होर्मुज से शांति तक : अमेरिका–ईरान समझौते के पीछे बदलती विश्व राजनीति

पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। Iran और United States के बीच संभावित शांति समझौते की खबर केवल दो देशों के संबंधों का मामला नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और महाशक्तियों की सीमाओं को भी उजागर करती है। यदि वास्तव में दोनों देशों के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) की दिशा में प्रगति हो रही है और उसके अंतर्गत Strait of Hormuz फिर से पूर्ण रूप से खुलता है तथा अमेरिकी सैन्य दबाव कम होता है, तो इसका प्रभाव केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह विश्व राजनीति की दिशा बदलने वाला घटनाक्रम बन सकता है। संघर्ष से संवाद तक की यात्रा अमेरिका और ईरान के संबंध पिछले चार दशकों से अविश्वास, टकराव और प्रतिबंधों से भरे रहे हैं। Iranian Revolution के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार खराब होते गए। अमेरिका ने ईरान को पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक नीतियों के लिए चुनौती माना, जबकि ईरान ने अमेरिका को साम्राज्यवादी हस्तक्षेपकारी शक्ति के रूप में देखा। इराक युद्ध, परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, ड्रोन हमले और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्षों ने इस दुश्मनी को और गहरा किया। लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई कि पूरा पश्चिम एशिया युद्ध के मुहाने पर पहुँच गया। विशेष रूप से ईरान और Israel के बीच बढ़ते तनाव ने अमेरिका को प्रत्यक्ष रूप से संघर्ष में खींच लिया। जब मिसाइल और ड्रोन हमलों ने खाड़ी क्षेत्र की समुद्री गतिविधियों को प्रभावित किया, तब दुनिया को यह एहसास हुआ कि यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। क्योंकि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। होर्मुज जलडमरूमध्य : विश्व अर्थव्यवस्था की धड़कन Strait of Hormuz केवल समुद्री मार्ग नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। विश्व के कुल तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे तेल उत्पादक देशों का निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है। जब भी ईरान ने होर्मुज को बंद करने की चेतावनी दी, पूरी दुनिया में तेल की कीमतें उछल गईं। यूरोप, एशिया और विशेष रूप से India जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह अत्यंत संवेदनशील मुद्दा रहा है। यदि प्रस्तावित समझौते के अनुसार होर्मुज फिर से सामान्य रूप से खुलता है और जहाजों की आवाजाही युद्ध-पूर्व स्तर पर लौटती है, तो इससे वैश्विक बाजारों में स्थिरता आ सकती है। तेल की कीमतों में कमी संभव है और वैश्विक मुद्रास्फीति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिकी सेना की वापसी : मजबूरी या रणनीति? समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की वापसी और नौसैनिक नाकेबंदी को हटाने की बात है। यह संकेत देता है कि अमेरिका अब पश्चिम एशिया में लंबे सैन्य टकराव की कीमत समझने लगा है। पिछले दो दशकों में United States ने अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में भारी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी, लेकिन इन युद्धों ने अमेरिका को आर्थिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर कमजोर किया। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि अमेरिका अब “अनंत युद्धों” की नीति से पीछे हटना चाहता है। आज अमेरिका की प्राथमिकता बदल चुकी है। उसका ध्यान अब China के उदय और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर अधिक केंद्रित है। ऐसे में ईरान के साथ किसी सीमित समझौते के माध्यम से पश्चिम एशिया में तनाव कम करना उसकी रणनीतिक आवश्यकता भी हो सकती है। यह भी संभव है कि अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य उपस्थिति घटाकर क्षेत्रीय सहयोगियों और कूटनीतिक दबाव के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता हो। इसलिए अमेरिकी वापसी को केवल कमजोरी नहीं बल्कि रणनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में भी देखा जा सकता है। ईरान की रणनीतिक जीत? ईरान के दृष्टिकोण से देखें तो यह समझौता उसकी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। वर्षों तक कठोर प्रतिबंधों और सैन्य दबाव झेलने के बाद यदि अमेरिका स्वयं पीछे हटने को तैयार दिखाई देता है, तो ईरानी नेतृत्व इसे अपनी “प्रतिरोध नीति” की जीत बताएगा। विशेष रूप से Islamic Revolutionary Guard Corps यानी आईआरजीसी के बयान यह संकेत देते हैं कि ईरान स्वयं को रक्षात्मक स्थिति में नहीं बल्कि आत्मविश्वासपूर्ण शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। आईआरजीसी का यह कहना कि “दुश्मन की कमजोरी को देखते हुए युद्ध की संभावना कम है” वास्तव में मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश भी है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि उसने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय बातचीत को अपनी शर्तों पर आगे बढ़ाया। हालांकि वास्तविकता अधिक जटिल है, क्योंकि ईरान भी लंबे संघर्ष और आर्थिक प्रतिबंधों से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पाकिस्तान की मध्यस्थता : नई कूटनीतिक भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में Pakistan की मध्यस्थता का उल्लेख अत्यंत रोचक है। यदि वास्तव में पाकिस्तान ने तेहरान और वाशिंगटन के बीच संवाद में केंद्रीय भूमिका निभाई है, तो यह उसकी क्षेत्रीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। पाकिस्तान लंबे समय से पश्चिम एशिया, चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है। एक ओर उसके चीन से गहरे संबंध हैं, दूसरी ओर वह अमेरिका के साथ भी अपने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं करना चाहता। ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाकर पाकिस्तान स्वयं को क्षेत्रीय स्थिरता के एक आवश्यक खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता और आर्थिक संकट उसकी दीर्घकालिक कूटनीतिक विश्वसनीयता को सीमित करते हैं। इजरायल की चिंता यदि अमेरिका और ईरान के बीच किसी प्रकार का समझौता आगे बढ़ता है, तो सबसे अधिक असहजता Israel को हो सकती है। इजरायल लंबे समय से ईरान को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। तेल अवीव की रणनीति हमेशा यह रही है कि अमेरिका ईरान पर अधिकतम दबाव बनाए रखे। लेकिन यदि वाशिंगटन तनाव कम करने की दिशा में बढ़ता है, तो इजरायल को यह डर हो सकता है कि ईरान क्षेत्रीय रूप से और अधिक मजबूत हो जाएगा। इसी कारण आने वाले समय में इजरायल की ओर से कूटनीतिक दबाव, खुफिया गतिविधियों और क्षेत्रीय गठबंधनों में तेजी देखने को मिल सकती है। संयुक्त राष्ट्र की भूमिका यदि यह समझौता वास्तव में 60 दिनों के भीतर अंतिम रूप लेता है और उसे United Nations Security Council के बाध्यकारी प्रस्ताव के रूप में स्वीकृति मिलती है, तो यह इसकी अंतरराष्ट्रीय वैधता को मजबूत करेगा। संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति का अर्थ होगा कि यह केवल द्विपक्षीय राजनीतिक समझौता नहीं बल्कि वैश्विक स्थिरता से जुड़ा औपचारिक ढाँचा बन सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजारों को भरोसा मिलेगा। हालांकि संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता अक्सर महाशक्तियों की राजनीति पर निर्भर करती है। इसलिए अंतिम परिणाम काफी हद तक अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की रणनीतिक सहमति पर निर्भर करेगा। चीन और रूस की नज़र China और Russia दोनों इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रख रहे होंगे। चीन के लिए पश्चिम एशिया ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है। वह क्षेत्र में स्थिरता चाहता है ताकि उसकी आर्थिक परियोजनाएँ और ऊर्जा आयात प्रभावित न हों। दूसरी ओर रूस चाहता है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में उलझा रहे, लेकिन वह यह भी नहीं चाहेगा कि स्थिति इतनी बिगड़ जाए कि वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो जाएँ। संभव है कि चीन और रूस दोनों पर्दे के पीछे इस समझौते को समर्थन दे रहे हों, क्योंकि यह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में कूटनीतिक समाधान की अवधारणा को मजबूत करता है। भारत के लिए क्या अर्थ? India के लिए यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने का सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था, तेल कीमतों और व्यापारिक लागतों पर पड़ता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच स्थिरता बढ़ती है, तो भारत को कई लाभ मिल सकते हैं— तेल आपूर्ति अधिक सुरक्षित होगी। ऊर्जा कीमतों में स्थिरता आ सकती है। ईरान के साथ व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में नई संभावनाएँ खुल सकती हैं। Chabahar Port परियोजना को गति मिल सकती है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखना होगी। उसे अमेरिका, ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को सावधानीपूर्वक संतुलित करना होगा। क्या यह स्थायी शांति की शुरुआत है? इतिहास बताता है कि पश्चिम एशिया में समझौते अक्सर अस्थायी साबित हुए हैं। अविश्वास, वैचारिक संघर्ष और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएँ इतनी गहरी हैं कि केवल एक समझौता सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह “ठोस सत्यापन” के बिना कोई कदम नहीं उठाएगा। इसका अर्थ है कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास अभी भी बना हुआ है। अमेरिका भी संभवतः ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर सतर्क रहेगा। फिर भी, यदि संवाद जारी रहता है और होर्मुज में स्थिरता बहाल होती है, तो यह पश्चिम एशिया को विनाशकारी युद्ध से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। निष्कर्ष अमेरिका और ईरान के बीच उभरता संभावित समझौता केवल एक क्षेत्रीय घटना नहीं बल्कि बदलती विश्व राजनीति का संकेत है। यह उस दौर का प्रतीक है जहाँ युद्ध की सीमाएँ महाशक्तियों को भी समझ आने लगी हैं और आर्थिक यथार्थ सैन्य आक्रामकता पर भारी पड़ने लगा है। होर्मुज का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत का संदेश होगा, जबकि अमेरिकी सैन्य वापसी यह संकेत दे सकती है कि दुनिया अब धीरे-धीरे एक नए शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रही है। लेकिन यह भी सच है कि पश्चिम एशिया की राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु कम ही होते हैं। यहाँ हर समझौता अस्थायी संतुलन होता है। इसलिए आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह पहल वास्तव में स्थायी शांति की ओर बढ़ती है या फिर केवल एक नए संघर्ष से पहले का विराम साबित होती है।

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