पश्चिम एशियाई ध्रुवीकरण, महाशक्तियों के मोहरे और दक्षिण एशिया का भविष्य: एक व्यापक भू-राजनीतिक विश्लेषण

 

1. प्रस्तावना: दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य और भटका हुआ मार्ग

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब औपरिवेशिक साम्राज्य ढह रहे थे और एशिया तथा अफ्रीका के मानचित्र पर नए राष्ट्र उभर रहे थे, तब दुनिया के पास एक सुनहरा अवसर था कि वे शांति, आपसी सहयोग और मानवीय विकास के नए प्रतिमान स्थापित करते। 1947 और 1948 के दौर में दक्षिण एशिया के देशों ने ब्रिटिश दासता से मुक्ति पाई। इस भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़े उपमहाद्वीप में अकूत प्राकृतिक संसाधन, विशाल जनशक्ति और प्राचीन सभ्यतागत साझेदारियाँ थीं।

परंतु, जैसे-जैसे समय बीता, इस क्षेत्र के विकास का मार्ग भटक गया। जहाँ एक तरफ भारत ने तमाम आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं, विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान और आर्थिक उदारीकरण के बल पर दुनिया में अपनी एक मजबूत और स्वतंत्र पहचान बनाई, वहीं इसके कुछ पड़ोसी देश (विशेष रूप से पाकिस्तान) अपनी संप्रभुता को आत्मनिर्भरता के मार्ग पर ले जाने के बजाय संकीर्ण भारत-विरोध और बाहरी ताकतों के प्रलोभनों के हवाले करते चले गए।

इस वैचारिक विचलन ने न केवल दक्षिण एशिया के आंतरिक ताने-बाने को तहस-नहस किया, बल्कि पश्चिम एशिया (जैसे तुर्किए और सऊदी अरब) और वैश्विक महाशक्तियों (अमेरिका और चीन) की अवसरवादी नीतियों को इस क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का खुला मैदान दे दिया। आज यह पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे भू-राजनीतिक भंवर में फंसा हुआ है, जहाँ आंतरिक अलगाववाद, आर्थिक दिवालियापन और बाहरी ताकतों का वर्चस्व इसकी जड़ों को खोखला कर रहा है।

2. पाकिस्तान का অভ্যন্তরীণ पतन: बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और पीओके की त्रासदी

आज पाकिस्तान एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से उसका हर कदम उसे और अधिक रसातल की ओर ले जा रहा है। देश की केंद्रीय सत्ता, जो दशकों से केवल 'भारत-विरोध' की कृत्रिम ऑक्सीजन पर जिंदा रही है, अब अपने ही आंतरिक भूगोल के बोझ तले दबकर टूटने की कगार पर पहुँच चुकी है।

 * बलूचिस्तान का सुलगता असंतोष और दमन: बलूचिस्तान क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन प्राकृतिक गैस, खनिज और स्वर्ण भंडारों से भरपूर इस भूमि पर हमेशा से इस्लामाबाद के सैन्य तंत्र ने बेरहमी से कब्जा जमाया है। 1948 में कलात रियासत के जबरन विलय के बाद से ही बलूच राष्ट्रवादियों ने पाकिस्तान की केंद्रीय हुकूमत को कभी स्वीकार नहीं किया। आज ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के नाम पर बलूच संसाधनों की जो खुली लूट चीन और पाकिस्तान मिलकर कर रहे हैं, उसने वहाँ के युवाओं को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया है। पाकिस्तानी सेना द्वारा बलूच नागरिकों का अपहरण, उत्पीड़न और सैन्य दमन इस क्षेत्र को एक स्थायी गृहयुद्ध की आग में झोंक चुका है।

 * पख्तूनिस्तान और 'डूरंड लाइन' का संघर्ष: खैबर पख्तूनख्वा और कबायली क्षेत्रों में रहने वाला पख्तून समुदाय कभी भी अपनी सांस्कृतिक और जातीय पहचान को पाकिस्तानी कृत्रिम सीमाओं में कैद नहीं कर पाया। ब्रिटिश काल की 'डूरंड लाइन' को लेकर अफगान और पख्तून समाज में हमेशा से आक्रोश रहा है। जब पाकिस्तानी सेना ने अमरीकी और पश्चिमी इशारों पर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर अपने ही पख्तून नागरिकों पर बमबारी की, तो 'पश्तून तहफ़्फ़ुज़ मूवमेंट' (PTM) जैसे लोकतांत्रिक आंदोलनों ने यह साबित कर दिया कि पख्तून जनता अब पाकिस्तानी सेना की गुलामी और अत्याचार को और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

