BRICS, QUAD और G20 जैसे मंचों पर भारत के नेतृत्व क्षमता की परीक्षा
क्या भारत वैश्विक सहमति बनाने में अभी भी संघर्ष कर रहा है?
21वीं सदी की विश्व राजनीति में भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। कभी “विकासशील देशों की आवाज़” कहे जाने वाला भारत आज विश्व अर्थव्यवस्था, कूटनीति, तकनीक, जलवायु नीति और सामरिक संतुलन के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस प्रकार से वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है, उसने यह संकेत दिया है कि नई विश्व व्यवस्था में वह केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभाना चाहता है।
किन्तु नेतृत्व केवल आर्थिक आकार या जनसंख्या के आधार पर स्थापित नहीं होता। वास्तविक नेतृत्व की कसौटी तब होती है जब विविध हितों वाले देशों को एक साझा वक्तव्य, साझा दृष्टि और साझा दिशा पर सहमत कराया जाए। यहीं पर भारत की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है।
BRICS, QUAD और G20 जैसे मंचों पर भारत की अध्यक्षता ने यह अवसर प्रदान किया कि वह अपने कूटनीतिक कौशल और वैश्विक नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करे। लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी रहा कि इन मंचों पर कई बार भारत सभी देशों को एक संयुक्त वक्तव्य पर सहमत कराने में संघर्ष करता दिखाई दिया। यह स्थिति केवल भारत की चुनौती नहीं, बल्कि बदलती विश्व राजनीति की भी सच्चाई है।
आज दुनिया बहुध्रुवीयता, महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा, युद्धों, आर्थिक संरक्षणवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में किसी भी मंच पर सर्वसम्मति बनाना कठिन हो गया है। फिर भी प्रश्न उठता है कि क्या भारत अपनी “विश्वगुरु” और “वैश्विक दक्षिण के नेता” की छवि को वास्तविक कूटनीतिक प्रभाव में बदल पा रहा है? या फिर वह अभी भी एक ऐसी शक्ति है जो सम्मान तो प्राप्त कर रही है, परंतु निर्णायक सहमति निर्माण की क्षमता विकसित नहीं कर सकी है?
G20 : भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा
वर्ष 2023 में भारत ने G20 की अध्यक्षता संभाली। यह अवसर ऐतिहासिक था, क्योंकि पहली बार भारत ने इतनी बड़ी वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संरचना का नेतृत्व किया। भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” को थीम बनाकर यह संदेश देने का प्रयास किया कि विश्व विभाजन नहीं, बल्कि सहयोग की ओर बढ़े।
किन्तु G20 की वास्तविक चुनौती रूस-यूक्रेन युद्ध था। पश्चिमी देश चाहते थे कि संयुक्त वक्तव्य में रूस की आलोचना की जाए, जबकि रूस और चीन इसके विरोध में थे। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए।
दिल्ली शिखर सम्मेलन में अंततः एक साझा घोषणा-पत्र जारी हुआ, जिसे भारत की कूटनीतिक सफलता कहा गया। परंतु इसके पीछे यह वास्तविकता भी थी कि वक्तव्य की भाषा को इतना संतुलित और सामान्य बनाया गया कि वह किसी पक्ष की स्पष्ट आलोचना नहीं कर सका।
भारत ने युद्ध के बजाय “मानवीय पीड़ा”, “खाद्य और ऊर्जा संकट” तथा “संयुक्त राष्ट्र चार्टर” जैसी सामान्य अवधारणाओं पर सहमति बनाई। यह एक प्रकार की कूटनीतिक सफलता थी, लेकिन यह भी स्पष्ट था कि भारत महाशक्तियों के बीच निर्णायक सहमति नहीं बनवा सका।
असल में भारत ने टकराव को टालने का कार्य किया, समाधान प्रस्तुत करने का नहीं।
फिर भी G20 में भारत की एक बड़ी उपलब्धि रही — अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाना। इससे भारत ने यह संकेत दिया कि वह केवल पश्चिम और पूर्व के बीच संतुलन बनाने वाली शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनने का प्रयास कर रहा है।
BRICS : विस्तार के साथ बढ़ती जटिलताएँ
BRICS मूल रूप से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का मंच था, जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। भारत के लिए यह मंच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ वह पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में उभरते देशों के साथ सहयोग कर सकता है।
