ईरान-इजराइल का रण, तमाशबीन अमेरिका, और भारत का संतुलन
ईरान-इजराइल का रण, तमाशबीन अमेरिका, और भारत का संतुलन
परिचय: मध्य पूर्व का सर्कस और अमेरिका की पॉपकॉर्न थाली
मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक तमाशा फिर से अपने चरम पर है। ईरान और इजराइल एक-दूसरे पर मिसाइलें और ड्रोन बरसा रहे हैं, मानो कोई मसाला फिल्म का अंतिम दृश्य चल रहा हो। लेकिन असली मज़ा दर्शक दीर्घा में है। अमेरिका, जो खुद को “विश्व का पुलिसवाला” कहता है, VIP बालकनी में बैठा पॉपकॉर्न चबा रहा है। एक हाथ में इजराइल के लिए $3.8 बिलियन का सैन्य सहायता चेक, दूसरे में ईरान के लिए “शांति” का खोखला उपदेश। तमाशबीन? अरे, ये तो तमाशे का डायरेक्टर है, जो स्क्रिप्ट लिखता है और फिर किनारे खड़ा ताली बजाता है। इस बीच, भारत गुटनिरपेक्ष नीति का झंडा बुलंद किए, संतुलन की कला में माहिर, चुपके से अपने रणनीतिक हित साध रहा है।
अमेरिका की तमाशबीन नौटंकी: हथियार बेचो, शांति का ढोंग करो
अमेरिका की नीति को समझना हो, तो बस इतना जान लो: ये वही दोस्त है जो आग लगाने का सामान देता है और फिर फायर ब्रिगेड का नंबर डायल करने का नाटक करता है। इजराइल को 2024 में $3.8 बिलियन की सैन्य सहायता, F-35 जेट, और मिसाइल डिफेंस सिस्टम—सब कुछ मुहैया। जब अप्रैल 2024 में ईरान ने इजराइल पर 300 ड्रोन और मिसाइलें दागीं, तो अमेरिका ने इजराइल की हवाई रक्षा में मदद की, लेकिन साथ में बयान दिया, “हम युद्ध नहीं चाहते।” अरे भाई, तो इतने हथियार किसके लिए? परमाणु वार्ता (JCPOA) 2022 से ठप है, लेकिन अमेरिका “कूटनीति” की रट लगाए बैठा है। तंज ये कि तमाशबीन बनकर अमेरिका न सिर्फ मुनाफा कमा रहा है, बल्कि मध्य पूर्व को अपने शतरंज का मोहरा बनाए रखे है।
अरब की चुप्पी: अब्राहम समझौता या पेट्रोडॉलर का गणित?
अरब देशों की खामोशी ऐसी है, मानो उन्होंने फिलिस्तीन का झंडा फ्रिज में रखकर इजराइल के साथ चाय की चुस्की लेनी शुरू कर दी हो। 2020 का अब्राहम समझौता—जिसमें UAE, बहरीन, और मोरक्को ने इजराइल से दोस्ती की—इब्राहिम की साझा विरासत का ढोंग कम, तेल और हथियारों का सौदा ज़्यादा है। सऊदी अरब, जो कभी इजराइल को “दुश्मन” कहता था, अब चुपके से गैस पाइपलाइन और डील की बात कर रहा है। इब्राहिम के बेटों—इश्माइल (मुस्लिमों के पूर्वज) और इसहाक (यहूदियों के पूर्वज)—का इतिहास तो कुरान और तोराह में गर्व से दर्ज है, लेकिन आज अरब देश तमाशे में ताली बजा रहे हैं।
ईरान का सांस्कृतिक इतिहास: पारसी गौरव से शिया जंग तक
ईरान की कहानी किसी महाकाव्य से कम नहीं। कभी ज़ोरोआस्ट्रियनिज़्म का केंद्र, जहां आग की पूजा होती थी, 7वीं सदी में अरब आक्रमण के बाद शिया इस्लाम का गढ़ बन गया। फिरदौसी की शाहनामा और रूमी की सूफी कविताएं आज भी ईरान की फारसी आत्मा की गवाही देती हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति ने शिया इस्लाम को सत्ता दी, लेकिन यहूदी और ईसाई समुदाय हाशिए पर चले गए। 1948 में ईरान में 100,000 यहूदी थे; आज सिर्फ 15,000 बचे हैं। ईरान कहता है, “हमारा झगड़ा ज़ायोनी शासन से है, यहूदियों से नहीं।” लेकिन जब मिसाइलें चलती हैं, तो ये बारीकियां धुंध में खो जाती हैं।
अब्राहम की विडंबना: एक पिता, तीन झगड़ते बच्चे
इब्राहिम—यहूदी, ईसाई, और मुस्लिम तीनों का पितामह। कुरान में सूरह इब्राहिम, बाइबिल में अब्राहम, तोराह में अव्राहम—सब उसे एकता का प्रतीक मानते हैं। लेकिन आज उनके “बेटे” एक-दूसरे के खिलाफ हथियार उठाए हैं। इजराइल ईरान को अस्तित्व का खतरा बताता है। ईरान “ज़ायोनी शासन” को मिटाने की कसम खाता है। और अमेरिका, ईसाई अब्राहम का दावा करते हुए, हथियार बेचकर मुनाफा कमा रहा है। इब्राहिम आज होता, तो शायद कहता, “बस करो, मेरे नाम पर ये तमाशा बंद करो!”
भारत: गुटनिरपेक्ष नीति का अगुआ
भारत इस तमाशे में संतुलन की मिसाल है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की विरासत को थामे, भारत ने ईरान और इजराइल दोनों से दोस्ती निभाई। इजराइल से रक्षा सौदे और ड्रोन टेक्नोलॉजी, तो ईरान से चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा आपूर्ति। भारत न झगड़े में पड़ता है, न मध्यस्थता का ढोंग करता है। ये वो कला है, जो नेहरू से लेकर आज तक भारत की विदेश नीति का आधार रही है। तंज ये कि जब दुनिया आग में जल रही हो, भारत संतुलन बनाकर अपने हित साध लेता है—चाबहार हो या राफेल।









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