दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक और आर्थिक त्रासद अध्याय

  भारत-विरोध की राजनीति, बाहरी महाशक्तियों के प्रलोभन और साझा भविष्य की संभावनाएं

1. प्रस्तावना: 1940 के दशक के दो अलग मार्ग और उनका वर्तमान परिणाम

बीसवीं शताब्दी के मध्य का काल मानव इतिहास के सबसे बड़े बदलावों का गवाह रहा है। औपनिवेशिक साम्राज्यों का सूर्य अस्त हो रहा था और दुनिया के मानचित्र पर नए स्वतंत्र राष्ट्र जन्म ले रहे थे। इसी दौर में, 1947 और 1948 के आसपास दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान जैसे राष्ट्र ब्रिटिश दासता से मुक्त हुए। इतिहास के इस मोड़ पर इन देशों के पास एक सुनहरा अवसर था कि वे अपनी सदियों पुरानी गुलामी के जख्मों को भरकर एक नए, समृद्ध और शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण करते।

परंतु, भौगोलिक निकटता और साझा संस्कृति के बावजूद इन नव-स्वतंत्र राष्ट्रों ने विकास के दो बिल्कुल विपरीत मार्ग चुने। एक तरफ भारत ने लोकतांत्रिक संस्थाओं, विज्ञान, तकनीकी विकास और आंतरिक स्वावलंबन के साथ-साथ अपनी विशाल विविधता को संभालते हुए आगे बढ़ने का कठिन लेकिन स्थिर रास्ता चुना। दूसरी तरफ, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के कुछ अन्य पड़ोसी देशों ने अपनी राष्ट्रीय पहचान की नींव 'भारत-विरोध' और संकीर्ण क्षेत्रीय राजनीति पर रख दी।

इस वैचारिक विचलन ने न केवल उस समय के पूरे उपमहाद्वीप को प्रभावित किया, बल्कि आने वाले दशकों में इस पूरे क्षेत्र को अशांति, गरीबी और राजनीतिक अस्थिरता के एक अंतहीन दलदल में धकेल दिया। इसके विपरीत, यदि हम दुनिया के अन्य पड़ोसी देशों (जैसे उत्तरी अमेरिका में अमेरिका और कनाडा) के मॉडल का अध्ययन करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कैसे आपसी सहयोग, खुली सीमाएं और आर्थिक एकीकरण किसी भी क्षेत्र को महाशक्ति बना सकते हैं। इसके उलट, दक्षिण एशिया में 'भारत-विरोध' की राजनीति ने इस पूरे भू-भाग की संभावनाओं को बंधक बना लिया है।

2. पाकिस्तान की आंतरिक भंवर: बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और पीओके का यथार्थ

आज पाकिस्तान जिस दौर से गुजर रहा है, वह इतिहास के किसी भी साम्राज्य के पतन से कम नहीं है। देश की आंतरिक नीतियां और उसकी सैन्य व्यवस्था एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुकी है, जिससे निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।

 * बलूचिस्तान का सुलगता असंतोष: क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान दशकों से दमन, मानवाधिकारों के हनन और आर्थिक शोषण का शिकार रहा है। 1948 में कलात रियासत के जबरन विलय के बाद से ही बलूच जनता अपने आत्मनिर्णय और संसाधनों की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रही है। ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के नाम पर बलूच भूमि के दोहन ने इस आक्रोश को और भड़का दिया है। पाकिस्तानी सेना की दमनकारी नीतियां इस आग को बुझाने के बजाय और अधिक हवा दे रही हैं।

 * पख्तूनिस्तान और सीमाई अशांति: खैबर पख्तूनख्वा और कबायली इलाकों में रहने वाला पख्तून समुदाय कभी भी पाकिस्तानी केंद्रीय सत्ता और 'डूरंड लाइन' के कृत्रिम विभाजन को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाया है। पाकिस्तानी सेना के आतंकवाद विरोधी अभियानों ने इस क्षेत्र को गृहयुद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। 'पश्तून तहफ़्फ़ुज़ मूवमेंट' (PTM) जैसे लोकतांत्रिक आंदोलनों ने यह साबित कर दिया है कि पख्तून जनता अब पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों को और सहने के मूड में नहीं है।

 * पीओके (PoK) का मोहभंग: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोग भी अब खुलकर पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। महंगाई, भारी-भरकम बिजली बिल, प्रशासनिक उपेक्षा और मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ उठ रही 'आज़ादी' और भारत के साथ बेहतर संबंधों की मांगें इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि पाकिस्तान अपने ही कब्जे वाले क्षेत्रों में जनता का विश्वास पूरी तरह खो चुका है।

3. बाहरी महाशक्तियों के प्रलोभन और भू-राजनीतिक मोहरा

पाकिस्तान की इस आंतरिक तबाही के पीछे उसकी वह विदेश नीति भी उतनी ही जिम्मेदार है, जिसके तहत उसने अपनी संप्रभुता को बाहरी महाशक्तियों के हाथों में गिरवी रख दिया।

 * अमेरिका की उपयोगितावादी नीति: शीत युद्ध के दौर से लेकर 'आतंक के खिलाफ युद्ध' तक, अमेरिका ने पाकिस्तान को केवल एक किराए की फौज या भू-राजनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। जब तक अमेरिका के रणनीतिक हित पूरे होते रहे, उसने डॉलर की बारिश की; लेकिन जैसे ही उसकी प्राथमिकताएं बदलीं, उसने पाकिस्तान को उसके हाल पर अकेला छोड़ दिया।

