दीमक लगे सत्ता-स्तंभों में दबा “कांकरोच भारत”

भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ विकास और विघटन साथ-साथ चल रहे हैं। एक ओर चमचमाते एक्सप्रेसवे, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष उपलब्धियाँ, विदेशी निवेश और विश्वगुरु बनने के दावे हैं; दूसरी ओर बेरोजगार युवा, टूटता मध्यवर्ग, महँगाई, संस्थागत अविश्वास, सांप्रदायिक तनाव और भ्रष्टाचार से कराहती व्यवस्था है। ऐसा लगता है मानो लोकतंत्र का विशाल भवन अभी भी खड़ा तो है, लेकिन उसके स्तंभों में भीतर से दीमक लग चुकी है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका — जिन पर लोकतंत्र की आत्मा टिकी होती है — वे स्वयं संदेह, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के बोझ से चरमराती दिखाई देती हैं। और इन्हीं दीमक लगे स्तंभों के नीचे दबा हुआ है भारत का आम नागरिक — एक ऐसा नागरिक जो जीवित तो है, संघर्ष भी कर रहा है, लेकिन जिसकी गरिमा धीरे-धीरे समाप्त कर दी गई है। यही “कांकरोच भारत” है। यह कोई गाली नहीं, बल्कि उस सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें जनता की पीड़ा सामान्य बना दी जाती है और उसकी असहायता को नियति की तरह स्वीकार कर लिया जाता है। भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि यहाँ समस्याएँ हैं। हर समाज समस्याओं से गुजरता है। असली त्रासदी यह है कि समस्याएँ अब व्यवस्था का स्थायी चरित्र बनती जा रही हैं। बेरोजगारी कोई आकस्मिक संकट नहीं रही; वह अब एक पीढ़ी की नियति बनती जा रही है। भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं रहा; वह व्यवस्था का सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। सांप्रदायिकता केवल चुनावी रणनीति नहीं रही; वह समाज के मानस में रोपी जा रही है। सबसे पहले कार्यपालिका को देखें। लोकतंत्र में कार्यपालिका का काम जनता की सेवा करना होता है। लेकिन आज आम नागरिक का अनुभव अक्सर इसके उलट दिखाई देता है। सरकारी दफ्तरों में फाइलें बिना रिश्वत के आगे नहीं बढ़तीं, योजनाएँ कागज़ों में चमकती हैं लेकिन ज़मीन पर दम तोड़ देती हैं, गरीबों के नाम पर घोषणाएँ होती हैं लेकिन लाभ बीच रास्ते में ही गायब हो जाता है। प्रशासन का बड़ा हिस्सा संवेदनशील सेवा तंत्र के बजाय सत्ता-संरक्षण मशीन जैसा दिखाई देने लगा है। यह वही कार्यपालिका है जो जनता से टैक्स लेती है, लेकिन बदले में नागरिक को असुरक्षा देती है। बेरोजगार युवा वर्षों तक परीक्षाओं की तैयारी करता है, लेकिन भर्ती या तो अटक जाती है या पेपर लीक हो जाता है। संविदा और आउटसोर्सिंग ने स्थायी रोजगार की अवधारणा को लगभग समाप्त कर दिया है। एक ऐसा युवा वर्ग तैयार हो रहा है जिसके पास डिग्री तो है, लेकिन भविष्य नहीं। India's Youth Employment Anxiety
भारत का युवा आज केवल नौकरी नहीं खोज रहा, वह सम्मान खोज रहा है। लेकिन व्यवस्था उसे आँकड़ों में बदल रही है। वह वोट बैंक है, डेटा है, भीड़ है — लेकिन नागरिक नहीं। यही वह क्षण है जहाँ “कांकरोच भारत” का रूपक सबसे अधिक भयावह बन जाता है। एक ऐसा भारत जो जीवित तो है, लेकिन जिसे व्यवस्था ने भीतर से कुचल दिया है। न्यायपालिका की स्थिति भी चिंता पैदा करती है। भारतीय लोकतंत्र में अदालतों को अंतिम आशा माना जाता है। जब नागरिक हर जगह से निराश हो जाता है, तब वह न्यायपालिका की ओर देखता है। लेकिन यदि वहीं भ्रष्टाचार, पक्षपात और विलंब की खबरें आने लगें तो नागरिक का विश्वास टूटने लगता है। जस्टिस वर्मा जैसे मामलों से जुड़े आरोपों ने जनता के भीतर गहरे प्रश्न पैदा किए। यदि न्याय देने वाली संस्था पर ही प्रश्नचिह्न लगने लगें तो लोकतंत्र की नैतिक शक्ति कमजोर हो जाती है। भारत में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। गरीब आदमी वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटता है। कई बार फैसला आने से पहले पीढ़ियाँ बदल जाती हैं। न्याय महँगा भी है और धीमा भी। ऐसे में आम नागरिक के भीतर यह भावना पैदा होती है कि न्याय केवल शक्तिशाली लोगों की पहुँच में है। विधायिका की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं। संसद लोकतंत्र का हृदय मानी जाती है। यहाँ जनता की समस्याओं पर गंभीर बहस होनी चाहिए। लेकिन आज संसद का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव, नारेबाजी और चुनावी ध्रुवीकरण का मंच बनता जा रहा है। सांसदों का दायित्व रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर नीति बनाना है, लेकिन वास्तविक बहस अक्सर सांप्रदायिक मुद्दों और राजनीतिक आरोपों में खो