पाकिस्तान : विश्व राजनीति का “छायाग्रह” और कलंकित सैन्य शक्तियों का महाशक्तियों द्वारा उपयोग
क्या वैश्विक सामरिक खेल में पाकिस्तान केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि महाशक्तियों का रणनीतिक औज़ार बन चुका है?
विश्व राजनीति का इतिहास केवल सभ्यताओं, विचारधाराओं और अर्थव्यवस्थाओं का इतिहास नहीं है; यह उन राष्ट्रों का भी इतिहास है जिन्हें महाशक्तियों ने अपने सामरिक हितों के लिए प्रयोग किया। कभी इन्हें “फ्रंटलाइन स्टेट” कहा गया, कभी “रणनीतिक साझेदार”, तो कभी “क्षेत्रीय सहयोगी”। लेकिन वास्तविकता यह रही कि ऐसे देशों को अक्सर महाशक्तियों ने अपने भू-राजनीतिक संघर्षों के उपकरण के रूप में उपयोग किया। दक्षिण एशिया में यदि किसी राष्ट्र ने इस भूमिका को सबसे अधिक निभाया है, तो वह Pakistan है।
पाकिस्तान केवल एक राष्ट्र नहीं रहा; वह विश्व राजनीति का ऐसा “छायाग्रह” बन गया, जिसकी उपस्थिति हमेशा किसी बड़ी शक्ति की परछाई में दिखाई देती है। कभी अमेरिका की छाया, कभी चीन की रणनीति और कभी इस्लामी भू-राजनीति की धुरी। पाकिस्तान की विदेश नीति का बड़ा हिस्सा अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय शक्ति पर नहीं, बल्कि महाशक्तियों की आवश्यकताओं पर आधारित रहा है।
यही कारण है कि आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद और सैन्य हस्तक्षेपों से घिरा होने के बावजूद पाकिस्तान विश्व राजनीति से कभी अप्रासंगिक नहीं हुआ। उसका अस्तित्व कई बार उसकी अपनी शक्ति से अधिक, महाशक्तियों के हितों की वजह से बना रहा।
विभाजन से “सुरक्षा राज्य” बनने तक
1947 में पाकिस्तान का जन्म केवल एक नए राष्ट्र का जन्म नहीं था; वह दक्षिण एशिया में असुरक्षा, पहचान संकट और सैन्य मानसिकता के उदय की शुरुआत भी था। पाकिस्तान के शासक वर्ग ने प्रारंभ से ही यह समझ लिया था कि भारत के मुकाबले वह आर्थिक, जनसंख्या और संसाधनों के स्तर पर टिक नहीं सकता। इसलिए उसने अपनी राष्ट्रीय पहचान को “सुरक्षा राज्य” में बदलना शुरू किया।
यहीं से पाकिस्तान की विदेश नीति का पहला सिद्धांत बना — किसी बड़ी शक्ति के संरक्षण में रहना।
शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान ने स्वयं को अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट का हिस्सा बना लिया। वह SEATO और CENTO जैसे सैन्य गठबंधनों में शामिल हुआ। अमेरिका के लिए पाकिस्तान सोवियत प्रभाव को रोकने का उपकरण था। बदले में पाकिस्तान को सैन्य सहायता, आर्थिक मदद और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण मिला।
यहाँ से पाकिस्तान की सेना केवल राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था नहीं रही; वह पश्चिमी रणनीति की क्षेत्रीय शाखा बनती चली गई।
अफगान युद्ध और “जिहाद” की प्रयोगशाला
1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में प्रवेश ने पाकिस्तान की रणनीतिक उपयोगिता को अचानक बढ़ा दिया। अमेरिका को अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध युद्ध लड़ने के लिए एक ऐसे सहयोगी की आवश्यकता थी जो भूगोल, खुफिया नेटवर्क और इस्लामी भावनाओं — तीनों स्तरों पर उपयोगी हो। पाकिस्तान इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त था।
यहीं से पाकिस्तान विश्व राजनीति के सबसे खतरनाक प्रयोगों में शामिल हुआ।
अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने मिलकर “जिहादी नेटवर्क” को तैयार किया। हथियार दिए गए, धार्मिक कट्टरता को वैचारिक हथियार बनाया गया और अफगान युद्ध को “इस्लामी प्रतिरोध” का रूप दिया गया।
उस समय यह रणनीति अमेरिका के लिए उपयोगी थी। सोवियत संघ कमजोर हुआ और अंततः विघटित हो गया। लेकिन इस प्रयोग ने दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में आतंकवाद की ऐसी आग पैदा की, जिसकी लपटें आज तक दिखाई देती हैं।
पाकिस्तान इस खेल का केंद्र था। उसने स्वयं को महाशक्तियों के लिए अनिवार्य साबित कर दिया।
आतंकवाद और दोहरी नीति
सोवियत वापसी के बाद भी पाकिस्तान की रणनीति नहीं बदली। उसने जिहादी संगठनों को अपनी क्षेत्रीय नीति का हिस्सा बनाए रखा। कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान तक, आतंकवादी संगठनों को “रणनीतिक संपत्ति” की तरह उपयोग किया गया।
लेकिन विश्व राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा कि जिन शक्तियों ने कभी इन नेटवर्कों को तैयार किया, वही बाद में आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की बात करने लगीं।
9/11 के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध शुरू किया। विडंबना यह थी कि जिस पाकिस्तान पर आतंकवादी नेटवर्कों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे, उसी पाकिस्तान को अमेरिका ने फिर अपना प्रमुख सहयोगी बना लिया।
यह विश्व राजनीति का कठोर यथार्थ था। अमेरिका जानता था कि पाकिस्तान दोहरा खेल खेल रहा है, फिर भी वह उसे छोड़ नहीं सकता था। कारण था उसकी भू-राजनीतिक आवश्यकता।
यहीं पाकिस्तान “छायाग्रह” की तरह दिखाई देता है — ऐसा राष्ट्र जो स्वयं प्रकाशमान नहीं, बल्कि महाशक्तियों की रणनीतिक रोशनी से चमकता है।
चीन की नई छाया
21वीं सदी में जब चीन का उदय शुरू हुआ, तब पाकिस्तान की भूमिका फिर बदल गई। अब वह अमेरिका की तुलना में चीन के लिए अधिक उपयोगी बनने लगा।
China ने पाकिस्तान को केवल मित्र नहीं, बल्कि अपनी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बनाया। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इसी रणनीति का परिणाम है।
चीन के लिए पाकिस्तान के महत्व के कई कारण हैं—
हिंद महासागर तक पहुँच
भारत को सामरिक दबाव में रखना
पश्चिम एशिया के ऊर्जा मार्गों के निकट उपस्थिति
दक्षिण एशिया में प्रभाव विस्तार
पाकिस्तान ने भी इस साझेदारी को अपने अस्तित्व की सुरक्षा के रूप में देखा। उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था को चीनी निवेश का सहारा मिला। उसकी सेना को चीन का सैन्य समर्थन मिला। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चीन ने पाकिस्तान का संरक्षण किया।
लेकिन यहाँ भी वास्तविकता वही रही — पाकिस्तान स्वयं शक्ति नहीं बना; वह एक बड़ी शक्ति की रणनीति का माध्यम बना।
महाशक्तियों का “उपयोगी अस्थिर राष्ट्र”
विश्व राजनीति में कई बार महाशक्तियाँ स्थिर लोकतंत्रों से अधिक “उपयोगी अस्थिर राष्ट्रों” को प्राथमिकता देती हैं। कारण यह है कि ऐसे राष्ट्र रणनीतिक दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं और उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है।
पाकिस्तान इसका उदाहरण बन गया।
उसकी सेना ने राष्ट्रीय राजनीति पर नियंत्रण बनाए रखा। लोकतंत्र कमजोर रहा। आर्थिक संकट लगातार गहराते रहे। लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान को कभी पूरी तरह अलग-थलग नहीं किया गया।
क्यों?
