बलूच, पख्तून और तालिबान का संयुक्त मोर्चा: संभावनाएँ और सीमाएँ
बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा (पख्तून क्षेत्र) और अफगानिस्तान (तालिबान) के बीच एक संयुक्त मोर्चा बनने की संभावना भू-राजनीतिक स्तर पर एक बेहद दिलचस्प विषय है। सतह पर देखने पर ऐसा लग सकता है कि चूंकि ये तीनों ही पक्ष किसी न किसी रूप में पाकिस्तानी सेना और उसकी केंद्रीय व्यवस्था के विरोधी हैं, इसलिए इनका एक साझा मंच बन सकता है।
लेकिन धरातल की वास्तविकताओं, वैचारिक मतभेदों और ऐतिहासिक संघर्षों को देखते हुए एक औपचारिक और मजबूत संयुक्त मोर्चे की संभावना काफी जटिल और सीमित नजर आती है।
1. संयुक्त मोर्चे के पक्ष में अनुकूल कारक (संभावना के बिंदु)
* पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता का समान विरोध:
बलूच राष्ट्रवादी, पख्तून अधिकार कार्यकर्ता (जैसे PTM) और अफगान तालिबान—तीनों ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी (ISI) की दमनकारी नीतियों के शिकार या आलोचक रहे हैं। पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ साझा असंतोष इनके बीच वैचारिक संवाद का एक न्यूनतम बिंदु (Common Ground) जरूर प्रदान करता है।
* भौगोलिक निरंतरता (Geographic Continuity):
भौगोलिक रूप से बलूचिस्तान, पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान की सीमाएँ आपस में मिलती हैं। यदि ये क्षेत्र किसी सामरिक सहमति पर पहुँचते हैं, तो यह दक्षिण और मध्य एशिया की भू-राजनीति में पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा सुरक्षा संकट पैदा कर सकता है।
2. संयुक्त मोर्चे की राह में बड़ी बाधाएँ (सीमाएँ और विरोधाभास)
* वैचारिक और राजनीतिक जमीन का अंतर:
* बलूच राष्ट्रवादी: मुख्य रूप से धर्मनिरपेक्ष (Secular), वामपंथी या समाजवादी विचारधारा से प्रेरित हैं, जो एक स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष 'ग्रेटर बलूचिस्तान' या स्वायत्त राष्ट्र चाहते हैं।
* तालिबान: कट्टरपंथी इस्लामी देवबंदी विचारधारा पर आधारित हैं और शरिया कानून के समर्थक हैं। बलूच राष्ट्रवादियों और तालिबान की मूल जीवनशैली और राजनीतिक दर्शन में जमीन-आसमान का फर्क है।
* जातीय और क्षेत्रीय खींचतान (Ethnic Tensions):
पख्तून और बलूच समुदायों के बीच इतिहास में संसाधनों, सीमाओं और प्रभुत्व को लेकर कई स्थानीय मतभेद रहे हैं। एक स्थायी और संगठित सैन्य या राजनीतिक मोर्चे के लिए जिन उच्च स्तर के आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है, उसका अभाव है।
* तालिबान की अपनी प्राथमिकताएँ:
अफगान तालिबान का मुख्य फोकस वर्तमान में अपनी आंतरिक सरकार को चलाना, अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करना और अपनी अर्थव्यवस्था को संभालना है। भले ही पाकिस्तान के साथ उनके संबंध खराब हैं, लेकिन वे सीधे तौर पर किसी अन्य देश के अंदरूनी हिस्सों में बड़े सैन्य संघर्ष या मोर्चे का खुलकर नेतृत्व करने से बचेंगे, क्योंकि वे खुद आंतरिक चुनौतियों से घिरे हैं।
निष्कर्ष
व्यापक स्तर पर औपचारिक या स्थायी 'संयुक्त मोर्चा' (United Front) बनना व्यावहारिक रूप से बहुत मुश्किल है, क्योंकि इनकी विचारधारा और लक्ष्य एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
हालांकि, बिना किसी औपचारिक मोर्चे के भी, पाकिस्तान के खिलाफ अनौपचारिक समन्वय या दबाव जरूर बन सकता है। जब बलूच विद्रोही अपने मोर्चे पर और पख्तून तथा तालिबान अपनी सीमाओं पर पाकिस्तान पर दबाव बनाते हैं, तो पाकिस्तानी सेना और सरकार के लिए देश को संभालना नामुमकिन सा हो जाता है। यही अनौपचारिक दबाव इस समय पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है।









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