बिखरता दक्षिण एशिया और कमजोर होता भारत-केंद्रित विश्व दृष्टिकोण

SAARC से NAM तक : क्षेत्रीय संगठनों का संकट, चीन का उभार और भारत की कूटनीतिक चुनौती दक्षिण एशिया और व्यापक एशियाई क्षेत्र में भारत लंबे समय से एक केंद्रीय शक्ति के रूप में देखा जाता रहा है। अपनी विशाल जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक प्रभाव और आर्थिक क्षमता के कारण भारत स्वाभाविक रूप से इस क्षेत्र की राजनीति और कूटनीति का केंद्र रहा है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने केवल अपने राष्ट्रीय निर्माण पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि एशिया, अफ्रीका और विकासशील देशों के बीच एक वैकल्पिक वैश्विक नेतृत्व की भी कल्पना की। इसी सोच से आगे चलकर कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन बने, जिनमें भारत ने या तो नेतृत्वकारी भूमिका निभाई या केंद्रीय भागीदार के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन समय के साथ इन संगठनों का विखराव, उनकी सीमित प्रभावशीलता और बदलती विश्व राजनीति ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या भारत अपने आसपास एक स्थायी और प्रभावी क्षेत्रीय व्यवस्था बना पाने में सफल हो पाया है। भारत की क्षेत्रीय कूटनीति का सबसे प्रमुख उदाहरण South Asian Association for Regional Cooperation यानी SAARC रहा। 1985 में बने इस संगठन का उद्देश्य दक्षिण एशिया को आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक सहयोग के साझा मंच पर लाना था। भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव इसके संस्थापक सदस्य थे, बाद में अफगानिस्तान भी इसमें शामिल हुआ। उस समय यह उम्मीद थी कि यूरोपियन यूनियन की तरह दक्षिण एशिया भी साझा बाजार, क्षेत्रीय संपर्क और सामूहिक विकास का मॉडल बन सकता है। भारत की आर्थिक और भौगोलिक शक्ति को देखते हुए माना जा रहा था कि वह पूरे क्षेत्र को विकास की दिशा में आगे ले जाएगा। लेकिन SAARC धीरे-धीरे भारत-पाकिस्तान तनाव का शिकार बन गया। कश्मीर विवाद, आतंकवाद, सीमा संघर्ष और राजनीतिक अविश्वास ने संगठन को लगभग निष्क्रिय कर दिया। 2016 के उरी हमले के बाद भारत ने इस्लामाबाद में होने वाले शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया और उसके बाद से SAARC लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच गया। यह केवल एक संगठन की विफलता नहीं थी, बल्कि दक्षिण एशिया की सामूहिक राजनीतिक कमजोरी का प्रतीक बन गई। SAARC की कमजोरी के बाद भारत ने Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation यानी BIMSTEC को अधिक महत्व देना शुरू किया। इसमें भारत के अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार और थाईलैंड शामिल हैं। भारत ने इसे SAARC के विकल्प के रूप में देखा क्योंकि इसमें पाकिस्तान नहीं है। बंगाल की खाड़ी क्षेत्र को जोड़ने वाला यह संगठन व्यापार, संपर्क, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग पर केंद्रित था। लेकिन BIMSTEC भी अभी तक ASEAN या यूरोपियन यूनियन जैसी मजबूत संस्थागत संरचना विकसित नहीं कर पाया। सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताएं और सीमित आर्थिक एकीकरण इसकी गति को धीमा करते रहे। इसी तरह Bangladesh Bhutan India Nepal Initiative यानी BBIN को दक्षिण एशिया में संपर्क और परिवहन सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से आगे बढ़ाया गया। सड़क संपर्क, ऊर्जा व्यापार और लोगों की आवाजाही को सरल बनाना इसका उद्देश्य था। लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक बाधाओं के कारण यह पहल भी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच सकी। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत ने Indian Ocean Rim Association यानी IORA और Indian Ocean Naval Symposium यानी IONS जैसे मंचों को भी आगे बढ़ाया। इनका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग को बढ़ाना था। भारत समझता है कि 21वीं सदी में हिंद महासागर वैश्विक व्यापार और सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बनने जा रहा है। लेकिन यहां भी चीन की बढ़ती सक्रियता और सदस्य देशों की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं ने भारत की क्षेत्रीय नेतृत्व क्षमता को चुनौती दी। भारत की वैश्विक पहचान का एक बड़ा आधार Non-Aligned Movement यानी NAM भी रहा। शीत युद्ध के दौरान जब दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो गुटों में बंटी हुई थी, तब भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्र विदेश नीति का मार्ग चुना। जवाहरलाल नेहरू, नासिर और टीटो जैसे नेताओं ने इसे तीसरी दुनिया की आवाज के रूप में प्रस्तुत किया। NAM केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं था, बल्कि उपनिवेशवाद विरोध, विकासशील देशों की एकजुटता और स्वतंत्र नीति का प्रतीक था। एक समय भारत को NAM का नैतिक और वैचारिक नेता माना जाता था। लेकिन शीत युद्ध समाप्त होने के बाद NAM की प्रासंगिकता कम होती गई और यह मंच धीरे-धीरे औपचारिकता तक सीमित होता चला गया। 21वीं सदी में भारत ने नई वैश्विक व्यवस्थाओं में अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश की। BRICS के माध्यम से भारत ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह में अपनी जगह बनाई। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का यह समूह पश्चिमी प्रभुत्व वाली आर्थिक संस्थाओं के विकल्प के रूप में देखा गया। लेकिन BRICS के भीतर भी चीन और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा तथा सदस्य देशों की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं ने इसकी सामूहिक शक्ति को सीमित रखा। इसी प्रकार Shanghai Cooperation Organisation यानी SCO में भारत की सदस्यता को यूरेशिया और मध्य एशिया में उसकी रणनीतिक उपस्थिति के विस्तार के रूप में देखा गया। लेकिन यहां भी चीन और रूस की केंद्रीय भूमिका तथा भारत-पाकिस्तान तनाव इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं। हाल के वर्षों में भारत ने Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD के माध्यम से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत की है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत का यह समूह चीन के बढ़ते प्रभाव के संतुलन के रूप में देखा जाता है। यह संगठन पारंपरिक क्षेत्रीय मंचों से अलग एक रणनीतिक गठबंधन का रूप लेता जा रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि व्यापक इंडो-पैसिफिक राजनीति में अपनी जगह बना रहा है। ऊर्जा और जलवायु के क्षेत्र में भारत ने International Solar Alliance यानी ISA तथा Coalition for Disaster Resilient Infrastructure यानी CDRI जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक नेतृत्व की नई छवि प्रस्तुत करने की कोशिश की। ISA को भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल के रूप में देखा गया, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा सहयोग को बढ़ाना है। CDRI का लक्ष्य आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना निर्माण को बढ़ावा देना है। इन पहलों ने यह संकेत दिया कि भारत केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक मुद्दों पर भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाना चाहता है। फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इतने सारे संगठनों और पहलों के बावजूद दक्षिण एशिया और भारत-केंद्रित क्षेत्रीय व्यवस्था अपेक्षित रूप से मजबूत क्यों नहीं हो पाई। इसका एक कारण भारत और उसके पड़ोसियों के बीच शक्ति असंतुलन है। भारत इतना बड़ा देश है कि छोटे पड़ोसी देशों में कई बार “Big Brother Syndrome” यानी बड़े भाई के दबाव की भावना पैदा होती है। नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में समय-समय पर भारत विरोधी राजनीतिक भावनाएं उभरी हैं। दूसरी ओर भारत को यह चिंता रहती है कि चीन जैसी बाहरी शक्तियां उसके पड़ोस में प्रभाव बढ़ा रही हैं। चीन ने पिछले दो दशकों में दक्षिण एशिया में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाया है। पाकिस्तान में CPEC, श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह, नेपाल में बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और मालदीव में निवेश ने यह स्पष्ट कर दिया कि दक्षिण एशिया अब केवल भारत के प्रभाव क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। SAARC के कमजोर होने का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ चीन को मिला। विश्व राजनीति में किसी भी क्षेत्रीय संगठन की शक्ति उसकी संस्थागत स्थिरता और साझा हितों पर निर्भर करती है। यूरोपियन यूनियन इसलिए सफल हुआ क्योंकि वहां सदस्य देशों ने आर्थिक सहयोग को राजनीतिक विवादों से ऊपर रखा। ASEAN इसलिए प्रभावी हुआ क्योंकि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने सामूहिक आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी। लेकिन दक्षिण एशिया में सुरक्षा, पहचान और सीमा विवाद सामूहिक एजेंडे पर हावी हो जाते हैं। भारत आज स्वयं को “Global South” की आवाज के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। Group of Twenty यानी G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनवाकर यह संदेश दिया कि वह विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत करना चाहता है। लेकिन भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता तब और प्रभावी मानी जाएगी जब उसका अपना पड़ोस अधिक संगठित और स्थिर दिखाई देगा। अंततः SAARC, BIMSTEC, BBIN, NAM, BRICS, SCO, QUAD, ISA और CDRI जैसे संगठनों की कहानी केवल संस्थाओं की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती विदेश नीति, क्षेत्रीय चुनौतियों और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं की कहानी भी है। इनमें कहीं आदर्शवाद दिखाई देता है, कहीं रणनीतिक यथार्थवाद, कहीं विकास की आकांक्षा और कहीं शक्ति संतुलन की राजनीति। लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है कि 21वीं सदी में केवल संगठन बना देना पर्याप्त नहीं है। किसी भी क्षेत्रीय या वैश्विक मंच को प्रभावी बनाने के लिए राजनीतिक विश्वास, आर्थिक परस्पर निर्भरता, संस्थागत मजबूती और साझा भविष्य की भावना आवश्यक होती है। दक्षिण एशिया और भारत-केंद्रित संगठनों के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती है।

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