अपनी कूटनीति में कूटा जाता भारत
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हाल के अंतरराष्ट्रीय विमर्श में भारत का नाम ईरान-अमेरिका या व्यापक पश्चिम एशिया तनाव में संभावित “मध्यस्थ” के रूप में अधिक लिया जा रहा है। इसकी वजह केवल भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट कूटनीतिक स्थिति भी है। भारत उन गिने-चुने देशों में है जिनके एक साथ अमेरिका, रूस, ईरान, इज़राइल और खाड़ी देशों — सभी के साथ कार्यकारी संबंध हैं। यही संतुलन उसे संभावित संवादकर्ता या “विश्वसनीय संपर्क सूत्र” के रूप में प्रस्तुत करता है।
रूसी विदेश मंत्री Sergey Lavrov ने हालिया बयान में संकेत दिया कि यदि दीर्घकालिक मध्यस्थता या भरोसेमंद संवाद चैनल की आवश्यकता हो, तो भारत जैसी शक्ति उपयोगी भूमिका निभा सकती है। यह बयान केवल औपचारिक प्रशंसा नहीं माना गया, बल्कि रूस की उस रणनीति का हिस्सा समझा गया जिसमें वह भारत को “Global South” की प्रमुख आवाज के रूप में आगे बढ़ते देख रहा है।
भारत का नाम इसलिए भी सामने आता है क्योंकि उसकी विदेश नीति पारंपरिक रूप से “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है। शीत युद्ध के दौर में Non-Aligned Movement यानी NAM के माध्यम से भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी। आज भले NAM पहले जैसा प्रभावशाली न हो, लेकिन भारत अब भी किसी एक शक्ति गुट में पूरी तरह शामिल होने से बचता है। यही कारण है कि वह रूस से रक्षा संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ QUAD में भी सक्रिय है, और साथ ही ईरान के साथ ऊर्जा तथा चाबहार परियोजना पर सहयोग जारी रखता है।
ईरान के संदर्भ में भारत की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने लंबे समय तक ईरानी तेल आयात किया है और Chabahar Port को मध्य एशिया तक पहुंच के रणनीतिक द्वार के रूप में विकसित किया है। दूसरी ओर भारत के इज़राइल और अमेरिका के साथ भी मजबूत रक्षा और तकनीकी संबंध हैं। यही संतुलन भारत को ऐसा देश बनाता है जिस पर सभी पक्ष कम से कम संवाद के स्तर पर भरोसा कर सकते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि भारत अभी खुलकर औपचारिक “मध्यस्थ” की भूमिका लेने से बचता दिखाई देता है। भारत की विदेश नीति सामान्यतः यह रही है कि वह प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बजाय “संवाद, कूटनीति और स्थिरता” का समर्थन करे। भारत समझता है कि पश्चिम एशिया का संकट अत्यंत जटिल है, जहां अमेरिका-ईरान, इज़राइल-ईरान, सुन्नी-शिया प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा राजनीति और चीन-रूस-अमेरिका शक्ति संतुलन — सभी एक साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष मध्यस्थता जोखिमपूर्ण भी हो सकती है।
फिर भी भारत का नाम लिए जाने का अपना प्रतीकात्मक महत्व है। यह दर्शाता है कि विश्व राजनीति में भारत अब केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं माना जा रहा, बल्कि उसे एक संभावित “संतुलनकारी शक्ति” और “विश्वसनीय संवादकर्ता” के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेष रूप से Narendra Modi के दौर में भारत ने G20, Global South Summit और पश्चिम एशिया कूटनीति के माध्यम से अपनी वैश्विक भूमिका को अधिक सक्रिय रूप में प्रस्तुत किया है।
यदि भविष्य में भारत वास्तव में किसी मध्यस्थ भूमिका में आता है, तो वह पारंपरिक “शांति वार्ताकार” की तरह नहीं बल्कि “विश्वास निर्माण करने वाले संवाद मंच” के रूप में अधिक दिखाई देगा। भारत की कोशिश संभवतः यही होगी कि पश्चिम एशिया में युद्ध का विस्तार न हो, ऊर्जा आपूर्ति स्थिर रहे और वैश्विक व्यापारिक मार्ग सुरक्षित बने रहें।
इस प्रकार भारत का नाम मध्यस्थता के लिए लिया जाना केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का संकेत भी है, जहां उभरती शक्तियां अब केवल क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं रह गईं, बल्कि वैश्विक संकटों में भी संभावित निर्णायक भूमिका निभाने लगी हैं।









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