चीन-अमेरिका की छाया में पाकिस्तान, और संतुलन की राजनीति में उलझा भारत
क्या विश्व कूटनीति में भारत अपनी वास्तविक क्षमता से कम प्रभावशाली दिखाई दे रहा है?
विश्व राजनीति का वर्तमान दौर केवल शक्ति संघर्ष का दौर नहीं है, बल्कि यह “रणनीतिक उपयोगिता” की राजनीति का भी दौर है। आज अंतरराष्ट्रीय संबंध आदर्शवाद से नहीं, बल्कि हितों, दबावों और भू-राजनीतिक आवश्यकताओं से संचालित हो रहे हैं। यही कारण है कि कभी आतंकवाद, अस्थिरता और आर्थिक संकट का प्रतीक माना जाने वाला पाकिस्तान आज भी विश्व मंचों पर प्रासंगिक दिखाई देता है। दूसरी ओर भारत, जो स्वयं को उभरती वैश्विक शक्ति, “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ और भविष्य की महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, कई बार ऐसी स्थिति में दिखाई देता है जहाँ उसकी नैतिक प्रतिष्ठा तो स्वीकार की जाती है, लेकिन उसका निर्णायक प्रभाव उतना स्पष्ट नहीं दिखता।
यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या चीन और अमेरिका जैसे महाशक्तियों के साथ सामरिक समीकरण बनाकर पाकिस्तान विश्व कूटनीति में भारत से अधिक प्रभावी दिखाई देने लगा है? या यह केवल अस्थायी रणनीतिक भ्रम है?
यह प्रश्न भावनात्मक कम और रणनीतिक अधिक है। क्योंकि विश्व राजनीति में वास्तविक शक्ति केवल अर्थव्यवस्था या सैन्य क्षमता से तय नहीं होती; कई बार यह इस बात से भी तय होती है कि कोई राष्ट्र महाशक्तियों के लिए कितना उपयोगी है। पाकिस्तान ने दशकों से इसी “रणनीतिक उपयोगिता” की राजनीति खेली है, जबकि भारत ने स्वयं को “स्वतंत्र धुरी” के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। यही दोनों देशों की विदेश नीतियों का मूल अंतर है।
रणनीतिक उपयोगिता का खेल : पाकिस्तान कैसे बना महाशक्तियों की जरूरत?
Pakistan ने अपनी स्थापना के बाद से ही स्वयं को किसी न किसी वैश्विक शक्ति के रणनीतिक सहयोगी के रूप में प्रस्तुत किया। शीत युद्ध के दौर में वह अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट का हिस्सा बना। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका के लिए सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बन गया। अमेरिकी हथियार, आर्थिक सहायता और खुफिया सहयोग ने पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था को मजबूत किया।
इसके बाद 9/11 के बाद जब अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध शुरू किया, तब भी पाकिस्तान “फ्रंटलाइन स्टेट” के रूप में प्रस्तुत हुआ। भले ही पश्चिमी देशों में पाकिस्तान की दोहरी भूमिका पर संदेह बना रहा, लेकिन अमेरिका उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सका। कारण स्पष्ट था — अफगानिस्तान, इस्लामी नेटवर्क और पश्चिम एशिया की राजनीति में पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, लेकिन पाकिस्तान की रणनीतिक उपयोगिता समाप्त नहीं हुई। अब चीन उसके पीछे खड़ा है।
चीन-पाकिस्तान धुरी : दक्षिण एशिया में नई सामरिक संरचना
China और पाकिस्तान का संबंध केवल मित्रता नहीं, बल्कि साझा रणनीतिक हितों पर आधारित है। चीन के लिए पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत को संतुलित करने का माध्यम है। यही कारण है कि चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश किया और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना का प्रमुख हिस्सा बनाया।
