बेरोजगार युवा “कॉकरोच” नहीं, व्यवस्था की विफलता का आईना हैं
भारत इस समय एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ चमकते एक्सप्रेसवे, डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप यूनिकॉर्न और दुनिया की चौथी-पाँचवीं अर्थव्यवस्था बनने के दावों के बीच करोड़ों युवाओं के भीतर एक गहरी बेचैनी पल रही है। यह बेचैनी केवल नौकरी न मिलने की नहीं है, बल्कि उस अपमान की भी है जिसमें बेरोजगार युवा को धीरे-धीरे “अप्रासंगिक”, “निकम्मा” और अब तो कुछ प्रभावशाली वर्गों द्वारा “कॉकरोच” जैसे शब्दों से देखा जाने लगा है।
यह शब्द केवल एक अपमानजनक उपमा नहीं, बल्कि उस आर्थिक मॉडल की मानसिकता को उजागर करता है जिसमें मनुष्य की कीमत उसके उपभोग, उत्पादकता और कॉरपोरेट उपयोगिता से तय होने लगी है। जो युवा नौकरी में फिट नहीं बैठता, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में वर्षों फँसा रहता है, जो छोटे शहरों से सपने लेकर महानगर आता है और फिर किसी कॉल सेंटर, डिलीवरी ऐप या बेरोजगारी की अंधेरी सुरंग में खो जाता है — वह इस व्यवस्था की नजर में धीरे-धीरे “डेटा” बन जाता है, इंसान नहीं।
विकास का चमकता पोस्टर और अंधेरा कमरा
भारत में पिछले एक दशक में विकास का एक आक्रामक नैरेटिव तैयार किया गया। स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन, पाँच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था — इन सब नारों ने एक नए भारत की तस्वीर बनाई। लेकिन इस तस्वीर के पीछे जो वास्तविक भारत खड़ा है, वह बेरोजगार युवाओं, बंद होती छोटी फैक्ट्रियों, घटते सरकारी पदों और बढ़ती असमानता का भारत है।
सरकारी नौकरियाँ लगातार घट रही हैं। स्थायी पदों की जगह संविदा और आउटसोर्सिंग ने ले ली है। रेलवे, बैंक, डाक विभाग, विश्वविद्यालय — हर जगह नियमित नियुक्तियाँ कम हुई हैं। लाखों पद खाली हैं, लेकिन भर्तियाँ वर्षों तक अटकी रहती हैं।
दूसरी ओर निजी क्षेत्र, विशेषकर IT सेक्टर, जिसे कभी भारत के मध्यवर्गीय सपनों का इंजन कहा जाता था, अब छँटनी और अनिश्चितता के दौर में है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन ने नए संकट पैदा किए हैं। कंपनियाँ कम कर्मचारियों से अधिक काम लेना चाहती हैं। “हायर एंड फायर” संस्कृति सामान्य होती जा रही है।
यानी विकास हो रहा है, लेकिन रोजगार नहीं।
यह कौन सा आर्थिक मॉडल है?
यह वह मॉडल है जिसे अर्थशास्त्री “कॉरपोरेट पूंजीवाद”, “क्रोनी कैपिटलिज़्म” और “प्लेटफ़ॉर्म इकोनॉमी” का मिश्रण कहते हैं। इसमें राज्य और बड़े कॉरपोरेट के बीच ऐसा संबंध बनता है जिसमें नीति का केंद्र नागरिक नहीं, बाजार बन जाता है।
बड़ी कंपनियाँ लगातार बड़ी होती जाती हैं जबकि छोटे व्यापारी और मझोले उद्योग खत्म होते जाते हैं।
कभी मोहल्लों की छोटी दुकानें स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं। आज ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म — जैसे Amazon और Flipkart — पूरे बाजार को निगलने की स्थिति में पहुँच चुके हैं। ग्राहक को छूट मिलती है, लेकिन स्थानीय व्यापार धीरे-धीरे दम तोड़ता है।
यह केवल व्यापार का बदलाव नहीं है। यह आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण की प्रक्रिया है।
विदेशी व्यापार और बढ़ता असंतुलन
भारत आज भी ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और तकनीकी उत्पादों के लिए भारी आयात पर निर्भर है। व्यापार घाटा लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। निर्यात की तुलना में आयात अधिक होने से विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है।
ऊर्जा संकट भी इसी मॉडल की कमजोरी को दिखाता है। तेल की वैश्विक कीमत बढ़ते ही भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। महँगाई बढ़ती है, परिवहन महँगा होता है और अंततः उसका बोझ आम आदमी उठाता है।
लेकिन इस संकट का सबसे बड़ा असर युवाओं पर पड़ता है। क्योंकि आर्थिक असंतुलन का अर्थ है — नई नौकरियों का धीमा निर्माण।
बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं
भारत में बेरोजगारी अब केवल नौकरी का प्रश्न नहीं रह गई है। यह सामाजिक और मानसिक संकट बन चुकी है।
एक युवा पाँच-पाँच साल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। परिवार खेत बेचता है, माँ गहने गिरवी रखती है, पिता रिटायरमेंट की बचत खर्च कर देता है। लेकिन परीक्षा या तो रद्द हो जाती है, या पेपर लीक हो जाता है, या भर्ती वर्षों तक अटक जाती है।
धीरे-धीरे युवा के भीतर आत्मविश्वास टूटने लगता है। समाज उसे “निकम्मा” कहने लगता है। रिश्तेदार ताने मारते हैं। और फिर वही व्यवस्था उसे “स्किल की कमी” का दोषी ठहराती है।
यानी समस्या व्यवस्था में है, लेकिन अपराधबोध युवा को दिया जाता है।
“कॉकरोच” वाली मानसिकता कहाँ से आती है?
