ट्रम्प, ईरान और असफल वार्ताओं का धधकता भू-राजनीतिक मंच

Donald Trump की राजनीति हमेशा “डील” की राजनीति रही है। वे स्वयं को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं जो कठिन से कठिन अंतरराष्ट्रीय संकटों को भी अपनी व्यक्तिगत बातचीत, दबाव और सौदेबाजी से हल कर सकते हैं। लेकिन ईरान के साथ अमेरिका की वार्ताएँ बार-बार यह साबित करती रही हैं कि पश्चिम एशिया केवल व्यापारिक समझौतों का क्षेत्र नहीं, बल्कि इतिहास, धर्म, सामरिक अविश्वास और वैश्विक शक्ति-संघर्ष का विस्फोटक संगम है। 2025-26 में अमेरिका और Iran के बीच परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों को लेकर हुई अप्रत्यक्ष वार्ताएँ फिर ठंडी पड़ती दिखाई दीं। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि हर बातचीत अगली टकराव-भूमि तैयार करती प्रतीत होती है। असल संकट केवल परमाणु कार्यक्रम नहीं है। संकट यह है कि अमेरिका ईरान को पश्चिम एशिया में एक नियंत्रित शक्ति के रूप में देखना चाहता है, जबकि ईरान स्वयं को क्षेत्रीय प्रतिरोध की धुरी मानता है। यही कारण है कि हर वार्ता अंततः शक्ति-संतुलन की लड़ाई बन जाती है। ट्रम्प की रणनीति पहले भी “Maximum Pressure” यानी अधिकतम दबाव पर आधारित रही थी। 2018 में उन्होंने Joint Comprehensive Plan of Action से अमेरिका को बाहर निकाल दिया था। इसके बाद: ईरान पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, तेल निर्यात पर चोट की गई, और क्षेत्रीय दबाव बढ़ाया गया। लेकिन परिणाम क्या हुआ? ईरान झुका नहीं। उल्टा उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को और तेज़ किया तथा चीन और रूस के साथ सामरिक निकटता बढ़ाई। आज की वार्ताओं की असफलता इसी पुराने अविश्वास की निरंतरता है। अमेरिका चाहता है: परमाणु नियंत्रण, क्षेत्रीय सैन्य संयम, और पश्चिमी हितों की सुरक्षा। ईरान चाहता है: प्रतिबंधों से राहत, शासन सुरक्षा, और क्षेत्रीय प्रभाव की मान्यता। दोनों की न्यूनतम अपेक्षाएँ ही एक-दूसरे के लिए अस्वीकार्य हैं। Core Conflict in US-Iran Negotiations
ट्रम्प की शैली समस्या को और जटिल बना देती है। वे कूटनीति को कई बार सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल देते हैं। उनकी राजनीति में: बयान पहले आते हैं, रणनीतिक स्थिरता बाद में। इसी कारण ईरान अमेरिकी आश्वासनों पर भरोसा नहीं करता। तेहरान को डर है कि कोई भी समझौता अमेरिकी सत्ता परिवर्तन के साथ फिर टूट सकता है, जैसा पहले हुआ। दूसरी ओर ट्रम्प समर्थक अमेरिकी राष्ट्रवाद यह संदेश देना चाहता है कि अमेरिका कमजोर नहीं पड़ा है। ऐसे में ईरान पर नरमी दिखाना अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी जोखिम बन जाता है। इस पूरी असफलता का सबसे बड़ा प्रभाव पश्चिम एशिया पर पड़ता है। यदि वार्ता विफल होती है तो: तेल बाजार अस्थिर होते हैं, ऊर्जा कीमतें बढ़ती हैं, समुद्री व्यापार मार्गों पर तनाव बढ़ता है, और युद्ध की आशंका गहरी होती है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और संवेदनशील है क्योंकि भारत: पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात करता है, ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध रखता है, और साथ ही अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी बढ़ा रहा है। यानी भारत को संतुलन की कूटनीति करनी पड़ती है। Geopolitical Impact of US-Iran Tensions
ईरान की वार्ता असफलता केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि आधुनिक वैश्विक राजनीति की सीमा भी दिखाती है। दुनिया अब शीतयुद्ध जैसी द्विध्रुवीय नहीं रही। चीन, रूस, ईरान, अमेरिका, यूरोप और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच शक्ति-संतुलन इतना जटिल हो चुका है कि कोई भी देश अकेले अपनी शर्तें नहीं थोप सकता। ट्रम्प का दृष्टिकोण कई बार व्यापारिक वार्ता जैसा दिखाई देता है — दबाव बनाओ, विरोधी को आर्थिक रूप से तोड़ो और समझौता करा लो। लेकिन ईरान का राजनीतिक ढाँचा वैचारिक प्रतिरोध पर टिका है। वहाँ प्रतिबंध कई बार राष्ट्रवाद को और मजबूत कर देते हैं। यही कारण है कि हर असफल वार्ता के बाद दोनों पक्ष और अधिक कठोर होकर लौटते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि पश्चिम एशिया में अब छोटी चिंगारी भी बड़े युद्ध में बदल सकती है। Israel, खाड़ी देश, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किसी भी समय क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म दे सकता है। और यदि ऐसा हुआ तो उसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार, एशियाई देशों की राजनीति और विश्व व्यापार सभी प्रभावित होंगे। इसलिए ट्रम्प-ईरान वार्ता की असफलता केवल दो देशों की कहानी नहीं है; यह उस दुनिया की कहानी है जहाँ शक्ति है, हथियार हैं, प्रतिबंध हैं, लेकिन विश्वास नहीं है।

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