जाती है। देश का युवा नौकरी चाहता है, लेकिन उसे धर्म की बहस दी जाती है। किसान आर्थिक सुरक्षा चाहता है, लेकिन उसे चुनावी राष्ट्रवाद मिलता है। छोटा व्यापारी राहत चाहता है, लेकिन उसे केवल डिजिटल प्रचार सुनाई देता है। इस बीच सांसदों और राजनीतिक ढाँचों पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वेतन, भत्ते, सुरक्षा, सरकारी आवास और संसदीय सुविधाओं पर भारी बजट खर्च होता है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को संसाधन मिलना आवश्यक है, लेकिन जनता तब प्रश्न पूछती है जब उसी देश में: अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, अदालतों में जज नहीं, और युवाओं के पास रोजगार नहीं। ऐसे में सांसदों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव जनता के भीतर एक बेचैनी पैदा करते हैं। प्रतिनिधित्व बढ़ना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित हो सकता है, लेकिन क्या रोजगार भी उसी अनुपात में बढ़ा? क्या न्याय व्यवस्था उतनी ही मजबूत हुई? क्या शिक्षा और स्वास्थ्य पर उतना ही निवेश हुआ? Growth of Political Structure vs Public Employment
भारत की राजनीति का सबसे खतरनाक पहलू आज सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बनता जा रहा है। जब आर्थिक प्रश्नों का उत्तर कठिन हो जाता है, तब राजनीति अक्सर पहचान की ओर भागती है। धर्म, जाति और भाषा जनता को भावनात्मक रूप से बाँधने के सबसे आसान उपकरण बन जाते हैं। सांप्रदायिक राजनीति बेरोजगारी हल नहीं करती। वह महँगाई कम नहीं करती। वह शिक्षा सुधार नहीं करती। लेकिन वह जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं से भटका देती है। यही कारण है कि बेरोजगार युवा धीरे-धीरे नौकरी की चर्चा से अधिक धार्मिक बहसों में उलझता दिखाई देता है। भारत की अर्थव्यवस्था में भी गहरी असमानता उभर रही है। छोटे और मझोले व्यवसाय लगातार दबाव में हैं। महँगाई, GST, डिजिटल प्रतिस्पर्धा और बड़े कॉरपोरेट ढाँचों ने छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। दूसरी ओर कुछ बड़ी कंपनियों की आर्थिक शक्ति लगातार बढ़ती जा रही है। स्थानीय बाजार धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। मोहल्ले की दुकानें ऐप आधारित बाजार से हार रही हैं। रोजगार का विकेंद्रीकृत ढाँचा टूट रहा है। इसके परिणामस्वरूप आर्थिक शक्ति सीमित हाथों में केंद्रित होती जा रही है। भारत का मध्यवर्ग भी भीतर से टूट रहा है। EMI, शिक्षा खर्च, चिकित्सा खर्च और बढ़ती जीवन लागत ने उसके आत्मविश्वास को कमजोर किया है। महँगाई केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं होती; वह परिवार की चिंता बनती है। जब माता-पिता बच्चे की फीस और बुजुर्गों की दवा के बीच चुनाव करने लगें, तब लोकतंत्र की चमक फीकी पड़ने लगती है। सबसे भयावह स्थिति तब पैदा होती है जब समाज समस्याओं को सामान्य मानने लगे। बेरोजगारी सामान्य। भ्रष्टाचार सामान्य। सांप्रदायिकता सामान्य। न्याय में देरी सामान्य। यही लोकतंत्र के भीतर दीमक का असली रूप है। वह अचानक भवन नहीं गिराती; वह धीरे-धीरे उसकी आत्मा खा जाती है। “कांकरोच भारत” का अर्थ यही है — ऐसा भारत जहाँ आम नागरिक को व्यवस्था केवल जीवित रहने लायक छोड़ देती है, लेकिन सम्मान से जीने का अवसर नहीं देती। लेकिन क्या समाधान नहीं है? समाधान है, यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। भारत को केवल GDP आधारित विकास मॉडल से आगे बढ़ना होगा। रोजगार को विकास का सबसे बड़ा पैमाना बनाना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। न्यायपालिका में पारदर्शिता और गति बढ़ानी होगी। प्रशासन को सत्ता-प्रबंधन नहीं, नागरिक सेवा का माध्यम बनाना होगा। संसद को सांप्रदायिक टकराव नहीं, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मंच बनाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण — नागरिक की गरिमा को पुनर्स्थापित करना होगा। कोई भी युवा “कांकरोच” नहीं है। कोई भी नागरिक बोझ नहीं है। लोकतंत्र में जनता केवल वोट नहीं होती; वही राष्ट्र की आत्मा होती है। भारत अभी भी उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह दिशा बदल सकता है। लेकिन इसके लिए सत्ता को चमकते आँकड़ों से बाहर निकलकर उस नागरिक को देखना होगा जो दीमक लगे सत्ता-स्तंभों के नीचे दबा हुआ है। इतिहास गवाह है — जब जनता लंबे समय तक दबाई जाती है, तब या तो वह भीतर से टूट जाती है या फिर एक दिन व्यवस्था की पूरी परिभाषा बदल देती है।

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