G-2 अमेरिका के लिए ऐतिहासिक भूल साबित होगी

21वीं सदी की विश्व राजनीति में सबसे अधिक चर्चित अवधारणाओं में से एक रही है — G-2, अर्थात् United States और China द्वारा विश्व व्यवस्था का संयुक्त संचालन। कई पश्चिमी रणनीतिकारों ने यह कल्पना की थी कि यदि अमेरिका और चीन आपसी प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित कर लें और वैश्विक आर्थिक-सामरिक ढाँचे को मिलकर संचालित करें, तो दुनिया अधिक स्थिर हो सकती है। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक विपरीत दिखाई देती है। आज परिस्थितियाँ यह संकेत दे रही हैं कि G-2 की अवधारणा अमेरिका के लिए एक ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है। क्योंकि जिस चीन को अमेरिका ने “वैश्विक साझेदार” बनाकर विश्व अर्थव्यवस्था में ऊपर उठाया, वही चीन अब अमेरिकी वर्चस्व को सबसे बड़ी चुनौती दे रहा है। G-2 की अवधारणा का जन्म शीतयुद्ध समाप्त होने के बाद United States ने यह मान लिया था कि उदार पूंजीवाद और वैश्वीकरण का मॉडल पूरी दुनिया पर स्थायी रूप से लागू हो जाएगा। इसी सोच के तहत अमेरिका ने चीन को वैश्विक व्यापार व्यवस्था में प्रवेश दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। World Trade Organization में चीन की सदस्यता, पश्चिमी निवेश, तकनीकी हस्तांतरण और वैश्विक उत्पादन श्रृंखलाओं में चीन की भागीदारी—ये सभी कदम अमेरिकी रणनीति का हिस्सा थे। वाशिंगटन को विश्वास था कि आर्थिक समृद्धि के साथ चीन धीरे-धीरे पश्चिमी राजनीतिक ढाँचे के निकट आ जाएगा। यहीं अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल हुई। अमेरिका ने यह मान लिया कि आर्थिक उदारीकरण अनिवार्य रूप से राजनीतिक उदारीकरण को जन्म देगा। लेकिन चीन ने पश्चिमी पूंजी और तकनीक का उपयोग अपनी राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने के लिए किया, बिना अपनी राजनीतिक संरचना बदले। “विश्व की फैक्ट्री” बनता चीन 1990 और 2000 के दशक में अमेरिकी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर उत्पादन चीन में स्थानांतरित किया। सस्ती श्रमशक्ति, विशाल बाजार और सरकारी समर्थन ने चीन को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बना दिया। Apple से लेकर अनगिनत अमेरिकी कंपनियाँ चीन पर निर्भर होती चली गईं। अल्पकाल में अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत को भारी लाभ हुआ, लेकिन दीर्घकाल में अमेरिका ने अपनी औद्योगिक क्षमता कमजोर कर ली। इस प्रक्रिया के तीन बड़े परिणाम हुए— चीन आर्थिक महाशक्ति बन गया। अमेरिकी मध्यम वर्ग की नौकरियाँ प्रभावित हुईं। तकनीकी और औद्योगिक निर्भरता बढ़ गई। यानी G-2 की परिकल्पना में अमेरिका ने चीन को साझेदार समझा, लेकिन चीन ने इसे अपनी राष्ट्रीय शक्ति निर्माण की परियोजना बना दिया। चीन ने साझेदारी नहीं, प्रतिस्पर्धा चुनी अमेरिका को उम्मीद थी कि चीन वैश्विक व्यवस्था में “जिम्मेदार हितधारक” बनेगा। लेकिन चीन ने अपनी शक्ति बढ़ाने के बाद अधिक आत्मविश्वासी और आक्रामक विदेश नीति अपनानी शुरू की। दक्षिण चीन सागर में सैन्य विस्तार ताइवान पर दबाव बेल्ट एंड रोड परियोजना वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा डॉलर निर्भरता को चुनौती ये सभी संकेत बताते हैं कि चीन अमेरिकी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था में समाहित नहीं होना चाहता, बल्कि उसका विकल्प तैयार करना चाहता है। यहीं G-2 की अवधारणा विफल हो जाती है। क्योंकि G-2 तभी सफल हो सकता था जब दोनों शक्तियाँ समान वैचारिक दृष्टि और साझा रणनीतिक हित रखतीं। जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों के बीच मूलभूत प्रतिस्पर्धा मौजूद है। ट्रम्प और G-2 का अंत Donald Trump के दौर में पहली बार अमेरिका ने खुलकर स्वीकार किया कि चीन उसके लिए रणनीतिक खतरा बन चुका है। ट्रम्प ने व्यापार युद्ध शुरू किया, चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए और सप्लाई चेन को चीन से बाहर ले जाने की बात की। यह केवल आर्थिक नीति नहीं थी; यह G-2 मॉडल की विफलता की औपचारिक स्वीकारोक्ति थी। ट्रम्प का संदेश स्पष्ट था— अमेरिका ने चीन को ऊपर उठाकर अपनी ही चुनौती तैयार कर ली। यही कारण है कि ट्रम्प काल से अमेरिकी नीति “सहयोग” से “प्रतिस्पर्धा” की ओर मुड़ गई। तकनीकी युद्ध : वास्तविक संघर्ष आज अमेरिका-चीन संघर्ष का सबसे बड़ा क्षेत्र तकनीक है। सेमीकंडक्टर कृत्रिम बुद्धिमत्ता 5G नेटवर्क क्वांटम कंप्यूटिंग साइबर सुरक्षा इन क्षेत्रों में चीन की तेज प्रगति ने अमेरिका को चिंतित कर दिया है। Huawei जैसी कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध इसी रणनीतिक भय का परिणाम हैं। अमेरिका समझ चुका है कि यदि चीन तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और अग्रणी बन गया, तो अमेरिकी वैश्विक नेतृत्व को गंभीर चुनौती मिलेगी। G-2 और अमेरिकी औद्योगिक पतन G-2 मॉडल का सबसे बड़ा नुकसान अमेरिकी समाज के भीतर दिखाई दिया। वैश्वीकरण से कॉर्पोरेट कंपनियाँ समृद्ध हुईं, लेकिन अमेरिकी श्रमिक वर्ग असुरक्षित होता गया। कारखाने बंद हुए, उत्पादन विदेश चला गया और मध्यवर्गीय नौकरियाँ कम होती गईं। यही आर्थिक असंतोष बाद में ट्रम्प जैसी राष्ट्रवादी राजनीति के उदय का कारण बना। इस दृष्टि से देखें तो G-2 केवल विदेश नीति की भूल नहीं थी; उसने अमेरिकी घरेलू राजनीति को भी अस्थिर कर दिया। चीन की दीर्घकालिक रणनीति बनाम अमेरिकी अल्पकालिक सोच चीन ने दशकों तक धैर्यपूर्वक अपनी शक्ति बढ़ाई। उसने पश्चिमी पूंजी, तकनीक और बाजार का उपयोग किया, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा। इसके विपरीत अमेरिका अल्पकालिक कॉर्पोरेट लाभों में उलझा रहा। अमेरिकी कंपनियों ने तत्काल लाभ के लिए उत्पादन चीन भेजा, जबकि चीन ने उसी प्रक्रिया को राष्ट्रीय रणनीति में बदल दिया। आज परिणाम यह है कि अमेरिका चीन को रोकना चाहता है, लेकिन उसकी अपनी अर्थव्यवस्था और कंपनियाँ चीन से गहराई से जुड़ी हुई हैं। क्या अमेरिका अब पीछे हट सकता है? अमेरिका अब G-2 मॉडल से पीछे हटने की कोशिश कर रहा है— सप्लाई चेन विविधीकरण “फ्रेंडशोरिंग” इंडो-पैसिफिक रणनीति QUAD तकनीकी प्रतिबंध लेकिन समस्या यह है कि चीन अब इतना शक्तिशाली हो चुका है कि उसे आसानी से अलग-थलग नहीं किया जा सकता। यानी अमेरिका जिस संरचना को स्वयं बनाता रहा, अब उसी से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। भारत के लिए सबक India के लिए G-2 की विफलता महत्वपूर्ण सबक देती है। भारत को— विदेशी निवेश स्वीकार करना चाहिए, लेकिन रणनीतिक आत्मनिर्भरता बनाए रखनी होगी। तकनीकी विकास को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ना होगा। किसी एक महाशक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना होगा। भारत यदि केवल वैश्विक बाजार का उपभोक्ता बनकर रह गया, तो भविष्य में वही स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो आज अमेरिका महसूस कर रहा है। बहुध्रुवीय विश्व का उदय G-2 की अवधारणा मूलतः द्विध्रुवीय मानसिकता का आधुनिक रूप थी—जहाँ दुनिया दो शक्तियों के बीच संतुलित होती। लेकिन आज विश्व अधिक जटिल हो चुका है। India उभर रहा है। Russia अभी भी सामरिक शक्ति है। यूरोप स्वतंत्र भूमिका चाहता है। पश्चिम एशिया नई शक्ति राजनीति देख रहा है। BRICS जैसे मंच विस्तार कर रहे हैं। इसलिए भविष्य शायद G-2 का नहीं बल्कि बहुध्रुवीय विश्व का होगा। निष्कर्ष G-2 की अवधारणा अमेरिका के लिए इसलिए ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है क्योंकि उसने अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक परिणामों को नजरअंदाज किया। अमेरिका ने सोचा था कि वह चीन को वैश्विक व्यवस्था में शामिल करके उसे नियंत्रित कर लेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा—चीन ने उसी व्यवस्था का उपयोग अपनी शक्ति निर्माण के लिए किया और अब वह अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की स्थिति में पहुँच चुका है। आज अमेरिका जिस “चीन चुनौती” की बात करता है, वह काफी हद तक उसकी अपनी नीतियों का परिणाम है। G-2 का सपना अंततः इस सत्य से टकरा गया कि महाशक्तियाँ स्थायी साझेदार नहीं होतीं; वे अंततः प्रभाव, संसाधनों और वैश्विक नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं। 21वीं सदी की राजनीति अब G-2 की नहीं बल्कि बहुध्रुवीय संघर्ष, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक संतुलन की राजनीति बनने जा रही है।

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