हिन्दू-मुस्लिम कॉकटेल, बेरोजगारी और टूटते युवाओं का राष्ट्र

भारत आज एक विचित्र समय से गुजर रहा है। यह वह समय है जहाँ विकास के दावे और सामाजिक विघटन साथ-साथ चल रहे हैं। एक ओर चमकते एक्सप्रेसवे, डिजिटल इंडिया, अंतरिक्ष उपलब्धियाँ, पाँच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के सपने और विश्वगुरु बनने की घोषणाएँ हैं; दूसरी ओर बेरोजगारी, आत्महत्या, भ्रष्टाचार, महँगाई, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और टूटते सामाजिक विश्वास की भयावह तस्वीर है। ऐसा लगता है मानो लोकतंत्र का भवन अभी भी खड़ा तो है, लेकिन उसके स्तंभों में भीतर से दीमक लग चुकी है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका — जिन पर जनता अपने अधिकारों, सुरक्षा और भविष्य का भरोसा टिका देती है — वे स्वयं भ्रष्टाचार, अविश्वास और सत्ता-संरक्षण के आरोपों से घिरी दिखाई देती हैं। और इन्हीं सड़ते स्तंभों के नीचे दबा हुआ है भारत का आम नागरिक — एक ऐसा नागरिक जो जीवित तो है, लेकिन सम्मान से नहीं। यही “कांकरोच भारत” है। यह कोई गाली नहीं, बल्कि उस मानसिक और राजनीतिक स्थिति का प्रतीक है जिसमें जनता की पीड़ा को सामान्य बना दिया गया है। बेरोजगार युवा, कर्ज में डूबा किसान, महँगाई से टूटता मध्यवर्ग और भ्रष्टाचार से अपमानित नागरिक — सब धीरे-धीरे व्यवस्था की नजर में केवल आँकड़े बनते जा रहे हैं। भारत का सबसे बड़ा संकट आज बेरोजगारी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार युवा बेरोजगारी दर 2025 में लगभग 9.9 प्रतिशत रही, जबकि शहरी युवाओं में यह 13 प्रतिशत से अधिक तक पहुँची। कई स्वतंत्र अध्ययनों में यह दर और अधिक बताई गई है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परिवार अपनी बचत खर्च कर देते हैं। लेकिन फिर: पेपर लीक हो जाता है, भर्ती रद्द हो जाती है, या नियुक्ति वर्षों तक अटक जाती है। धीरे-धीरे वही युवा समाज की नजर में “निकम्मा” बन जाता है। भारत का युवा आज केवल नौकरी नहीं खोज रहा, वह सम्मान खोज रहा है। लेकिन व्यवस्था उसे केवल संख्या में बदल रही है। यही वह क्षण है जहाँ “कांकरोच भारत” का रूपक जन्म लेता है। कांकरोच वह जीव है जो हर परिस्थिति में जीवित रहता है, लेकिन जिसे घृणा और उपेक्षा से देखा जाता है। आज बेरोजगार युवा भी वैसी ही मानसिक स्थिति में पहुँचता जा रहा है। वह संघर्ष करता है, गिरता है, फिर उठता है, लेकिन व्यवस्था उसके दर्द को महसूस नहीं करती। यह संकट केवल आर्थिक नहीं, मानसिक भी है। NCRB के आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर वर्ष 1.7 लाख से अधिक आत्महत्याएँ दर्ज होती हैं। इनमें छात्रों और युवाओं की संख्या लगातार चिंता बढ़ा रही है। परीक्षा का दबाव, बेरोजगारी, ऋण और सामाजिक असफलता की भावना युवाओं को भीतर से तोड़ रही है। Major Causes of Youth Distress in India
लेकिन इस पूरे संकट के बीच देश किस बहस में उलझा हुआ है? हिंदू-मुस्लिम बहस में। देश की राजनीति ने एक नया कॉकटेल तैयार कर लिया है — धर्म, पहचान और भावनात्मक उत्तेजना का कॉकटेल। जनता को उसकी चुस्कियाँ दी जाती हैं ताकि वह अपनी वास्तविक समस्याएँ भूल जाए। युवा नौकरी माँगने के बजाय डिजिटल धार्मिक युद्धों में उलझ जाता है। किसान समर्थन मूल्य भूलकर सांप्रदायिक नारों में खो जाता है। मध्यवर्ग महँगाई से परेशान होते हुए भी टीवी स्टूडियो की उत्तेजना में डूब जाता है। यही भारत की सबसे बड़ी विडंबना है। देश की वास्तविक समस्याएँ: बेरोजगारी, शिक्षा संकट, स्वास्थ्य ढाँचा, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार, और संस्थागत पतन धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श से बाहर धकेली जा रही हैं। Public Concerns vs Political-Media Attention