CPEC केवल आर्थिक परियोजना नहीं है। यह हिंद महासागर तक चीन की पहुँच, ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा और भारत के सामरिक प्रभाव को चुनौती देने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान ने इस साझेदारी का भरपूर लाभ उठाया। उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था के बावजूद चीन ने उसे निरंतर आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन दिया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई मौकों पर चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया। कश्मीर जैसे मुद्दों पर भी चीन ने भारत के विरुद्ध अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश की। इससे पाकिस्तान को यह संदेश देने का अवसर मिला कि उसके पीछे एक महाशक्ति खड़ी है।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंध : दूरी के बावजूद संपर्क
हालाँकि अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध पहले जैसे नहीं रहे, लेकिन पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुए। अमेरिका पाकिस्तान पर अविश्वास करता है, लेकिन उसे पूरी तरह अलग-थलग करने की स्थिति में भी नहीं है। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद भी पाकिस्तान क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में महत्वपूर्ण बना हुआ है।
अमेरिका समझता है कि यदि पाकिस्तान पूरी तरह चीन के प्रभाव में चला गया, तो दक्षिण एशिया में चीन की स्थिति और मजबूत हो जाएगी। इसलिए समय-समय पर अमेरिका पाकिस्तान से संवाद बनाए रखता है।
यानी पाकिस्तान ने अपनी कमजोरी को भी रणनीतिक अवसर में बदल दिया। उसकी अर्थव्यवस्था भले ही संकटग्रस्त हो, लेकिन उसकी भू-राजनीतिक स्थिति उसे महाशक्तियों के लिए उपयोगी बनाए रखती है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता : ताकत या दुविधा?
इसके विपरीत India ने हमेशा “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति अपनाई। भारत न तो किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनना चाहता है और न ही किसी महाशक्ति का उपग्रह राष्ट्र बनना चाहता है। यही कारण है कि भारत एक साथ कई मंचों पर सक्रिय दिखाई देता है।
भारत QUAD में भी है और BRICS में भी। वह अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता है, लेकिन रूस से तेल खरीदना भी जारी रखता है। वह चीन से सीमा विवाद रखता है, लेकिन व्यापारिक संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं करता। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की पहचान बन गया है।
लेकिन यही संतुलन कई बार उसकी कमजोरी भी बन जाता है। विश्व राजनीति में स्पष्टता अक्सर प्रभाव पैदा करती है, जबकि अत्यधिक संतुलन कई बार अनिर्णय जैसा दिखाई देता है।
G20 में भारत : सहमति या समझौता?
G20 की अध्यक्षता भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक परीक्षा थी। भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया और स्वयं को विभाजित विश्व के मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर भारत निर्णायक सहमति नहीं बना सका।
पश्चिम रूस की स्पष्ट आलोचना चाहता था, जबकि रूस और चीन इसका विरोध कर रहे थे। अंततः जो घोषणा-पत्र सामने आया, वह संतुलित भाषा का दस्तावेज़ था। इसे कूटनीतिक सफलता अवश्य कहा गया, लेकिन यह ऐसी सफलता नहीं थी जिसमें भारत वैश्विक राजनीति की दिशा तय करता दिखाई देता।
भारत ने मंच को टूटने से बचाया, लेकिन वह महाशक्तियों को अपनी दृष्टि पर सहमत नहीं कर पाया।
BRICS में चीन की बढ़ती छाया
BRICS में भी भारत की स्थिति चुनौतीपूर्ण है। भारत इस मंच को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के रूप में देखता है, जबकि चीन इसे पश्चिम-विरोधी धुरी के रूप में विकसित करना चाहता है।
आर्थिक दृष्टि से चीन BRICS का सबसे प्रभावशाली सदस्य है। उसकी निवेश क्षमता और वैश्विक पहुँच भारत से कहीं अधिक है। ऐसे में भारत की भूमिका कई बार संतुलनकारी शक्ति तक सीमित दिखाई देती है।
यदि भारत वास्तव में ग्लोबल साउथ का निर्विवाद नेता होता, तो BRICS की दिशा पर उसका प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता। लेकिन वास्तविकता यह है कि चीन की आर्थिक शक्ति इस मंच में निर्णायक प्रभाव रखती है।