 * पीओके (PoK) का मोहभंग और आज़ादी के स्वर: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) की जनता भी अब पाकिस्तानी हुकूमत के दोहरे चरित्र और आर्थिक शोषण से पूरी तरह त्रस्त हो चुकी है। भारी-भरकम कर, आसमान छूती महंगाई, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ पीओके की सड़कों पर उतर रही जनता आज खुलेआम पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगा रही है और भारत के साथ अपने ऐतिहासिक व सांस्कृतिक जुड़ाव या स्वतंत्र अस्तित्व की मांग कर रही है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि पाकिस्तान अपने ही पाले हुए और कब्जाए हुए क्षेत्रों में जनता का विश्वास हमेशा के लिए खो चुका है।

3. टीटीपी (TTP) और अफगान तालिबान: 'बोया पेड़ बूल का' की जीवंत मिसाल

पाकिस्तान ने दशकों तक अपनी तथाकथित 'रणनीतिक गहराई' (Strategic Depth) की सनक में अफगानिस्तान में तालिबान और अन्य चरमपंथी समूहों को पाला-पोसा था। उसका उद्देश्य इन खूंखार संगठनों को भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ एक प्रॉक्सी हथियार के रूप में इस्तेमाल करना था। लेकिन इतिहास का यह शाश्वत नियम है कि जो देश आतंकवाद को अपने यहाँ पनाह देता है, एक न एक दिन वह नाग उसी के सीने पर फन फैलाकर बैठ जाता है।

 * तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का सशस्त्र विद्रोह: आज वही टीटीपी, जिसे कभी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का संरक्षण प्राप्त था, पाकिस्तान की सेना और उसके सुरक्षा तंत्र के लिए सबसे बड़ा खौफ बन चुका है। खैबर पख्तूनख्वा और सीमावर्ती इलाकों में टीटीपी के लड़ाके पाकिस्तानी सैन्य चौकियों, पुलिस थानों और छावनियों पर लगातार घातक हमले कर रहे हैं। पेशावर आर्मी स्कूल के नरसंहार से लेकर हालिया सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों तक, पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है।

 * अफगान तालिबान की बेरुखी: पाकिस्तान को यह भ्रम था कि 2021 में जब काबुल में तालिबान की सरकार आएगी, तो वह पाकिस्तान के इशारे पर नाचेगी। लेकिन भू-राजनीति में भावनाएँ या एहसान मायने नहीं रखते। अफगान तालिबान ने डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने से साफ इनकार कर दिया और टीटीपी के खिलाफ खुलकर पाकिस्तान की मदद करने से पीछे हट गए। आज पाकिस्तान की पश्चिमी सीमाएँ पूरी तरह अशांत हैं और वह अपने ही बोए हुए विषैले बीजों की फसल काटने के लिए मजबूर है।

4. तुर्किए, सऊदी अरब और पश्चिम एशियाई ध्रुवीकरण: दक्षिण एशिया की मूल राह से भटकाव

जब दक्षिण एशिया के देशों को आपस में मिलकर व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, गरीबी उन्मूलन और क्षेत्रीय सहयोग (जैसे SAARC के माध्यम से) के मार्ग को मजबूत करना चाहिए था, तब पाकिस्तान ने एक बेहद अजीब और कृत्रिम कूटनीतिक चाल चली। उसने क्षेत्रीय वास्तविकताओं को दरकिनार करते हुए पश्चिम एशिया के देशों—विशेष रूप से तुर्किए और सऊदी अरब—के साथ मिलकर एक अलग प्रकार का कूटनीतिक और सामरिक समीकरण बनाने की कोशिश की।

