चीन का Kashmir मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ संयुक्त बयान
बदलती विश्व व्यवस्था में Quadrilateral Security Dialogue की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, विशेषकर तब जब वैश्विक शक्ति-संतुलन तेज़ी से बदल रहा हो। लेकिन यह कहना कि QUAD “मरा हुआ संगठन” है, एक राजनीतिक या वैचारिक अतिशयोक्ति अधिक प्रतीत होती
फिर भी आपके तर्क के पीछे कुछ गंभीर कूटनीतिक संकेत अवश्य मौजूद हैं।
पहला पक्ष यह है कि भारत के QUAD में सक्रिय होने के बाद China और Russia दोनों ने कई मौकों पर भारत को लेकर अधिक रणनीतिक सतर्कता दिखाई है। विशेषकर चीन ने Kashmir मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ संयुक्त बयान देकर यह संकेत देने की कोशिश की कि यदि भारत अमेरिकी धुरी की ओर अधिक झुकेगा, तो चीन दक्षिण एशिया में भारत की संवेदनशीलताओं को चुनौती दे सकता है। यह भारत के लिए चेतावनी भी थी और दबाव की रणनीति भी।
दूसरा पक्ष यह है कि QUAD मूलतः कोई सैन्य गठबंधन नहीं है। इसमें India, United States, Japan और Australia शामिल हैं, और इसका घोषित उद्देश्य “मुक्त एवं खुला इंडो-पैसिफिक” है। भारत लंबे समय से इसे NATO जैसी संरचना बनने से रोकता रहा है। इसलिए भारत की रणनीति पूरी तरह अमेरिकी खेमे में जाने की नहीं बल्कि संतुलन बनाने की रही है।
लेकिन आलोचक यह तर्क देते हैं कि व्यवहारिक राजनीति में चीन QUAD को अमेरिका-समर्थित “घेराबंदी नीति” के रूप में देखता है। यही कारण है कि चीन ने पाकिस्तान के साथ सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग को और मजबूत किया। Pakistan के साथ चीन की निकटता केवल China-Pakistan Economic Corridor तक सीमित नहीं रही, बल्कि कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों तक विस्तारित हुई।
रूस का दृष्टिकोण भी महत्त्वपूर्ण है। Russia पारंपरिक रूप से भारत का रणनीतिक सहयोगी रहा है, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ी। ऐसी स्थिति में यदि भारत QUAD के माध्यम से अमेरिकी रणनीतिक ढांचे के करीब दिखता है, तो रूस के भीतर भी यह आशंका पैदा होती है कि भारत धीरे-धीरे पश्चिमी धुरी की ओर जा रहा है। हालांकि रूस अभी भी भारत को पूरी तरह विरोधी खेमे में नहीं मानता, क्योंकि रक्षा, ऊर्जा और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं।
यहाँ मूल प्रश्न भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” का है। भारत की विदेश नीति लंबे समय तक गुटनिरपेक्षता और संतुलन पर आधारित रही। आज चुनौती यह है कि:
चीन के बढ़ते प्रभाव को कैसे रोका जाए,
अमेरिका से तकनीकी और सामरिक लाभ कैसे लिया जाए,
और साथ ही रूस तथा वैश्विक दक्षिण के साथ संबंध भी कैसे बनाए रखें।
यदि QUAD भारत को चीन-विरोधी सैन्य धुरी के रूप में बाँध देता है, तो यह भारत की पारंपरिक विदेश नीति के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। लेकिन यदि भारत QUAD का उपयोग केवल समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, तकनीकी सहयोग और इंडो-पैसिफिक संतुलन तक सीमित रखता है, तो यह उसके लिए लाभकारी मंच भी बन सकता है।
इसलिए यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि QUAD की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू हुई है। यदि यह केवल चीन-विरोधी प्रतीक बनकर रह गया, तो इसकी उपयोगिता घटेगी। लेकिन यदि यह बहुध्रुवीय एशिया में संतुलनकारी मंच बन पाया, तो भारत इसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के साथ उपयोग कर सकता है।










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