नॉर्वे के पत्रकार का व्यवहार और प्रधानमंत्री मोदी पर कार्टून विवाद

#यूरोपीय अहंकार, #मीडिया पूर्वाग्रह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्द, चित्र और प्रतीक केवल अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं होते, वे शक्ति-संतुलन, मानसिकता और सभ्यतागत दृष्टिकोण को भी प्रकट करते हैं। हाल के वर्षों में कई पश्चिमी मीडिया संस्थानों और पत्रकारों पर यह आरोप लगा है कि वे भारत और उसके नेतृत्व को देखने में औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। नॉर्वे के एक पत्रकार द्वारा भारत के प्रधानमंत्री के प्रति कथित असम्मानजनक व्यवहार तथा एक नॉर्वेजियन अखबार में प्रधानमंत्री Narendra Modi को सपेरे के रूप में चित्रित किए जाने की घटना इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा बन गई। यह केवल किसी एक कार्टून या पत्रकारिता शैली का प्रश्न नहीं है; यह उस मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसमें पश्चिम अब भी कई बार एशियाई और विशेष रूप से भारतीय नेतृत्व को रूढ़ छवियों में बाँधकर देखने का प्रयास करता है। लोकतांत्रिक समाजों में मीडिया की स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी नेता की आलोचना करना पत्रकारिता का अधिकार है। व्यंग्यचित्र और राजनीतिक कार्टून भी लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब आलोचना और व्यंग्य सांस्कृतिक पूर्वाग्रह, नस्लीय रूढ़ियों या सभ्यतागत अहंकार का रूप लेने लगें। भारत को “सांप-सपेरे”, “गरीबी” और “पिछड़ेपन” की छवियों में सीमित कर देना लंबे समय तक पश्चिमी मीडिया की आदत रही है। जबकि आज का भारत अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, अर्थव्यवस्था और वैश्विक कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में यदि किसी भारतीय प्रधानमंत्री को सपेरे के रूप में चित्रित किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से यह केवल राजनीतिक व्यंग्य नहीं रह जाता, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से एक राष्ट्र की छवि को छोटा करने का प्रयास प्रतीत होता है। यह ध्यान देने योग्य है कि पश्चिमी मीडिया अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देता है, लेकिन वही मीडिया कई बार अपने समाजों से जुड़े विषयों पर अत्यधिक संवेदनशील भी हो जाता है। यूरोप में नस्लवाद, प्रवासी प्रश्न या धार्मिक प्रतीकों पर टिप्पणी को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं। ऐसे में भारत या एशियाई समाजों के संदर्भ में दोहरे मानदंड दिखाई देना स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े करता है। यदि किसी यूरोपीय नेता को किसी नस्लीय रूढ़ि के माध्यम से चित्रित किया जाए, तो संभवतः उसे अस्वीकार्य माना जाएगा। फिर भारत के संदर्भ में ऐसी छवियों को “सामान्य व्यंग्य” कहकर क्यों प्रस्तुत किया जाता है? दरअसल यह समस्या केवल एक कार्टून तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक लंबा औपनिवेशिक इतिहास है। यूरोप ने सदियों तक एशिया और अफ्रीका को अपने उपनिवेशों के रूप में देखा। उस दौरान पश्चिमी समाजों में यह धारणा विकसित हुई कि वे “सभ्य” और “श्रेष्ठ” हैं, जबकि उपनिवेश “पिछड़े” हैं। भारत को भी लंबे समय तक सांप-सपेरे, हाथी, तांत्रिक और गरीबी की छवियों में प्रस्तुत किया गया। हॉलीवुड फिल्मों से लेकर यूरोपीय पत्रिकाओं तक यह दृष्टिकोण बार-बार दिखाई देता रहा। यह वही मानसिकता थी जिसने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, विज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक गहराई को अक्सर नजरअंदाज किया। विडंबना यह है कि आज का भारत उस पुराने ढाँचे में फिट नहीं बैठता। भारत अब केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर राष्ट्र है। सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल भुगतान प्रणाली, फार्मा उद्योग और वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती भूमिका ने पश्चिमी देशों को भी भारत को गंभीरता से लेने के लिए बाध्य किया है। यही