क्या भारत वास्तव में “ग्लोबल साउथ” का मसीहा बन पाया है?

BRICS, QUAD और G20 के संदर्भ में भारत के नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा 21वीं सदी की विश्व राजनीति एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। शीत युद्ध के बाद जिस एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिका सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित था, वह अब धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना में बदलती दिखाई दे रही है। चीन का उदय, रूस की आक्रामक रणनीति, यूरोप की आंतरिक चुनौतियाँ, पश्चिम एशिया की अस्थिरता और विकासशील देशों की बढ़ती आकांक्षाएँ — इन सबने वैश्विक शक्ति संतुलन को नया स्वरूप दिया है। इसी बदलती व्यवस्था के बीच भारत स्वयं को “ग्लोबल साउथ” अर्थात एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। भारत के प्रधानमंत्री लगातार यह कहते रहे हैं कि भारत उन देशों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें दशकों तक वैश्विक संस्थाओं में उचित स्थान नहीं मिला। लेकिन इसी दावे के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा होता है — यदि भारत वास्तव में ग्लोबल साउथ का नेतृत्वकर्ता है, तो फिर BRICS, QUAD और G20 जैसे मंचों पर वह सर्वसम्मति क्यों नहीं बना पा रहा? क्यों उसकी अध्यक्षता के दौरान साझा वक्तव्य पर विवाद उत्पन्न होते हैं? और क्या केवल नैतिक भाषणों तथा संतुलित कूटनीति से कोई राष्ट्र “मसीहा” बन सकता है? यह प्रश्न केवल भारत की विदेश नीति का नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक वैश्विक स्थिति का प्रश्न है। “ग्लोबल साउथ” आखिर है क्या? “Global South” कोई औपचारिक संगठन नहीं, बल्कि उन विकासशील देशों की सामूहिक अवधारणा है जो लंबे समय तक औपनिवेशिक शोषण, आर्थिक असमानता और वैश्विक संस्थाओं में पश्चिमी वर्चस्व का सामना करते रहे। इस समूह में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकांश देश शामिल माने जाते हैं। इन देशों की प्रमुख समस्याएँ हैं— गरीबी और विकास की चुनौती जलवायु परिवर्तन का असमान प्रभाव तकनीकी पिछड़ापन कर्ज संकट वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व भारत स्वयं को इन देशों की आवाज़ इसलिए बताता है क्योंकि उसका औपनिवेशिक इतिहास भी समान रहा है और वह आज भी स्वयं को “विकासशील विश्व” का हिस्सा मानता है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका पिछले एक दशक में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सक्रियता अत्यधिक बढ़ाई है। भारत ने— कोविड काल में वैक्सीन सहायता दी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल प्रस्तुत किया जलवायु न्याय की मांग उठाई अफ्रीकी संघ को G20 में स्थायी सदस्यता दिलाने का समर्थन किया रूस और पश्चिम दोनों से संबंध बनाए रखे इन पहलों ने भारत को एक संतुलित और विश्वसनीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। पश्चिम भारत को चीन के विकल्प के रूप में देखता है। रूस भारत को भरोसेमंद मित्र मानता है। खाड़ी देश भारत को आर्थिक साझेदार के रूप में देखते हैं। अफ्रीकी देशों में भारत की छवि चीन की तुलना में कम आक्रामक और अधिक सहयोगी मानी जाती है। यही कारण है कि भारत आज “विश्वसनीय मध्यस्थ” की छवि बनाने में सफल हुआ है। लेकिन क्या यही नेतृत्व है? यहीं से असली बहस शुरू होती है। किसी देश का सम्मान होना और किसी देश का निर्णायक नेतृत्वकर्ता होना — दोनों अलग बातें हैं। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ है— विभिन्न देशों को साझा नीति पर सहमत करना संकट के समय दिशा देना आर्थिक और सामरिक प्रभाव के माध्यम से परिणाम उत्पन्न करना विरोधी गुटों के बीच समाधान निकालना यदि इन मानकों पर देखा जाए, तो भारत अभी संक्रमणकाल में दिखाई देता है। G20 : भारत की सबसे बड़ी परीक्षा G20 की अध्यक्षता भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर थी। भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” को थीम बनाकर यह संदेश दिया कि वह विभाजित विश्व को जोड़ना चाहता है। लेकिन वास्तविकता यह थी कि दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण गहरे ध्रुवीकरण में बंटी हुई थी। अमेरिका और यूरोपीय देश चाहते थे कि रूस की स्पष्ट निंदा हो। रूस और चीन इसका विरोध कर रहे थे। भारत के सामने चुनौती थी कि वह दोनों पक्षों को साथ रखे। अंततः दिल्ली घोषणा-पत्र जारी हुआ। इसे भारत की कूटनीतिक सफलता बताया गया। लेकिन यदि गहराई से देखा जाए, तो यह सफलता “समझौते की भाषा” पर आधारित थी, न कि वास्तविक वैचारिक सहमति पर। भारत रूस की आलोचना नहीं कर सका। पश्चिम अपनी पूरी भाषा नहीं मनवा सका। इसलिए दस्तावेज़ को इतना संतुलित बना दिया गया कि कोई पक्ष पूरी तरह असंतुष्ट भी न हो और पूरी तरह संतुष्ट भी नहीं। यह कूटनीति थी, लेकिन निर्णायक नेतृत्व नहीं। भारत ने मंच को टूटने से बचाया, परंतु विश्व राजनीति की दिशा तय नहीं कर सका। BRICS : भारत बनाम चीन की मौन प्रतिस्पर्धा BRICS मूल रूप से पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के विकल्प के रूप में उभरा था। भारत के लिए यह मंच महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यहाँ वह विकासशील देशों के साथ नई आर्थिक संरचना की बात कर सकता है। लेकिन BRICS के भीतर सबसे बड़ा प्रश्न चीन है। चीन की अर्थव्यवस्था BRICS के अन्य सभी देशों से कहीं बड़ी है। उसका वैश्विक निवेश नेटवर्क विशाल है। बेल्ट एंड रोड परियोजना के माध्यम से उसने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में गहरा प्रभाव बनाया है। भारत इस मंच में संतुलनकारी भूमिका निभाना चाहता है ताकि BRICS पूरी तरह चीन-केन्द्रित न बन जाए। जब BRICS विस्तार की बात हुई, तब भारत की सावधानी स्पष्ट दिखाई दी। भारत नहीं चाहता था कि यह मंच पश्चिम-विरोधी राजनीतिक गठबंधन में बदल जाए। दूसरी ओर चीन इसे अमेरिकी प्रभाव के खिलाफ एक वैकल्पिक धुरी बनाना चाहता था। यहीं पर भारत की सीमाएँ सामने आती हैं। यदि भारत वास्तव में ग्लोबल साउथ का निर्विवाद नेता होता, तो BRICS की दिशा पर उसका प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता। लेकिन वास्तविकता यह है कि आर्थिक शक्ति के कारण चीन का प्रभाव अधिक मजबूत है। भारत के पास नैतिक विश्वसनीयता है, परंतु चीन के पास आर्थिक दबाव की क्षमता है। और आधुनिक विश्व राजनीति में केवल नैतिकता से नेतृत्व स्थापित नहीं होता। QUAD : रणनीतिक सहयोग या कूटनीतिक दुविधा? Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखना है, जिसका वास्तविक संदर्भ चीन ही माना जाता है। भारत यहाँ भी संतुलन साधने की कोशिश करता है। भारत चीन से संघर्ष भी नहीं चाहता और उसकी आक्रामकता को अनदेखा भी नहीं कर सकता। इसलिए भारत QUAD को सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि “सहयोग मंच” बताता है। लेकिन इससे एक विरोधाभास पैदा होता है। यदि भारत ग्लोबल साउथ का स्वतंत्र नेता है, तो वह अमेरिकी रणनीतिक ढाँचे के इतने निकट क्यों दिखाई देता है? अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों को लगता है कि भारत धीरे-धीरे पश्चिमी रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है। दूसरी ओर अमेरिका को कई बार लगता है कि भारत रूस और ईरान पर अत्यधिक नरम है। इस प्रकार भारत दोनों पक्षों के बीच संतुलन तो बना रहा है, लेकिन किसी एक धुरी का पूर्ण विश्वास अभी प्राप्त नहीं कर पाया। भारत की सबसे बड़ी ताकत : रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का मूल आधार “रणनीतिक