क्योंकि महाशक्तियों के लिए वह उपयोगी था।
अमेरिका के लिए वह अफगान नीति का हिस्सा था।
चीन के लिए वह भारत-विरोधी संतुलन का उपकरण है।
कुछ इस्लामी देशों के लिए वह परमाणु क्षमता वाला सैन्य सहयोगी है।
इस प्रकार पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं के बावजूद बाहरी संरक्षण प्राप्त करता रहा।
“कलंकित सैन्य शक्तियाँ” और वैश्विक पाखंड
विश्व राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड यह है कि महाशक्तियाँ सार्वजनिक रूप से लोकतंत्र, मानवाधिकार और शांति की बात करती हैं, लेकिन अपने हितों के लिए सैन्य शासन, कट्टर नेटवर्क और अस्थिर व्यवस्थाओं का उपयोग करने से नहीं हिचकतीं।
पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
जब सैन्य तख्तापलट हुए, तब भी पश्चिमी देशों ने संबंध बनाए रखे। जब आतंकवादी संगठनों पर आरोप लगे, तब भी रणनीतिक सहयोग जारी रहा। जब लोकतंत्र कमजोर हुआ, तब भी सहायता बंद नहीं हुई।
यानी सिद्धांतों से अधिक महत्व हितों का रहा।
यही कारण है कि पाकिस्तान कई बार “कलंकित सैन्य शक्तियों” का प्रतीक दिखाई देता है — ऐसा राष्ट्र जिसकी सेना केवल राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों की सक्रिय खिलाड़ी बन गई।
भारत के लिए चुनौती
India के लिए यह स्थिति हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। भारत स्वयं को लोकतांत्रिक, स्वतंत्र और रणनीतिक रूप से स्वायत्त शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन उसके पड़ोस में ऐसा राष्ट्र मौजूद है जिसे महाशक्तियाँ अपने हितों के अनुसार उपयोग करती रही हैं।
भारत की समस्या यह रही कि उसने नैतिक वैधता तो प्राप्त की, लेकिन कई बार वह उस स्तर की रणनीतिक आक्रामकता नहीं दिखा पाया जो महाशक्तियों को अपने पक्ष में निर्णायक रूप से खड़ा कर सके।
यही कारण है कि कई बार पाकिस्तान अपनी वास्तविक क्षमता से अधिक प्रभावशाली दिखाई देता है।
क्या पाकिस्तान वास्तव में सफल है?
यदि दीर्घकालिक दृष्टि से देखा जाए, तो उत्तर नकारात्मक है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है। लोकतंत्र कमजोर है। कट्टरता और अस्थिरता ने उसके सामाजिक ढाँचे को प्रभावित किया है। उसकी विदेश नीति अत्यधिक बाहरी निर्भरता पर आधारित हो चुकी है।
रणनीतिक उपयोगिता अस्थायी प्रभाव तो दे सकती है, लेकिन स्थायी शक्ति नहीं।
इसके विपरीत भारत की शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, जनसांख्यिकीय आधार और वैश्विक स्वीकार्यता पर आधारित है। यह धीमी शक्ति है, लेकिन अधिक स्थायी हो सकती है।
निष्कर्ष : विश्व राजनीति का “छायाग्रह”
पाकिस्तान आज भी विश्व राजनीति में इसलिए उपस्थित है क्योंकि वह स्वयं महाशक्ति नहीं, बल्कि महाशक्तियों की रणनीतियों का उपयोगी केंद्र बना हुआ है। वह कभी अमेरिका की छाया में खड़ा दिखाई देता है, कभी चीन की रणनीतिक ढाल के रूप में।
इस अर्थ में पाकिस्तान वास्तव में विश्व राजनीति का “छायाग्रह” बन चुका है — ऐसा ग्रह जो स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करता, बल्कि दूसरों की रोशनी से दिखाई देता है।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जो राष्ट्र अपनी स्वतंत्र शक्ति के बजाय बाहरी संरक्षण पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, वे लंबे समय तक स्थायी नेतृत्व स्थापित नहीं कर पाते।
विश्व राजनीति के इस कठोर खेल में पाकिस्तान उपयोगी अवश्य रहा है, लेकिन निर्णायक नहीं। और यही अंतर “रणनीतिक औज़ार” और “स्वतंत्र शक्ति” के बीच की सबसे बड़ी रेखा है।










टिप्पणियाँ