 * सऊदी अरब की बदलती और व्यावहारिक नीतियां: एक समय था जब पाकिस्तान अपनी हर आर्थिक सांस के लिए रियाद (सऊदी अरब) से मिलने वाले बेलआउट पैकेजों पर निर्भर था। पाकिस्तान के शासक यह मान बैठे थे कि धार्मिक समीकरणों के आधार पर सऊदी अरब उसे भारत के खिलाफ स्थायी समर्थन देता रहेगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सऊदी अरब ने अपनी विदेश नीति को कट्टरता से दूर हटाकर 'विजन 2030' और आर्थिक सुधारों पर केंद्रित कर लिया है। सऊदी अरब ने भारत के साथ अपने ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा संबंधों को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। जब भी पाकिस्तान ने कश्मीर या अन्य आंतरिक मुद्दों पर सऊदी अरब पर कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की, रियाद ने स्पष्ट रूप से दूरी बना ली।

 * तुर्किए की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और सीमाएं: तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन ने वैश्विक इस्लामिक राजनीति में खुद को एक बड़े नेता के रूप में पेश करने के लिए पाकिस्तान का समर्थन किया और ड्रोन व सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति की। लेकिन तुर्किए की अपनी अर्थव्यवस्था भीषण मुद्रास्फीति (Inflation) और कर्ज के जाल में फंसी हुई है। तुर्किए भी अंततः यह अच्छी तरह जानता है कि भारत जैसे विशाल वैश्विक बाजार और आर्थिक महाशक्ति के साथ व्यापारिक संबंध तोड़े बिना उसकी अपनी राष्ट्रीय हित सुरक्षित नहीं रह सकते।

 * दक्षिण एशिया के बजाय पश्चिम एशियाई ध्रुवीकरण का दुष्परिणाम: जो शांति और आर्थिक समझौते दक्षिण एशिया के भीतर आपसी विश्वास के आधार पर होने चाहिए थे, वे न होकर पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया के इन बाहरी खिलाड़ियों को अपने यहाँ सामरिक पैठ बनाने का मौका दे दिया। जब पश्चिम एशिया की संप्रदाय-आधारित और अस्थिर भू-राजनीति पाकिस्तान के रास्ते दक्षिण एशिया के दरवाजे तक पहुँचती है, तो यह इस पूरे क्षेत्र की शांति की रीढ़ को तोड़ देती है।

5. चीन और अमेरिका की अवसरवादी नीतियां और दक्षिण एशिया में अलगाववाद के बीज

दक्षिण एशिया की वर्तमान अशांति और विखंडन के पीछे यदि किसी बाहरी ताकत का सबसे बड़ा हाथ है, तो वे चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियाँ हैं। इन देशों ने अपने भू-राजनीतिक वर्चस्व और संसाधनों की लूट के लिए दक्षिण एशिया को एक क्रीड़ा स्थल बना दिया है।

 * चीन की 'डेट-ट्रैप' कूटनीति और पाकिस्तान का समर्पण: पाकिस्तान ने भारत को घेरने के लिए चीन को अपनी अर्थव्यवस्था और जमीन (CPEC और ग्वादर) पर खुला अधिकार दे दिया। आज पाकिस्तान चीन की एक आर्थिक कॉलोनी या 'डेट ट्रैप' (कर्ज के जाल) में फंसा राष्ट्र बनकर रह गया है। चीन की इस साम्राज्यवादी नीति ने न केवल पाकिस्तान की संप्रभुता को समाप्त किया है, बल्कि वहाँ की स्थानीय जनता (विशेषकर बलूच और पख्तून) के भीतर अलगाववाद की आग को और भड़का दिया है।

 * श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में महाशक्तियों का हस्तक्षेप: केवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह प्रकरण से लेकर म्यांमार के चल रहे गृहयुद्ध और बांग्लादेश के राजनीतिक उथल-पुथल तक, चीन और अमेरिका ने अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' और इंडो-पैसिफिक रणनीतियों के तहत इन देशों की आंतरिक राजनीति में भारी हस्तक्षेप किया है।

 * भविष्य के खतरे (अलगाववाद के नए बीज): यदि यही हस्तक्षेप जारी रहा, तो आने वाले समय में बलूचिस्तान और पख्तूनिस्तान की तर्ज पर अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे देशों में भी क्षेत्रीय विखंडन, जातीय संघर्ष और अलगाववाद के नए बीज अंकुरित होने में देर नहीं लगेगी। इन देशों की आंतरिक कमजोरियों का फायदा उठाकर महाशक्तियाँ अपने हित साध रही हैं, जिसका खामियाजा अंततः दक्षिण एशिया के आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।

6. अमेरिका-कनाडा मॉडल बनाम दक्षिण एशिया: एक ऐतिहासिक सबक

इस भू-राजनीतिक त्रासदी को समझने के लिए यदि हम पश्चिमी गोलार्ध के देशों—विशेष रूप से अमेरिका और कनाडा—के मॉडल का अध्ययन करें, तो एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

 * अमेरिका और कनाडा के बीच दुनिया की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, लेकिन वह सीमा कभी भी आतंकवाद, युद्ध या अविश्वास का अखाड़ा नहीं रही।

 * दोनों देशों ने अपनी ऊर्जा और संसाधनों को एक-दूसरे को नीचा दिखाने या सीमा विवादों में झोंकने के बजाय मुक्त व्यापार, शिक्षा, तकनीक, विज्ञान और जन-कल्याण में लगाया। आज वे दुनिया के सबसे समृद्ध और सुरक्षित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसके विपरीत, दक्षिण एशिया के देशों ने (विशेषकर पाकिस्तान ने) 1947 में आज़ादी के बाद से ही 'सहयोग और सह-अस्तित्व' के मार्ग को छोड़कर 'नफरत, आतंकवाद और अंधा भारत-विरोध' के मार्ग को चुना। इसी संकीर्णता के कारण दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे कम एकीकृत और सबसे अशांत क्षेत्र बन गया है।

7. समाधान और भविष्य की राह: भारत के साथ विश्वास बहाली और क्षेत्रीय एकीकरण

इस ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक दलदल से बाहर निकलने का केवल एक ही वास्तविक और स्थायी मार्ग बचा है—कट्टरता का त्याग, बाहरी महाशक्तियों की गुलामी से मुक्ति और भारत के नेतृत्व में क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण व विश्वास की बहाली।

 * आतंकवाद और छद्म युद्ध का अंत: पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों को यह समझना होगा कि राज्य-प्रायोजित आतंकवाद और कट्टरपंथ कभी भी किसी राष्ट्र को बचा नहीं सकते। जब तक ज़मीन का इस्तेमाल बाहरी ताकतों या प्रॉक्सी युद्धों के लिए होता रहेगा, तब तक शांति असंभव है।

 * भारत की 'पड़ोसी पहले' (Neighbourhood First) नीति का लाभ: भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तकनीकी, अंतरिक्ष व नवाचार में वैश्विक सिरमौर बन चुका है। श्रीलंका के आर्थिक संकट के समय भारत ने जिस प्रकार बिना किसी राजनीतिक शर्त के सबसे आगे बढ़कर अरबों डॉलर की मदद की, वह इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र का सच्चा और विश्वसनीय मददगार केवल भारत है, न कि चीन या दूरदराज के देश।

 * क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी: यदि दक्षिण एशिया के देश अपनी पुरानी भारत-विरोधी जिद को छोड़कर ऊर्जा गलियारों, मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रास्ते खोल दें, तो इस पूरे उपमहाद्वीप से गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी का नामोनिशान मिट सकता है।

8. निष्कर्ष

बलूचिस्तान और पख्तूनिस्तान के सुलगते मैदानों से लेकर पाकिस्तान के आर्थिक दिवालियापन तक, और तुर्किए-सऊदी अरब के कृत्रिम समीकरणों से लेकर चीन-अमेरिका के भू-राजनीतिक षड्यंत्रों तक, यह अकाट्य रूप से सिद्ध हो चुका है कि अंधा भारत-विरोध और बाहरी महाशक्तियों के प्रलोभन किसी भी राष्ट्र को रसातल में धकेलने के लिए पर्याप्त हैं।

दक्षिण एशिया का उज्ज्वल और समृद्ध भविष्य तभी संभव है जब इस क्षेत्र के सभी देश नफरत और टकराव के चश्मे को उतारकर, इतिहास की कड़वाहट को पीछे छोड़ें, और अमेरिका-कनाडा की तर्ज पर आपसी सहयोग व भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का ऐतिहासिक निर्णय लें। यही दक्षिण एशिया के डेढ़ अरब से अधिक लोगों के शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समृद्ध कल की एकमात्र गारंटी है।


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