भारत की कार्यपालिका पर भ्रष्टाचार के आरोप नए नहीं हैं। योजनाएँ बनती हैं, लेकिन ज़मीन तक पहुँचते-पहुँचते उनका प्रभाव खो जाता है। नौकरी भर्ती से लेकर ठेकों तक हर स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। यही कारण है कि नागरिक का भरोसा टूट रहा है। न्यायपालिका, जिसे लोकतंत्र का अंतिम रक्षक माना जाता है, वह भी विवादों से अछूती नहीं रही। जस्टिस वर्मा जैसे मामलों से जुड़े भ्रष्टाचार आरोपों ने जनता के भीतर गहरे प्रश्न पैदा किए। यदि न्याय देने वाली संस्था पर ही प्रश्न उठने लगें तो नागरिक कहाँ जाएगा? भारत में करोड़ों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। गरीब आदमी न्याय की प्रतीक्षा में बूढ़ा हो जाता है। न्याय महँगा भी है और धीमा भी। दूसरी ओर विधायिका — यानी संसद — भी जनता की समस्याओं के बजाय राजनीतिक टकराव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मंच बनती जा रही है। सांसदों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं: वेतन, भत्ते, सुरक्षा, सरकारी आवास, यात्रा, और विशेष सुविधाओं पर। यह लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जनता तब प्रश्न पूछती है जब उसी देश में: अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, और युवाओं के पास रोजगार नहीं। ऐसे समय में सांसदों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव जनता के भीतर असंतोष पैदा करते हैं। क्या: रोजगार उसी अनुपात में बढ़े? शिक्षा बेहतर हुई? न्याय तेज हुआ? प्रशासन अधिक जवाबदेह हुआ? यदि नहीं, तो सत्ता-संरचना का विस्तार जनता को लोकतंत्र नहीं, बोझ जैसा महसूस होने लगता है। भारत का मध्यवर्ग भी आज गहरे दबाव में है। EMI, शिक्षा खर्च, चिकित्सा खर्च और महँगाई ने उसकी कमर तोड़ दी है। छोटे और मझोले व्यवसाय बड़ी कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के सामने संघर्ष कर रहे हैं। एक तरफ युवा नौकरी के लिए भटक रहा है, दूसरी तरफ समाज सांप्रदायिक बहसों में विभाजित किया जा रहा है। यही वह स्थिति है जहाँ “हिंदू-मुस्लिम कॉकटेल” और “कांकरोच भारत” एक-दूसरे से जुड़ते हैं। कॉकटेल जनता को व्यस्त रखता है। कांकरोच व्यवस्था के नीचे दबा रहता है। भारत का युवा आज धीरे-धीरे बर्फ के टुकड़ों में बदलता जा रहा है — संवेदनहीन, ठंडा, निराश और दिशाहीन। वह भीतर से टूट रहा है, लेकिन बाहर से उत्तेजित दिखाई देता है। यह किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि जब युवा अपनी रचनात्मक शक्ति खो देता है, तब राष्ट्र का भविष्य भी कमजोर होने लगता है। भारत को आज एक नए विमर्श की आवश्यकता है। ऐसा विमर्श जिसमें: रोजगार केंद्र में हो, शिक्षा केंद्र में हो, विज्ञान और शोध केंद्र में हों, भ्रष्टाचार विरोधी सुधार केंद्र में हों, और नागरिक गरिमा सर्वोच्च मूल्य हो। धर्म समाज का हिस्सा हो सकता है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य केवल धार्मिक उत्तेजनाओं पर नहीं बनाया जा सकता। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र तब जीवित रहता है जब: न्याय बिके नहीं, प्रशासन झुके नहीं, संसद विभाजन नहीं, समाधान की जगह बने, और युवा स्वयं को बोझ नहीं, राष्ट्र की शक्ति महसूस करे। यदि लोकतंत्र के स्तंभों में दीमक लग जाए और उन्हीं के नीचे नागरिक “कांकरोच” जैसा जीवन जीने लगे, तो यह केवल आर्थिक संकट नहीं — सभ्यता का संकट बन जाता है। भारत अभी भी दिशा बदल सकता है। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि देश हिंदू-मुस्लिम कॉकटेल की चुस्कियों से बाहर निकलकर बेरोजगार, टूटते और बर्फ बनते युवाओं की ओर देखे।

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