स्वायत्तता” है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा समझौते करता है, लेकिन रूस से तेल भी खरीदता है। वह ईरान के साथ संपर्क बनाए रखता है और साथ ही इज़राइल के साथ भी घनिष्ठ संबंध रखता है। यही संतुलन भारत को विशिष्ट बनाता है। भारत किसी गुट का पूर्ण सदस्य नहीं बनना चाहता। यही कारण है कि कई विकासशील देश उसे पश्चिमी प्रभुत्व से अलग एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखते हैं। लेकिन यही नीति कई बार अस्पष्टता भी उत्पन्न करती है। जब वैश्विक संकट आता है, तब दुनिया स्पष्ट रुख चाहती है। भारत अक्सर संतुलित भाषा अपनाता है। इससे वह सभी पक्षों से संवाद बनाए रखता है, लेकिन निर्णायक नेतृत्व की छवि कमजोर पड़ जाती है। क्या भारत “मसीहा” शब्द के योग्य है? “मसीहा” शब्द अत्यंत बड़ा और भावनात्मक शब्द है। कोई राष्ट्र तब वैश्विक मसीहा बनता है जब— वह आर्थिक सहायता दे सके सुरक्षा प्रदान कर सके संकट में निर्णायक हस्तक्षेप कर सके वैश्विक संस्थाओं की दिशा बदल सके अन्य देशों को अपने पीछे संगठित कर सके इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत अभी उस स्थिति में नहीं पहुँचा है। भारत के पास अभी— सीमित आर्थिक संसाधन रक्षा आयात पर निर्भरता पड़ोस में चीन की चुनौती संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का अभाव क्षेत्रीय तनाव जैसी अनेक बाधाएँ हैं। इसलिए भारत को “Global South का सबसे विश्वसनीय लोकतांत्रिक चेहरा” कहना अधिक उचित होगा, न कि “मसीहा”। फिर भी भारत महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि वर्तमान विश्व व्यवस्था में विश्वसनीयता का संकट है। अमेरिका पर हस्तक्षेपवादी राजनीति के आरोप हैं। चीन पर कर्ज-जाल और विस्तारवाद के आरोप हैं। रूस युद्ध के कारण अलग-थलग पड़ा है। ऐसे समय में भारत अपेक्षाकृत संतुलित और संवादवादी शक्ति के रूप में उभरता है। भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी सभ्यतागत छवि, लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवाद क्षमता है। वह विकासशील देशों को यह भरोसा दिलाता है कि बिना पश्चिमी प्रभुत्व और बिना चीनी दबाव के भी एक वैकल्पिक नेतृत्व संभव है। आने वाले दशक में भारत की चुनौतियाँ यदि भारत वास्तव में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे केवल भाषणों से आगे बढ़ना होगा। उसे— आर्थिक शक्ति को तेज़ी से बढ़ाना होगा तकनीकी नवाचार में अग्रणी बनना होगा पड़ोसी देशों के साथ स्थिर संबंध बनाने होंगे रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर होना होगा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में निवेश बढ़ाना होगा वैश्विक संकटों पर स्पष्ट पहल करनी होगी भारत को “नैतिक शक्ति” से आगे बढ़कर “संरचनात्मक शक्ति” बनना होगा। निष्कर्ष BRICS, QUAD और G20 जैसे मंचों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब वैश्विक राजनीति के केंद्र में पहुँच चुका है। दुनिया उसे सुन रही है, उससे अपेक्षाएँ कर रही है और उसे संभावित नेतृत्वकर्ता के रूप में देख रही है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं पहुँचा जहाँ वह वैश्विक शक्तियों को अपनी दिशा में स्थायी सहमति पर ला सके। भारत मंचों को टूटने से बचा सकता है, संवाद बनाए रख सकता है, संतुलन पैदा कर सकता है — लेकिन निर्णायक वैश्विक दिशा तय करने की क्षमता अभी निर्माणाधीन है। इसलिए आज भारत ग्लोबल साउथ की “आवाज़” अवश्य है, परंतु उसका निर्विवाद “मसीहा” बनने का सफर अभी अधूरा है। यदि आने वाले वर्षों में भारत आर्थिक, तकनीकी और सामरिक शक्ति को नई ऊँचाइयों तक ले जाता है, तब संभव है कि वह केवल विकासशील देशों की आशा ही नहीं, बल्कि नई विश्व व्यवस्था की वास्तविक धुरी भी बन जाए।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट