गुटनिरपेक्षता का गुट और वैश्विक खेमेबंदी का नया दौर
क्या विश्व राजनीति फिर शीत युद्ध जैसी ध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है?
20वीं सदी के मध्य में जब दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले दो गुटों में बँट चुकी थी, तब एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नवस्वतंत्र देशों ने एक तीसरा मार्ग खोजने का प्रयास किया। यह मार्ग था — गुटनिरपेक्षता। इसका उद्देश्य केवल किसी सैन्य गठबंधन से दूरी बनाना नहीं था, बल्कि नवउपनिवेशवाद, महाशक्तियों की दादागिरी और वैचारिक गुलामी से मुक्त रहकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना भी था।
Non-Aligned Movement उसी ऐतिहासिक आवश्यकता का परिणाम था। Jawaharlal Nehru, Josip Broz Tito, Gamal Abdel Nasser और Sukarno जैसे नेताओं ने यह विचार दिया कि दुनिया केवल दो महाशक्तियों के बीच बँटकर नहीं चल सकती। विकासशील देशों को अपनी स्वतंत्र पहचान और सामूहिक आवाज़ बनानी होगी।
लेकिन 21वीं सदी में विश्व राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर पहुँचती दिखाई दे रही है जहाँ “गुटनिरपेक्षता” की पुरानी अवधारणा नई चुनौतियों से घिर गई है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम संघर्ष, इंडो-पैसिफिक रणनीति, तकनीकी युद्ध, ऊर्जा संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की राजनीति ने दुनिया को फिर से नए खेमों में बाँटना शुरू कर दिया है।
ऐसे समय में प्रश्न उठता है — क्या गुटनिरपेक्षता अब केवल इतिहास का अध्याय बनती जा रही है? या फिर वैश्विक दक्षिण नए रूप में “गुटनिरपेक्षता का नया गुट” तैयार कर रहा है?
शीत युद्ध की गुटबंदी और गुटनिरपेक्षता का जन्म
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो हिस्सों में बँट गई थी। एक ओर अमेरिका के नेतृत्व वाला पूंजीवादी गुट था, दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी गुट। दोनों महाशक्तियाँ केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि विचारधारा, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति के माध्यम से पूरी दुनिया पर प्रभाव स्थापित करना चाहती थीं।
नवस्वतंत्र देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे किस गुट का हिस्सा बनें। लेकिन कई देशों ने यह महसूस किया कि किसी भी गुट में शामिल होना उनकी स्वतंत्र विदेश नीति को सीमित कर देगा।
यहीं से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म हुआ।
भारत ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई। नेहरू का मानना था कि विकासशील देशों को महाशक्तियों के संघर्ष का मोहरा नहीं बनना चाहिए। गुटनिरपेक्षता केवल तटस्थता नहीं थी; यह स्वतंत्र निर्णय क्षमता का राजनीतिक दर्शन था।
क्या गुटनिरपेक्षता वास्तव में सफल रही?
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने उपनिवेशवाद विरोध, नस्लभेद विरोध और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को मजबूत किया। संयुक्त राष्ट्र में इस समूह ने पश्चिमी शक्तियों के वर्चस्व को चुनौती दी।
लेकिन इसकी सीमाएँ भी थीं।
कई गुटनिरपेक्ष देश व्यवहार में किसी न किसी महाशक्ति के करीब थे। आर्थिक सहायता, सैन्य सुरक्षा और राजनीतिक दबावों ने गुटनिरपेक्षता को कई बार आदर्शवादी अवधारणा तक सीमित कर दिया।
फिर भी यह आंदोलन महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने पहली बार यह संदेश दिया कि दुनिया केवल दो महाशक्तियों की इच्छा से नहीं चलेगी।
नया वैश्विक संघर्ष : अमेरिका बनाम चीन
21वीं सदी में सोवियत संघ समाप्त हो चुका है, लेकिन खेमेबंदी की राजनीति समाप्त नहीं हुई। अब दुनिया अमेरिका और China के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के नए दौर में प्रवेश कर रही है।
यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं है। यह तकनीक, व्यापार, समुद्री मार्गों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और वैश्विक प्रभाव का संघर्ष है।
अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को संतुलित करना चाहता है। QUAD और AUKUS जैसी संरचनाएँ इसी रणनीति का हिस्सा हैं। दूसरी ओर चीन बेल्ट एंड रोड परियोजना, BRICS विस्तार और वैश्विक निवेश के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
यानी दुनिया फिर नए खेमों की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और नई ध्रुवीयता
Russia-Ukraine War ने इस खेमेबंदी को और स्पष्ट कर दिया। पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, जबकि चीन और कई विकासशील देशों ने पूर्ण पश्चिमी लाइन का समर्थन नहीं किया।
भारत जैसे देशों ने संतुलित नीति अपनाई। उन्होंने रूस की खुली आलोचना नहीं की, लेकिन युद्ध का खुला समर्थन भी नहीं किया।
यहीं से “नई गुटनिरपेक्षता” की चर्चा शुरू हुई।
यह नई गुटनिरपेक्षता पुरानी तरह की वैचारिक तटस्थता नहीं, बल्कि “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है। देश अब किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अपने हितों के अनुसार बहुध्रुवीय संबंध बनाना चाहते हैं।
भारत और नई गुटनिरपेक्षता
India आज स्वयं को इसी नई रणनीतिक स्वायत्तता का प्रतीक बताता है। भारत QUAD में भी है और BRICS में भी। वह अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता है, लेकिन रूस से ऊर्जा खरीदना भी जारी रखता है।
भारत की यह नीति पुराने गुटनिरपेक्ष आंदोलन का आधुनिक रूप मानी जा सकती है।
लेकिन अंतर यह है कि आज की दुनिया शीत युद्ध जैसी सरल नहीं है। तब दो स्पष्ट गुट थे। आज शक्ति के कई केंद्र हैं। चीन आर्थिक महाशक्ति है, अमेरिका सैन्य और तकनीकी महाशक्ति है, रूस सामरिक शक्ति है और यूरोप अलग धुरी बनने का प्रयास कर रहा है।
ऐसे में पूर्ण गुटनिरपेक्षता लगभग असंभव हो गई है।
“ग्लोबल साउथ” : नया गुट?
आज “ग्लोबल साउथ” की अवधारणा तेजी से उभर रही है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, जलवायु न्याय और आर्थिक संतुलन की मांग कर रहे हैं।
भारत स्वयं को इस समूह की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या ग्लोबल साउथ वास्तव में एकजुट है?
वास्तविकता यह है कि विकासशील देशों के हित भी अलग-अलग हैं। कुछ देश चीन के करीब हैं, कुछ अमेरिका के। कुछ रूस पर निर्भर हैं, तो कुछ पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं पर।
इसलिए “ग्लोबल साउथ” अभी भावनात्मक और राजनीतिक अवधारणा अधिक है, संगठित शक्ति कम।
नई खेमेबंदी का सबसे बड़ा हथियार : अर्थव्यवस्था
शीत युद्ध के दौर में सैन्य गठबंधन प्रमुख थे। आज आर्थिक निर्भरता सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।
चीन निवेश और ऋण के माध्यम से प्रभाव बढ़ाता है। अमेरिका तकनीकी नियंत्रण और डॉलर व्यवस्था के माध्यम से दबाव बनाता है।
यानी आज की खेमेबंदी टैंकों से कम और सप्लाई चेन, चिप्स, डेटा और निवेश से अधिक संचालित हो रही है।
क्या गुटनिरपेक्षता फिर प्रासंगिक हो सकती है?
हाँ, लेकिन नए रूप में।
आज का गुटनिरपेक्ष राष्ट्र पूरी तरह तटस्थ नहीं रह सकता। उसे आर्थिक और सामरिक संबंध बनाने होंगे। लेकिन वह किसी एक शक्ति का पूर्ण उपग्रह भी नहीं बनना चाहता।
यानी आधुनिक गुटनिरपेक्षता का अर्थ है—
बहुध्रुवीय संबंध
रणनीतिक स्वायत्तता
राष्ट्रीय हित आधारित साझेदारी
वैचारिक के बजाय व्यावहारिक कूटनीति
भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और कई अन्य देश इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
लेकिन खतरा भी बड़ा है
नई वैश्विक खेमेबंदी विकासशील देशों के लिए खतरनाक भी हो सकती है। महाशक्तियाँ फिर से छोटे देशों को अपने प्रभाव क्षेत्रों में बाँटने की कोशिश कर रही हैं।
कर्ज, सैन्य सहयोग, तकनीकी निर्भरता और ऊर्जा सुरक्षा के माध्यम से नए प्रकार का प्रभाव विस्तार हो रहा है।
यदि विकासशील देश सावधान नहीं रहे, तो वे फिर किसी न किसी महाशक्ति के “रणनीतिक उपकरण” बन सकते हैं।
निष्कर्ष : गुटनिरपेक्षता का नया संघर्ष
विश्व राजनीति आज फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ नई खेमेबंदी स्पष्ट दिखाई देने लगी है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम संघर्ष और वैश्विक आर्थिक तनावों ने दुनिया को पुनः ध्रुवीकृत करना शुरू कर दिया है।
लेकिन इस बार गुटनिरपेक्षता केवल वैचारिक आंदोलन नहीं रह सकती। उसे आर्थिक शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक संतुलन के साथ आगे बढ़ना होगा।
आज का प्रश्न यह नहीं कि कौन किस गुट में है; प्रश्न यह है कि कौन अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता बचा पा रहा है।
यदि विकासशील देश अपनी सामूहिक शक्ति और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर पाए, तो गुटनिरपेक्षता का नया युग जन्म ले सकता है। अन्यथा दुनिया फिर महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में बँटे हुए प्रभाव क्षेत्रों में बदल सकती है।









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