यह नीति वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच एक स्वतंत्र आवाज़ थी। लेकिन बीते दशकों में यह नीति क्रमशः व्यावसायिक, रणनीतिक और फिर अंततः व्यक्तित्व-केंद्रित होती चली गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विदेश नीति की भाषा, शैली और उद्देश्य में जो परिवर्तन आए हैं, उन्होंने भारत को विश्व मंच पर अधिक सक्रिय बनाया — लेकिन यह सक्रियता कई बार आक्रामकता और प्रचारात्मकता में बदल गई है। यह लेख इसी परिवर्तनशील यात्रा की आलोचनात्मक पड़ताल करता है।


नेहरू युग: नैतिकता और गुटनिरपेक्षता की नींव

नेहरू ने भारत की विदेश नीति को एक सार्वभौमिक नैतिक दृष्टिकोण से गढ़ा। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) इसका प्रतीक था — न अमेरिका, न सोवियत संघ, बल्कि एक स्वतंत्र, विकासशील और नैतिक भारत। उनके प्रयासों में:

  • चीन से पंचशील समझौता (1954),
  • अफ्रो-एशियन एकता की पहल,
  • संयुक्त राष्ट्र में सक्रिय भागीदारी शामिल थी।

लेकिन 1962 का चीन युद्ध इस नैतिकता पर एक कठोर झटका साबित हुआ। आलोचकों ने इसे "आदर्शवाद की सीमाएँ" कहा।


इंदिरा गाँधी से नरसिंह राव: यथार्थ की ओर झुकाव

इंदिरा गाँधी ने विदेश नीति को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा — बांग्लादेश युद्ध (1971), भारत-सोवियत संधि, और परमाणु परीक्षण की तैयारी इसका प्रमाण हैं। राजीव गांधी ने तकनीकी संबंधों पर जोर दिया।

नरसिंह राव के काल में:

  • इज़राइल और दक्षिण एशियाई देशों से कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत,
  • आर्थिक सुधारों के साथ विदेश नीति का व्यावसायीकरण हुआ।

वाजपेयी युग: शक्ति प्रदर्शन और संवाद का संतुलन

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण कर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन किया। वहीं बस यात्रा और आगरा शिखर सम्मेलन से पाकिस्तान से संवाद की भी पहल हुई। उनके काल में:

  • भारत-अमेरिका संबंध प्रगाढ़ हुए (शुरुआत),
  • सार्क को पुनर्जीवित करने का प्रयास,
  • प्रवासी भारतीयों को जोड़ने की नीति विकसित हुई।

मनमोहन सिंह काल: संतुलन, संवाद और उदारीकरण

यूपीए शासनकाल में विदेश नीति अपेक्षाकृत कम प्रचारित रही लेकिन:

  • भारत-अमेरिका परमाणु समझौता,
  • पूर्व की ओर नीति (Look East to Act East की भूमिका),
  • ब्रिक्स, G20, IBSA में सक्रियता

यह युग एक तरह से गंभीर, संस्थागत और तकनीकी कूटनीति का प्रतिनिधि था।


मोदी युग: आक्रामकता, ब्रांडिंग और द्विपक्षीयता का उभार

2014 के बाद मोदी की विदेश नीति में कुछ स्पष्ट विशेषताएँ रही हैं:

(1) विदेश नीति का ‘नेतृत्व-केन्द्रितकरण’

  • पहले जहाँ विदेश मंत्रालय नीति बनाता था, अब प्रधानमंत्री स्वयं 'फेस' बन गए हैं।
  • विदेश यात्राओं को 'इवेंट' में बदलना (मैडिसन स्क्वायर, हाउडी मोदी)।

(2) ब्रांडिंग का उच्चतम स्तर

  • “विश्वगुरु भारत” की कल्पना,
  • प्रवासी भारतीयों को 'राजनयिक संसाधन' में बदलना।

(3) पड़ोसी प्रथम नीति से पड़ोसी से दूरी

  • नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान से संबंधों में अस्थिरता।
  • पाकिस्तान से ‘नो-टॉक पॉलिसी’, जबकि आंतरिक मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय रंग मिला (370 हटाना)।

(4) बहुपक्षीय मंचों की उपेक्षा

  • सार्क निष्क्रिय,
  • चीन के साथ BRICS और SCO मंचों में सीमित संवाद।

(5) अमेरिका और पश्चिम पर अत्यधिक झुकाव

  • रूस से दूरी,
  • चीन के विरुद्ध अमेरिका की नीतियों का समर्थन, लेकिन परिणामस्वरूप आर्थिक और सामरिक संतुलन में असंतुलन।

(6) खुलेपन की बजाय वैचारिक ध्रुवीकरण

  • मुस्लिम दुनिया के साथ संबंधों में गिरावट,
  • UNHRC, EU जैसे मंचों पर आलोचना को ‘अंदरूनी मामला’ कहकर खारिज करना।

आलोचनात्मक निष्कर्ष: 'जोड़ने' की नहीं, 'जमाने' की विदेश नीति?

मोदी की विदेश नीति ने भारत को मंचों पर तो अधिक दिखाया, लेकिन:

  • पड़ोस असहज हुआ,
  • पश्चिम के साथ संबंध 'व्यक्तिगत' रहे,
  • बहुपक्षीय नीति का स्थान वैचारिक आग्रहों ने लिया।

कूटनीति अब ‘दृश्य’ (visual) बन गई है — सारगर्भिता पीछे छूट गई। यह बदलाव भारत को रणनीतिक रूप से मजबूती नहीं, बल्कि प्रचार में समृद्ध और नीति में अधूरा बनाता है।


अंतिम प्रश्न:

क्या विदेश नीति का उद्देश्य देश को जोड़ना होता है या छवि चमकाना? यदि उत्तर पहला है, तो हमें फिर से नीति को ‘सामूहिक, संतुलित और संस्थागत’ बनाना होगा — वरना भारत एक ऐसे भू-राजनीतिक सेल्फी का हिस्सा बन जाएगा, जिसमें कोई स्थायी मित्र नहीं, केवल क्षणिक तस्वीरें होंगी।

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