किन्तु BRICS के भीतर सबसे बड़ी चुनौती चीन है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, इंडो-पैसिफिक रणनीति और वैश्विक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा लगातार बनी हुई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद BRICS के भीतर रूस और चीन की निकटता भी बढ़ी है।
जब BRICS विस्तार का प्रश्न उठा और नए देशों को शामिल करने की बात हुई, तब भारत की स्थिति अत्यंत सावधानीपूर्ण थी। भारत नहीं चाहता था कि यह मंच पूरी तरह चीन-प्रभावित संरचना बन जाए। दूसरी ओर चीन BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में प्रस्तुत करना चाहता था।
ऐसे में भारत के लिए सभी देशों को एक साझा रणनीति पर लाना कठिन हो गया।
भारत BRICS को आर्थिक सहयोग, बहुध्रुवीयता और विकास के मंच के रूप में देखता है, जबकि चीन इसे अमेरिकी प्रभाव के विरुद्ध एक राजनीतिक धुरी बनाना चाहता है। यही वैचारिक अंतर BRICS की संयुक्त रणनीति को कमजोर करता है।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह BRICS में चीन की छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र नेतृत्व क्षमता कैसे स्थापित करे। क्योंकि यदि मंच पर चीन का प्रभाव अत्यधिक बढ़ता है, तो भारत की भूमिका केवल संतुलनकारी शक्ति तक सीमित रह सकती है।
QUAD : सुरक्षा मंच या रणनीतिक दुविधा?
Quadrilateral Security Dialogue अर्थात QUAD में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसका मूल उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना माना जाता है।
भारत के लिए QUAD एक अत्यंत संवेदनशील मंच है। एक ओर भारत चीन की आक्रामकता से चिंतित है, दूसरी ओर वह स्वयं को किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा भी नहीं दिखाना चाहता। यही कारण है कि भारत QUAD को “सहयोग मंच” बताता है, न कि “सैन्य गठबंधन”।
QUAD के भीतर भी कई मुद्दों पर पूर्ण सहमति नहीं दिखाई देती। अमेरिका चाहता है कि चीन के विरुद्ध अधिक स्पष्ट रणनीतिक रुख अपनाया जाए, जबकि भारत अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखना चाहता है।
यही कारण है कि QUAD अब तक NATO जैसी स्पष्ट सामूहिक सुरक्षा संरचना नहीं बन पाया।
भारत के सामने यहाँ दोहरी चुनौती है —
चीन के विरुद्ध सामरिक संतुलन बनाए रखना
अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता से बचना
भारत यदि QUAD में अत्यधिक अमेरिकी रेखा के करीब जाता है, तो उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि प्रभावित हो सकती है। यदि वह बहुत संतुलन बनाता है, तो QUAD की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
क्या भारत “सहमति निर्माता” बन पाया है?
भारत की विदेश नीति लंबे समय तक “गुटनिरपेक्षता” और “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है। आज भी भारत स्वयं को किसी एक धुरी में सीमित नहीं करना चाहता। यही उसकी ताकत भी है और चुनौती भी।
भारत रूस से तेल खरीदता है, अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता है, ईरान के साथ संपर्क बनाए रखता है और अरब देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करता है। यह बहुआयामी नीति भारत को लचीलापन देती है।
किन्तु वैश्विक नेतृत्व केवल संतुलन बनाने से स्थापित नहीं होता। नेतृत्व तब सिद्ध होता है जब कोई देश विरोधी पक्षों को साझा दिशा देने में सफल हो।
यहीं पर भारत अभी संक्रमणकाल में दिखाई देता है।
भारत की स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन उसकी निर्णायक प्रभावशीलता अभी सीमित है। कई देश भारत का सम्मान करते हैं, परंतु वे हमेशा भारत की पहल के अनुसार चलने को तैयार नहीं होते।
विश्व राजनीति का बदलता स्वरूप
