भारत इटली पारंपरिक संबंध और मोदी की यात्रा
भारत और इटली के संबंधों का इतिहास केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच हजारों वर्षों से चले आ रहे सांस्कृतिक, व्यापारिक और वैचारिक संपर्क का इतिहास भी है। भूमध्यसागर के किनारे स्थित इटली और हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित भारत भौगोलिक रूप से भले दूर दिखाई देते हों, लेकिन इतिहास के पन्नों में दोनों देशों के बीच एक गहरा संपर्क दिखाई देता है। रोमन साम्राज्य के समय भारत से मसाले, रेशम, हाथीदांत, कीमती पत्थर और कपास यूरोप पहुंचते थे। दक्षिण भारत के कई बंदरगाहों पर रोमन व्यापारियों की उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं। आज भी तमिलनाडु और केरल के कुछ क्षेत्रों में रोमन सिक्के और पुरातात्विक अवशेष पाए जाते हैं जो इस ऐतिहासिक संपर्क की पुष्टि करते हैं। उस समय भारत को समृद्धि, ज्ञान और विलासिता की भूमि माना जाता था, जबकि रोम यूरोप की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का केंद्र था। इस प्रकार भारत और इटली के बीच प्रारंभिक संबंध व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर आधारित थे।
मध्यकाल में यूरोप और एशिया के बीच व्यापारिक मार्गों में बदलाव आया, फिर भी भारत के प्रति इटली की रुचि समाप्त नहीं हुई। प्रसिद्ध इतालवी यात्री मार्को पोलो ने भारत की यात्रा की और अपने अनुभवों में भारतीय समाज, व्यापार और संस्कृति का उल्लेख किया। पुनर्जागरण काल में यूरोप में भारत के दर्शन, गणित और पूर्वी ज्ञान पर नई जिज्ञासा उत्पन्न हुई। आधुनिक युग में जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश था, तब भी इटली के बुद्धिजीवियों और यात्रियों के बीच भारत के प्रति एक आकर्षण बना रहा। महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के विचारों का प्रभाव यूरोप के कई देशों की तरह इटली में भी देखा गया।
स्वतंत्र भारत और इटली के औपचारिक राजनयिक संबंध 1947 में स्थापित हुए। दोनों देशों ने लोकतंत्र, बहुलतावाद और सांस्कृतिक विविधता जैसे मूल्यों को साझा आधार माना। शीत युद्ध के दौरान भारत गुटनिरपेक्ष नीति पर चलता रहा जबकि इटली पश्चिमी गुट और NATO का हिस्सा था, फिर भी दोनों देशों के बीच संबंध स्थिर बने रहे। समय के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ा और इटली भारत के महत्वपूर्ण यूरोपीय व्यापारिक साझेदारों में शामिल हो गया। विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, मशीनरी, टेक्सटाइल डिजाइन, फैशन, चमड़ा उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में इटली की विशेषज्ञता ने भारत को आकर्षित किया। कई इतालवी कंपनियों ने भारत में निवेश किया और भारतीय उद्योगों ने भी इटली के बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाई।
भारत और इटली के संबंधों में सांस्कृतिक आयाम भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इटली विश्व प्रसिद्ध कला, स्थापत्य और पुनर्जागरण की भूमि माना जाता है, जबकि भारत अपनी प्राचीन सभ्यता, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। दोनों देशों के बीच कला प्रदर्शनियों, सांस्कृतिक उत्सवों, फिल्म समारोहों और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से लगातार संपर्क बढ़ा है। भारतीय योग, आयुर्वेद और दर्शन में इटली के लोगों की रुचि बढ़ी है, वहीं भारतीय समाज में इटली के फैशन, डिजाइन और वास्तुकला को लेकर आकर्षण देखा गया है। रोम, फ्लोरेंस और वेनिस जैसे इतालवी शहर भारतीय पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण रखते हैं, जबकि भारत के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थलों की ओर भी इतालवी पर्यटकों का रुझान बढ़ा है।
हालांकि दोनों देशों के संबंध हमेशा पूरी तरह सहज नहीं रहे। 2012 में केरल के समुद्री क्षेत्र में दो भारतीय मछुआरों की हत्या के मामले में इतालवी नौसैनिकों की गिरफ्तारी ने दोनों देशों के संबंधों में तनाव पैदा कर दिया था। यह मुद्दा कई वर्षों तक राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद का कारण बना रहा। उस समय भारत और यूरोपीय संघ के संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। लेकिन समय के साथ दोनों देशों ने संवाद और कूटनीतिक समझदारी के माध्यम से इस विवाद को नियंत्रित किया। इसके बाद दोनों देशों ने महसूस किया कि दीर्घकालिक रणनीतिक हित किसी एक विवाद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और इटली के संबंधों में फिर से तेजी से सुधार देखा गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच बढ़ती राजनीतिक समझ ने दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दी है। विशेष रूप से G20 शिखर सम्मेलनों और वैश्विक मंचों पर दोनों नेताओं की मुलाकातों ने यह संकेत दिया कि भारत और इटली अब केवल पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि रणनीतिक साझेदारी को नए स्तर तक ले जाना चाहते हैं। जॉर्जिया मेलोनी दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी राजनीति की प्रतिनिधि मानी जाती हैं, जबकि नरेंद्र मोदी भी भारत में मजबूत राष्ट्रवादी नेतृत्व के रूप में देखे जाते हैं। दोनों नेताओं की राजनीतिक शैली और राष्ट्रहित आधारित दृष्टिकोण ने आपसी संवाद को अधिक सहज बनाया है। सोशल मीडिया पर “Melodi” शब्द काफी चर्चित हुआ, जो मेलोनी और मोदी के नामों का मिश्रण था। हालांकि यह एक हल्का और लोकप्रिय सोशल मीडिया ट्रेंड था, लेकिन इसने दोनों देशों के बीच बढ़ती राजनीतिक निकटता को भी प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इटली यात्रा को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। मई 2026 में हुई यह यात्रा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण रही। यह केवल एक औपचारिक राजनयिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यूरोप में भारत की नई रणनीतिक भूमिका को स्थापित करने का प्रयास भी थी। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन के बढ़ते प्रभाव, पश्चिम एशिया की अस्थिरता और वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव के दौर में भारत और इटली दोनों अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार नए सहयोगी ढूंढ रहे हैं। भारत यूरोप में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करना चाहता है, जबकि इटली एशिया में विश्वसनीय साझेदारों के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत और इटली के संबंधों को “Special Strategic Partnership” तक उन्नत करना माना गया। यह केवल एक राजनयिक शब्द नहीं है, बल्कि इससे संकेत मिलता है कि दोनों देश रक्षा, तकनीक, व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक राजनीति जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। पहले दोनों देशों के संबंध मुख्यतः व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित थे, लेकिन अब वे रणनीतिक और भू-राजनीतिक सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं।
रक्षा सहयोग इस यात्रा का प्रमुख केंद्र रहा। भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए लंबे समय से रूस, फ्रांस, अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब वह यूरोप के अन्य देशों के साथ भी रक्षा तकनीक और सह-उत्पादन बढ़ाने की नीति अपना रहा है। इटली रक्षा उपकरण, नौसैनिक तकनीक और एयरोस्पेस क्षेत्र में महत्वपूर्ण क्षमता रखता है। दोनों देशों ने रक्षा तकनीक के सह-विकास और सह-उत्पादन पर जोर दिया। यह भारत की “मेक इन इंडिया” और आत्मनिर्भर रक्षा नीति के अनुरूप भी है। हिंद महासागर और भूमध्यसागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर भी दोनों देशों ने सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता और वैश्विक व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के संदर्भ में यह सहयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा में India-Middle East-Europe Economic Corridor यानी IMEC परियोजना पर भी विशेष ध्यान दिया गया। यह परियोजना भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप को जोड़ने वाली एक नई आर्थिक और व्यापारिक धुरी के रूप में देखी जा रही है। इसका उद्देश्य समुद्री और रेल संपर्क के माध्यम से व्यापार को तेज़ और अधिक सुरक्षित बनाना है। भारत इसे चीन की Belt and Road Initiative के विकल्प के रूप में देखता है। इटली इस परियोजना में यूरोप के प्रवेश द्वार की भूमिका निभा सकता है। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक दूरी और समय दोनों कम हो सकते हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका मजबूत होगी और यूरोप को चीन पर निर्भरता कम करने का अवसर मिलेगा।
व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी इस यात्रा के महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। भारत और इटली ने आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब यूरो तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा। वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिस्थिति में यह लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी माना जा रहा है। दोनों देशों ने कृषि तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण, हरित ऊर्जा, मशीनरी, ऑटोमोबाइल और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने पर चर्चा की। इटली की कई मध्यम और लघु उद्योग आधारित कंपनियां भारतीय बाजार में संभावनाएं देख रही हैं, जबकि भारत अपने विशाल उपभोक्ता बाजार और कुशल मानव संसाधन के माध्यम से यूरोपीय निवेश आकर्षित करना चाहता है।
तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी Artificial Intelligence भी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण विषय रहा। प्रधानमंत्री मोदी और जॉर्जिया मेलोनी ने संयुक्त रूप से यह बात कही कि “इटली के पास तकनीक है और भारत के पास प्रतिभा।” यह कथन दोनों देशों के सहयोग की दिशा को स्पष्ट करता है। भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है और उसके पास विशाल तकनीकी मानव संसाधन है, जबकि इटली उच्च गुणवत्ता वाली इंजीनियरिंग, डिजाइन और विनिर्माण क्षमता के लिए जाना जाता है। AI, साइबर सुरक्षा, क्वांटम तकनीक और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग भविष्य में महत्वपूर्ण परिणाम दे सकता है।