QUAD : साझेदारी और सीमाएँ
Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD में भारत की भूमिका भी विरोधाभासी दिखाई देती है। अमेरिका चाहता है कि QUAD चीन के विरुद्ध अधिक स्पष्ट सुरक्षा ढाँचा बने, लेकिन भारत स्वयं को सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं दिखाना चाहता।
भारत QUAD को सहयोग मंच कहता है। यही कारण है कि QUAD अब तक NATO जैसी संरचना नहीं बन पाया। भारत चीन से संघर्ष भी नहीं चाहता और उसकी आक्रामकता को अनदेखा भी नहीं कर सकता। यही रणनीतिक दुविधा उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत की समस्या : सम्मान अधिक, प्रभाव कम
भारत आज विश्व में सम्मानित राष्ट्र है। उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। तकनीक, डिजिटल ढाँचा, अंतरिक्ष और फार्मा क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं। दुनिया भारत को बाजार, निवेश और लोकतांत्रिक साझेदार के रूप में देख रही है।
लेकिन सम्मान और प्रभाव में अंतर होता है।
भारत की समस्या यह है कि उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा बड़ी है, लेकिन कई बार वह उस प्रतिष्ठा को निर्णायक प्रभाव में बदलता हुआ दिखाई नहीं देता। दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव इसका उदाहरण है। नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों में चीन की आर्थिक उपस्थिति लगातार बढ़ी है।
भारत अभी भी क्षेत्रीय नेतृत्व बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है।
पाकिस्तान की सक्रियता और भारतीय चिंता
यही कारण है कि कई बार पाकिस्तान अपनी वास्तविक शक्ति से अधिक प्रभावशाली दिखाई देता है। क्योंकि उसके पीछे चीन खड़ा है और अमेरिका उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। इसके विपरीत भारत किसी एक शक्ति के पीछे नहीं खड़ा, बल्कि स्वयं स्वतंत्र धुरी बनने की कोशिश कर रहा है।
यह मार्ग कठिन है। इसमें तुरंत लाभ कम दिखाई देते हैं। लेकिन दीर्घकाल में यही नीति भारत को वास्तविक वैश्विक शक्ति बना सकती है — बशर्ते वह अपनी आर्थिक और सामरिक क्षमता को और मजबूत करे।
भारत को क्या बदलना होगा?
यदि भारत वास्तव में विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका चाहता है, तो उसे केवल संतुलनकारी भाषा से आगे बढ़ना होगा। उसे अपनी सॉफ्ट पावर के साथ हार्ड पावर को भी मजबूत करना होगा।
भारत को—
आर्थिक शक्ति बढ़ानी होगी
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर होना होगा
पड़ोस में स्थिर प्रभाव बनाना होगा
अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में निवेश बढ़ाना होगा
वैश्विक संकटों पर अधिक स्पष्ट पहल करनी होगी
तभी वह सम्मानित राष्ट्र से निर्णायक शक्ति की ओर बढ़ सकेगा।
निष्कर्ष : रणनीतिक उपयोगिता बनाम वास्तविक शक्ति
आज Pakistan कई बार India से अधिक सक्रिय दिखाई दे सकता है, लेकिन यह उसकी स्वतंत्र शक्ति नहीं, बल्कि महाशक्तियों के लिए उसकी रणनीतिक उपयोगिता का परिणाम है।
इसके विपरीत भारत एक स्वतंत्र वैश्विक धुरी बनने का प्रयास कर रहा है। यह मार्ग धीमा है, जटिल है और कई बार अनिर्णायक भी दिखाई देता है। लेकिन यदि भारत अपनी आर्थिक, तकनीकी और सामरिक क्षमता को नई ऊँचाइयों तक ले जाने में सफल होता है, तो आने वाले दशकों में वही राष्ट्र विश्व राजनीति की दिशा तय करने वाली शक्ति बन सकता है।
आज की दुनिया में पाकिस्तान प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन भविष्य की दुनिया में निर्णायक वही राष्ट्र होगा जिसके पास केवल भू-राजनीतिक उपयोगिता नहीं, बल्कि स्थायी आर्थिक, तकनीकी और सामरिक शक्ति होगी। और भारत के पास उस संभावना का आधार मौजूद है।










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