चीन को दक्षिण एशिया में पैर जमाने का अवसर: क्षेत्रीय राजनीति और उसके परिणाम

 

यह एक कड़वी और ऐतिहासिक सच्चाई है कि दक्षिण एशिया के कुछ देशों ने अपनी संकीर्ण रणनीतिक प्राथमिकताओं और भारत-विरोध की जिद के चलते चीन को इस क्षेत्र में अपने पैर पसारने का खुला मौका दिया।

पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों ने अपनी आंतरिक विफलताओं को ढकने और भारत को घेरने के लिए चीन को एक 'रणनीतिक साझीदार' के रूप में आमंत्रित किया, जिसके परिणाम आज पूरे दक्षिण एशिया के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

1. पाकिस्तान द्वारा चीन को मुख्य द्वार बनाना

 * 'भारत को काउंटर करने' की सनक: पाकिस्तान ने अपनी विदेश नीति का एकमात्र उद्देश्य भारत का विरोध करना बना लिया। इसी जिद में उसने चीन को बलूचिस्तान, पीओके और अपने अन्य हिस्सों में बेरोक-टोक दखल देने की छूट दे दी।

 * CPEC और डेट ट्रैप (कर्ज का जाल): चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के नाम पर पाकिस्तान ने अपनी अर्थव्यवस्था को चीन के हाथों गिरवी रख दिया। ग्वादर बंदरगाह पर चीन की सैन्य और आर्थिक पकड़ मजबूत होने से न केवल पाकिस्तान की संप्रभुता खतरे में पड़ी है, बल्कि बलूच जनता का भयंकर विरोध भी सामने आया है। आज पाकिस्तान चीन की आर्थिक कॉलोनी बनकर रह गया है।

2. अन्य पड़ोसी देशों की कूटनीतिक भूल

 * श्रीलंका और हंबनटोटा बंदरगाह: श्रीलंका ने भारत के बजाय चीन से भारी कर्ज लेकर हंबनटोटा बंदरगाह और मटला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे जैसे अनुत्पादक (Unprofitable) मेगा प्रोजेक्ट्स बनाए। जब श्रीलंका वह कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा, तो उसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल के लिए चीन को लीज पर देना पड़ा, जो उसकी संप्रभुता के लिए एक बड़ा झटका था। हालांकि बाद में आर्थिक संकट के समय भारत ने ही श्रीलंका की सबसे बड़ी मदद की।

 * मालदीव और 'इंडिया आउट' की राजनीति: मालदीव के कुछ राजनीतिक दलों ने भारत-विरोध की राजनीति चमकाने के लिए चीन की तरफ झुकाव दिखाया। हालांकि बाद में वहां की सरकारों को यह यथार्थ समझ आ गया कि चीन केवल कर्ज और भू-राजनीतिक जाल बिछाता है, जबकि संकट के समय केवल भारत ही वास्तविक और सबसे पहला मददगार साबित होता है।

 * बांग्लादेश और म्यांमार में चीन की घुसपैठ: बांग्लादेश और म्यांमार में भी विभिन्न समयों पर चीन ने अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (मोतियों की माला) रणनीति के तहत सामरिक और आर्थिक निवेश के जरिए भारत को घेरने की कोशिश की है।

3. इसके दूरगामी परिणाम और दक्षिण एशिया का नुकसान

 * क्षेत्रीय सुरक्षा में सेंध: चीन के दक्षिण एशिया (विशेषकर हिंद महासागर और पाकिस्तान) में पैर जमाने से इस पूरे क्षेत्र का सामरिक संतुलन बिगड़ गया है। हिंद महासागर को जो कभी 'शांति का क्षेत्र' होना चाहिए था, वह महाशक्तियों के टकराव का अखाड़ा बन गया है।

 * संप्रभुता का सौदा: जिन देशों ने भारत को रोकने के लिए चीन को बुलाया, वे आज खुद चीन की आर्थिक गुलामी और कर्ज के जाल में फंस चुके हैं। चीन की नीतियां पारदर्शी नहीं होतीं, और वह धीरे-धीरे उन देशों के संसाधनों और जमीनों पर कब्जा कर लेता है।

निष्कर्ष

दक्षिण एशिया के देशों ने भारत-विरोध के चक्कर में चीन को जो 'पायदान' (प्रवेश द्वार) मुहैया कराया, वह उनके अपने ही गले की फांस बन चुका है। इतिहास यह साबित करता है कि जो देश अपने पड़ोसियों के साथ व्यापार और सहयोग के बजाय बाहरी महाशक्तियों को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने देते हैं, वे अंततः अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता खो बैठते हैं। दक्षिण एशिया की वर्तमान अशांति और बदहाली के पीछे चीन का यह अवसरवादी प्रवेश एक बहुत बड़ा कारण रहा है।


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