इस यात्रा का एक दिलचस्प और प्रतीकात्मक पहलू “Melodi Diplomacy” भी रहा। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जॉर्जिया मेलोनी को “Melody” टॉफी भेंट करने की घटना सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रही। भारतीय कूटनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों और व्यक्तिगत संबंधों का उपयोग नया नहीं है। नरेंद्र मोदी अक्सर अपने विदेशी दौरों में सांस्कृतिक और भावनात्मक संकेतों का उपयोग करते हैं जिससे व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ाव बढ़ता है। यह घटना भले हल्की प्रतीत हो, लेकिन इसने दोनों नेताओं के बीच सहज संबंधों की छवि को और मजबूत किया। आधुनिक कूटनीति में व्यक्तिगत रसायनशास्त्र यानी political chemistry भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है और भारत-इटली संबंधों में इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा को व्यापक वैश्विक राजनीति के संदर्भ में भी समझना आवश्यक है। यूरोप इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित किया है। चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव और अमेरिका-यूरोप संबंधों में बदलती प्राथमिकताओं के कारण यूरोपीय देश एशिया में नए रणनीतिक साझेदारों की तलाश कर रहे हैं। भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक दक्षिण की एक महत्वपूर्ण आवाज बनकर उभरा है। ऐसे में इटली जैसे देश भारत के साथ अपने संबंधों को अधिक गहरा करना चाहते हैं।
दूसरी ओर भारत भी यूरोप के साथ अपने संबंधों को केवल व्यापार तक सीमित नहीं रखना चाहता। भारत समझता है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में यूरोप के प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध उसकी रणनीतिक शक्ति को बढ़ाते हैं। फ्रांस के बाद अब इटली के साथ बढ़ती निकटता इसी नीति का हिस्सा मानी जा रही है। भारत अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच संतुलन बनाकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना चाहता है।
इस यात्रा का प्रभाव भारतीय छात्रों और पेशेवरों पर भी पड़ सकता है। हाल के वर्षों में इटली में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ी है। इंजीनियरिंग, फैशन डिजाइन, कला और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भारतीय युवाओं की रुचि बढ़ रही है। दोनों देशों के बीच Mobility and Migration Agreement से छात्रों, शोधकर्ताओं और कुशल पेशेवरों की आवाजाही आसान हो सकती है। इससे न केवल शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि दोनों समाजों के बीच मानवीय संपर्क भी मजबूत होंगे।
भारत और इटली के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दोनों देश लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखने की कोशिश करते हैं। यूरोप में बढ़ते राष्ट्रवाद और एशिया में बदलती शक्ति संरचना के बीच दोनों देशों के नेतृत्व में एक प्रकार की वैचारिक समानता भी दिखाई देती है। हालांकि दोनों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी राष्ट्रीय हित आधारित राजनीति और सांस्कृतिक पहचान पर जोर देने की प्रवृत्ति दोनों नेतृत्वों में देखी जाती है।
भविष्य की दृष्टि से देखें तो भारत और इटली के संबंध केवल द्विपक्षीय नहीं रहेंगे, बल्कि वे यूरोप-भारत संबंधों के बड़े ढांचे का हिस्सा बन सकते हैं। IMEC जैसी परियोजनाएं, रक्षा सहयोग, डिजिटल साझेदारी और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में संयुक्त प्रयास आने वाले वर्षों में दोनों देशों को और करीब ला सकते हैं। भारत की आर्थिक वृद्धि और यूरोप की तकनीकी क्षमता मिलकर एक नई साझेदारी का आधार बना सकती है।
अंततः कहा जा सकता है कि भारत और इटली के संबंध इतिहास, संस्कृति और व्यापार से शुरू होकर अब रणनीतिक और वैश्विक राजनीति के नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इटली यात्रा ने इस परिवर्तन को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है। यह यात्रा केवल समझौतों और घोषणाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने यह संकेत दिया कि आने वाले समय में भारत और इटली वैश्विक मंच पर अधिक निकट सहयोगी के रूप में उभर सकते हैं। बदलती विश्व व्यवस्था में दोनों देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे साझेदारी मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें व्यापार, तकनीक, रक्षा, संस्कृति और कूटनीति सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि मोदी की यह यात्रा केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत-यूरोप संबंधों के भविष्य की दिशा तय करने वाली एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखी जा रही है।









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