यह भी समझना आवश्यक है कि आज का वैश्विक वातावरण शीत युद्ध के बाद के दौर से भिन्न है। अब कोई एक महाशक्ति पूरी दुनिया को नियंत्रित नहीं कर रही। अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप, क्षेत्रीय शक्तियाँ — सभी अपने-अपने हितों के अनुसार काम कर रहे हैं।
ऐसे समय में किसी भी मंच पर सर्वसम्मति बनाना अत्यंत कठिन हो गया है।
G20 में रूस-यूक्रेन युद्ध, BRICS में चीन-भारत प्रतिस्पर्धा और QUAD में रणनीतिक अस्पष्टता — ये केवल भारत की विफलताएँ नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वास्तविकताएँ हैं।
भारत की चुनौती यह है कि वह इस जटिल वातावरण में “विश्वसनीय मध्यस्थ” की भूमिका कैसे निभाए।
भारत की उपलब्धियाँ भी कम नहीं
हालाँकि आलोचनाएँ हैं, लेकिन भारत की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता।
भारत ने कोविड काल में वैक्सीन कूटनीति के माध्यम से अनेक देशों की सहायता की। “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु न्याय और विकासशील देशों के ऋण संकट जैसे मुद्दों को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विश्वसनीयता है।
पश्चिम भारत को चीन के विकल्प के रूप में देखता है। रूस भारत को भरोसेमंद साझेदार मानता है। अरब देश भारत को आर्थिक सहयोगी के रूप में देखते हैं। अफ्रीका भारत को उपनिवेशवादी अतीत से मुक्त साझेदार मानता है।
यह बहुआयामी स्वीकार्यता किसी भी उभरती शक्ति के लिए बड़ी उपलब्धि है।
चीन से तुलना क्यों होती है?
अक्सर भारत की तुलना चीन से की जाती है। चीन ने आर्थिक और सामरिक शक्ति के आधार पर कई देशों पर प्रभाव स्थापित किया है। बेल्ट एंड रोड परियोजना के माध्यम से उसने वैश्विक नेटवर्क तैयार किया।
भारत अभी उस स्तर की आर्थिक और वित्तीय शक्ति नहीं रखता। इसलिए उसका नेतृत्व “सॉफ्ट पावर”, लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और संतुलित कूटनीति पर आधारित है।
किन्तु समस्या यह है कि केवल नैतिकता और संतुलन से हमेशा निर्णायक प्रभाव नहीं बनता। इसके लिए आर्थिक क्षमता, तकनीकी श्रेष्ठता और संस्थागत प्रभाव भी आवश्यक होते हैं।
भारत को यदि वास्तविक वैश्विक नेतृत्व स्थापित करना है, तो उसे केवल नैतिक शक्ति नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक और सामरिक प्रभाव भी बढ़ाना होगा।
आगे की राह
भारत के सामने आने वाले वर्षों में कई महत्वपूर्ण अवसर हैं। यदि वह वैश्विक दक्षिण, इंडो-पैसिफिक और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के बीच संतुलनकारी नेतृत्व विकसित कर पाता है, तो उसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है।
इसके लिए भारत को कुछ क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा—
आर्थिक शक्ति का तीव्र विस्तार
तकनीकी और रक्षा आत्मनिर्भरता
क्षेत्रीय कूटनीति में स्थिरता
पड़ोसी देशों के साथ विश्वास निर्माण
वैश्विक संकटों पर स्पष्ट और व्यावहारिक पहल
भारत को केवल “सभ्यतागत शक्ति” की छवि से आगे बढ़कर “नीति-निर्धारक शक्ति” बनना होगा।
निष्कर्ष
BRICS, QUAD और G20 जैसे मंचों पर भारत की अध्यक्षता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब वैश्विक राजनीति के केंद्र में पहुँच चुका है। दुनिया उसकी बात सुन रही है, उसकी भूमिका को महत्व दे रही है और उसे संभावित नेतृत्वकर्ता के रूप में देख रही है।
किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं पहुँचा जहाँ वह विरोधी वैश्विक शक्तियों को स्थायी सहमति पर ला सके।
भारत ने कई बार संवाद बचाया है, तनाव कम किया है और मंचों को टूटने से रोका है — लेकिन पूर्ण सहमति निर्माण की क्षमता अभी विकसित हो रही है।
आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या वह “संतुलनकारी शक्ति” से आगे बढ़कर “निर्णायक वैश्विक नेतृत्व” बन पाएगा।
यदि भारत यह क्षमता विकसित कर लेता है, तो 21वीं सदी वास्तव में भारत की सदी कहलाने की दिशा में बढ़ सकती है।










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