जब कोई व्यवस्था मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई मानने लगती है, तब ऐसी भाषा पैदा होती है। कॉकरोच वह जीव माना जाता है जो हर परिस्थिति में जीवित रहता है लेकिन जिसकी कोई गरिमा नहीं समझी जाती।
बेरोजगार युवा को यदि “कॉकरोच” कहा जाता है तो उसका अर्थ है कि व्यवस्था उसे भीड़, बोझ या असफलता के रूप में देखने लगी है।
यह वही मानसिकता है जिसमें:
किसान “सब्सिडी का बोझ” बन जाता है,
छात्र “डेटा” बन जाता है,
मजदूर “लेबर यूनिट” बन जाता है,
और बेरोजगार युवा “अनुपयोगी जनसंख्या”।
यह अमानवीकरण (Dehumanization) किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
सांसद बढ़ रहे हैं, नौकरियाँ घट रही हैं
भारत में संसद की सीटों के विस्तार पर चर्चा हो रही है। प्रतिनिधित्व बढ़ना लोकतंत्र के लिए आवश्यक हो सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या समान गंभीरता से रोजगार विस्तार पर भी चर्चा हो रही है?
देश में:
सांसद बढ़ाने की योजना है,
लेकिन शिक्षक कम हैं,
अस्पतालों में डॉक्टर कम हैं,
न्यायालयों में जज कम हैं,
विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर कम हैं,
और सरकारी विभागों में लाखों पद खाली हैं।
यानी राजनीतिक संरचना का विस्तार हो रहा है, लेकिन सार्वजनिक रोजगार का नहीं।
यह विरोधाभास युवाओं के भीतर असंतोष पैदा करता है।
MSME का संकट: रोजगार की रीढ़ टूट रही है
भारत में सबसे अधिक रोजगार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) देते हैं। लेकिन यही क्षेत्र सबसे अधिक दबाव में है।
GST की जटिलता, महँगा ऋण, बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के कारण छोटे उद्योग टिक नहीं पा रहे।
जब एक छोटा उद्योग बंद होता है तो केवल मालिक प्रभावित नहीं होता। उसके साथ दर्जनों परिवारों की आय समाप्त हो जाती है।
कॉरपोरेट मॉडल का सबसे बड़ा खतरा यही है — वह उत्पादन तो बढ़ा सकता है, लेकिन रोजगार का व्यापक आधार नहीं बना पाता।
डिजिटल इंडिया बनाम वास्तविक भारत
भारत में इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। लेकिन डिजिटल विकास का अर्थ यह नहीं कि सामाजिक विकास भी समान गति से हुआ हो।
एक तरफ AI, फिनटेक और स्टार्टअप की दुनिया है, दूसरी तरफ लाखों डिग्रीधारी युवा हैं जो 15-20 हजार रुपये की नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
कई युवाओं के लिए “गिग इकॉनमी” ही रोजगार का विकल्प बन रही है:
डिलीवरी बॉय,
कैब ड्राइवर,
फ्रीलांस श्रमिक,
अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी।
यह रोजगार स्थायी सुरक्षा नहीं देता। न पेंशन, न सामाजिक सुरक्षा, न दीर्घकालिक स्थिरता।
क्या भारत “रोजगारविहीन विकास” की ओर बढ़ रहा है?
अर्थशास्त्र में एक शब्द है — “Jobless Growth”। यानी अर्थव्यवस्था बढ़ती है, लेकिन रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ता।
भारत का संकट यही बनता जा रहा है।
GDP बढ़ सकती है, शेयर बाजार रिकॉर्ड बना सकता है, लेकिन यदि युवा के पास स्थायी सम्मानजनक रोजगार नहीं है तो विकास अधूरा है।
युवा केवल वेतन नहीं चाहता। वह सम्मान चाहता है। वह भविष्य की सुरक्षा चाहता है। वह यह महसूस करना चाहता है कि देश की प्रगति में उसकी भी जगह है।
समाधान क्या है?
भारत को केवल कॉरपोरेट निवेश आधारित मॉडल से आगे बढ़ना होगा।
1. श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा
टेक्सटाइल, फूड प्रोसेसिंग, ग्रामीण उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।
2. MSME को संरक्षण
सस्ते ऋण, कर राहत और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा जरूरी है।
3. सरकारी रिक्तियों को भरना
शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और प्रशासन में लाखों रिक्त पद तुरंत भरे जा सकते हैं।
4. शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल
डिग्री आधारित नहीं, कौशल आधारित रोजगार नीति बनानी होगी।
5. स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना
हर चीज़ को बड़े कॉरपोरेट के हाथ में देना दीर्घकालिक समाधान नहीं।
निष्कर्ष: युवा बोझ नहीं, भारत की सबसे बड़ी शक्ति हैं
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसका युवा वर्ग होता है। यदि वही वर्ग अपमान, बेरोजगारी और असुरक्षा से भर जाए तो विकास का पूरा ढाँचा खोखला हो जाता है।
बेरोजगार युवा “कॉकरोच” नहीं हैं। वे उस आर्थिक व्यवस्था के मौन गवाह हैं जिसने चमकदार विकास के बीच रोजगार, समानता और मानवीय गरिमा को पीछे छोड़ दिया।
भारत को यह तय करना होगा कि वह केवल कॉरपोरेट मुनाफे की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है या करोड़ों युवाओं के सपनों का राष्ट्र भी।
क्योंकि अंततः किसी देश की असली ताकत उसके शेयर बाजार की ऊँचाई नहीं, बल्कि उसके युवाओं की आँखों में बची उम्मीद होती है।











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