तालिबान और अफगानिस्तान का रुख: पाकिस्तान के साथ संबंध और भारत का दृष्टिकोण

 

अफगानिस्तान और तालिबान सरकार का वर्तमान रुख पाकिस्तान के साथ उसके भू-राजनीतिक संबंधों और भारत के प्रति उसकी कूटनीति के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। एक समय जिसे पाकिस्तान अपनी 'रणनीतिक गहराई' (Strategic Depth) मानता था, वही अफगानिस्तान आज पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

1. अफगानिस्तान और तालिबान का पाकिस्तान के प्रति रुख

 * डूरंड लाइन का विवाद और सीमा तनाव:

   तालिबान सरकार ने आधिकारिक रूप से कभी भी डूरंड लाइन को अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी है। सीमा पर बाड़ लगाने के मुद्दों को लेकर तालिबान सुरक्षा बलों और पाकिस्तानी सेना के बीच अक्सर हिंसक झड़पें होती रहती हैं।

 * TTP (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) का मुद्दा:

   पाकिस्तान की यह उम्मीद बिल्कुल गलत साबित हुई कि काबुली तालिबान के सत्ता में आने से उसे भारत विरोधी गतिविधियों में मदद मिलेगी। इसके विपरीत, अफगान तालिबान वैचारिक रूप से पाकिस्तानी तालिबान (TTP) के करीब हैं। पाकिस्तान द्वारा TTP के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने के बावजूद, अफगान तालिबान ने कभी भी TTP को अपनी भूमि से खदेड़ने या उनके खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चलाने से इंकार कर दिया है, जिससे दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं।

 * शरणार्थी और आर्थिक संकट:

   पाकिस्तान द्वारा अफगान शरणार्थियों को जबरन देश छोड़ने का आदेश देने और सीमाओं को बार-बार बंद करने के कारण अफगान जनता और वहां की सरकार में पाकिस्तान के प्रति गहरी नाराजगी और शत्रुता का भाव पैदा हो गया है।

2. अफगानिस्तान और तालिबान का भारत के प्रति रुख

 * व्यावहारिक और कूटनीतिक जुड़ाव:

   तालिबान शासन यह अच्छी तरह समझता है कि उसे अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने और अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने के लिए भारत जैसे बड़े क्षेत्रीय देशों की आवश्यकता है। इसलिए, भारत के प्रति उनका रुख पिछले कुछ वर्षों में अधिक व्यावहारिक और संतुलित हुआ है।

 * मानवीय सहायता और विकास कार्य:

   भारत सरकार ने अफगानिस्तान के लोगों के लिए गेहूं, चिकित्सा सहायता और जीवन रक्षक दवाओं की बड़ी खेप भेजी है। साथ ही, भारत ने अफगानिस्तान में अपने रुके हुए विकास प्रोजेक्ट्स (जैसे बांध, अस्पताल और बुनियादी ढांचा) को फिर से शुरू करने में रुचि दिखाई है। अफगान सरकार और आम जनता इन भारतीय पहलों को सकारात्मक रूप से देखती है।

 * सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति:

   तालिबान ने यह आश्वासन दिया है कि अफगान भूमि का उपयोग भारत या किसी अन्य देश के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं किया जाएगा। हालांकि कूटनीतिक रूप से भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन काबुल में भारतीय तकनीकी मिशन (Technical Mission) सुचारू रूप से कार्य कर रहा है।

निष्कर्ष

तालिबान और समग्र रूप से अफगानिस्तान का रुख अब पूरी तरह से पाकिस्तान की उम्मीदों के विपरीत चल रहा है। जो पाकिस्तान कभी अफगानिस्तान को नियंत्रित करने का सपना देखता था, आज वह उसी अफगानिस्तान की वजह से पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर भयंकर सुरक्षा संकट से जूझ रहा है। इसके विपरीत, अफगानिस्तान और भारत के बीच का रिश्ता ऐतिहासिक सद्भाव, मानवीय सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता की एक नई दिशा की ओर बढ़ रहा है।


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