कारण है कि कई बार पश्चिमी मीडिया के कुछ वर्गों में भारत के प्रति असहजता दिखाई देती है। विशेष रूप से तब, जब भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है और पश्चिमी देशों की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार नहीं करता। प्रधानमंत्री Narendra Modi की वैश्विक लोकप्रियता और भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता ने भी इस विमर्श को और तीखा बनाया है। मोदी समर्थकों का मानना है कि पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग भारत के उभार को संदेह की दृष्टि से देखता है और इसलिए भारतीय नेतृत्व को लेकर अक्सर कठोर या उपहासपूर्ण भाषा का उपयोग करता है। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि लोकतांत्रिक नेताओं को आलोचना सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन यहाँ मूल प्रश्न आलोचना का नहीं, बल्कि प्रस्तुति के तरीके का है। यदि आलोचना तथ्यों, नीतियों और निर्णयों पर आधारित हो तो वह लोकतंत्र का स्वस्थ हिस्सा है; परंतु यदि उसमें सांस्कृतिक रूढ़ियाँ और नस्लीय संकेत शामिल हो जाएँ, तो वह पत्रकारिता की मर्यादा से बाहर चली जाती है। भारत के लिए भी यह घटना आत्मचिंतन का अवसर है। अक्सर भारतीय समाज पश्चिमी मीडिया की स्वीकृति को अत्यधिक महत्व देता है। किसी विदेशी अखबार की प्रशंसा को बड़ी उपलब्धि और आलोचना को राष्ट्रीय अपमान मान लेने की प्रवृत्ति हमारे भीतर मौजूद मानसिक उपनिवेशवाद को दर्शाती है। एक आत्मविश्वासी राष्ट्र को आलोचना से घबराना नहीं चाहिए, लेकिन साथ ही उसे अपनी गरिमा और सांस्कृतिक सम्मान की रक्षा भी करनी चाहिए। भारत को यह समझना होगा कि वैश्विक राजनीति में मीडिया भी शक्ति-संघर्ष का एक उपकरण है। इसलिए अपनी वैचारिक और मीडिया शक्ति को मजबूत करना आज की आवश्यकता है। भारतीय मीडिया और बुद्धिजीवियों के सामने भी चुनौती है कि वे हर पश्चिमी आलोचना को या तो पूर्ण सत्य या पूर्ण षड्यंत्र मानने की प्रवृत्ति से बचें। संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। यदि किसी विदेशी पत्रकार का व्यवहार वास्तव में असम्मानजनक है, तो उसका विरोध होना चाहिए। लेकिन साथ ही भारत को अपनी प्रतिक्रिया में लोकतांत्रिक परिपक्वता भी दिखानी चाहिए। किसी भी आलोचना का उत्तर तथ्य, तर्क और आत्मविश्वास से देना अधिक प्रभावी होता है। यह भी सच है कि पश्चिमी समाज स्वयं आज गंभीर आंतरिक संकटों से गुजर रहे हैं। यूरोप में पहचान का संकट, प्रवासी प्रश्न, आर्थिक दबाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। ऐसे समय में एशियाई देशों, विशेषकर भारत और चीन के उभार ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को बदल दिया है। इस परिवर्तन को स्वीकार करना पश्चिमी मानसिकता के लिए आसान नहीं है। इसलिए कई बार मीडिया और बौद्धिक वर्गों में असुरक्षा और श्रेष्ठताबोध का मिश्रण दिखाई देता है। भारत को इस स्थिति का उत्तर भावनात्मक प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक नेतृत्व क्षमता से देना होगा। यदि भारत विज्ञान, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति के क्षेत्र में मजबूत होता है, तो रूढ़ छवियाँ स्वतः कमजोर पड़ेंगी। दुनिया अंततः उसी राष्ट्र का सम्मान करती है जो आत्मविश्वास और शक्ति के साथ आगे बढ़ता है। अंततः नॉर्वे के पत्रकार या किसी अखबार के कार्टून से अधिक महत्वपूर्ण वह व्यापक प्रश्न है जो इस घटना के पीछे छिपा है—क्या पश्चिम अब भी भारत को पुराने औपनिवेशिक चश्मे से देखता है? यदि हाँ, तो भारत का उत्तर क्रोध नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक उपलब्धियों और सभ्यतागत आत्मविश्वास के माध्यम से होना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जिन राष्ट्रों ने अपने आत्मसम्मान को पहचाना, वही विश्व मंच पर स्थायी प्रभाव छोड़ सके। भारत आज उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसे केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक शक्ति भी बनना होगा।

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