 * चीन का 'डेट ट्रैप' (कर्ज का जाल): हाल के दशकों में अमेरिका की जगह चीन ने पाकिस्तान पर अपनी पकड़ मजबूत की है। CPEC और भारी-भरकम कर्ज के जरिए चीन ने पाकिस्तान को एक ऐसे वित्तीय संकट में धकेल दिया है, जहां उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चीनी शर्तों पर चलती है। ग्वादर और बलूचिस्तान में चीनी दखल ने स्थानीय जनता के बीच असंतोष को और गहरा कर दिया है।

 * तुर्की और अन्य देशों की सीमाएं: पाकिस्तान यह मान बैठा था कि धार्मिक या सामरिक समीकरणों के आधार पर तुर्की या अन्य देश उसे हर संकट से बचा लेंगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल राष्ट्रीय हितों पर चलती है, और कोई भी देश दिवालिया हो चुके पाकिस्तान को अनिश्चितकाल तक मुफ्त में समर्थन नहीं दे सकता।

4. टीटीपी (TTP) और तालिबान का उभार: बोया पेड़ बूल का, तो आम कहां से होय?

पाकिस्तान ने दशकों तक 'रणनीतिक गहराई' (Strategic Depth) की आड़ में अफगानिस्तान में तालिबान और अन्य चरमपंथी समूहों को पाला-पोसा। उसने यह मान लिया था कि ये कट्टरपंथी ताकतें केवल उसके बाहरी हितों (विशेषकर भारत के खिलाफ) को साधेंगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि आतंकवाद एक ऐसा पालतू सांप है, जो मौका मिलते ही अपने ही पालने वाले को डंसता है।

 * तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP): आज वही टीटीपी, जिसे कभी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) का समर्थन प्राप्त था, सीधे तौर पर पाकिस्तानी राज्य और उसकी सेना के खिलाफ सशस्त्र युद्ध लड़ रहा है। पेशावर के स्कूल हमले से लेकर सैन्य छावनियों पर होने वाले आत्मघाती हमलों तक, टीटीपी ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी है।

 * अफगान तालिबान का रुख: अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता आने के बाद पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि काबुल उसकी हर बात मानेगा। लेकिन इसके विपरीत, अफगान तालिबान ने डूरंड लाइन को मानने से इनकार कर दिया और टीटीपी के खिलाफ खुलकर कार्रवाई करने से पीछे हट गए। आज अफगानिस्तान की सीमाएं पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी हैं।

5. दक्षिण एशियाई देशों की असफलता और 'भारत-विरोध' का जहरीला बीज

यह केवल पाकिस्तान की कहानी नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया के कई अन्य देशों ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया है। श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार और नेपाल जैसे देशों में समय-समय पर ऐसी राजनीतिक प्रवृत्तियां देखने को मिली हैं जिन्होंने अपनी आंतरिक विफलताओं को छिपाने के लिए 'भारत-विरोध' को अपनी राजनीतिक जीवन रेखा बना लिया।

 * विकास के बजाय टकराव: जब किसी देश के शासक अपनी जनता को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य देने में असफल हो जाते हैं, तो वे जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत के खिलाफ कृत्रिम नफरत फैलाते हैं। इस संकीर्ण राजनीति ने दक्षिण एशिया को दुनिया का सबसे कम एकीकृत और सबसे गरीब क्षेत्र बना दिया है।

 * सार्क (SAARC) की विफलता: क्षेत्रीय सहयोग के लिए बना सार्क संगठन पाकिस्तान की जिद और उसकी भारत-विरोधी नीतियों के कारण आज लगभग मृतप्राय हो चुका है। इसके विपरीत, दुनिया के अन्य क्षेत्रों (जैसे दक्षिण-पूर्वी एशिया में आसियान या यूरोप में यूरोपीय संघ) ने आपसी व्यापार और सहयोग के जरिए अपनी अर्थव्यवस्थाओं को आसमान पर पहुंचा दिया है।

6. अमेरिका-कनाडा मॉडल बनाम दक्षिण एशिया: एक तुलनात्मक दृष्टि

यदि हम दुनिया के अन्य विकसित क्षेत्रों का उदाहरण देखें, तो उत्तरी अमेरिका में अमेरिका और कनाडा का मॉडल सबसे सामने आता है।

 * अमेरिका और कनाडा के बीच दुनिया की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, लेकिन वह सीमा कभी तनाव, आतंकवाद या युद्ध का अखाड़ा नहीं रही।

 * दोनों देशों ने अपनी ऊर्जा सीमाओं की रक्षा या एक-दूसरे को नीचा दिखाने में खर्च करने के बजाय मुक्त व्यापार, शिक्षा, तकनीक और जन-कल्याण में लगाई। आज दोनों देश एक-दूसरे के पूरक बनकर दुनिया के सबसे शक्तिशाली और समृद्ध क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसके विपरीत, दक्षिण एशिया में 1940 के दशक में आज़ाद हुए देश आज भी सीमाओं के विवाद, आतंकवाद, गरीबी और आपसी अविश्वास की आग में सुलग रहे हैं। इसका एकमात्र कारण यह है कि दक्षिण एशिया (विशेषकर पाकिस्तान) ने 'सहयोग और सह-अस्तित्व' के मार्ग को छोड़कर 'नफरत और टकराव' के मार्ग को चुना।

7. समाधान और भविष्य की राह: भारत के साथ दीर्घकालिक सहयोग और विश्वास बहाली

इस ऐतिहासिक त्रासदी से निकलने का केवल एक ही वास्तविक और स्थायी मार्ग बचा है—भारत के साथ दीर्घकालिक सहयोग, क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण और विश्वास की बहाली।

 * कट्टरता का त्याग: पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों को यह समझना होगा कि आतंकवाद और छद्म युद्ध किसी भी देश को बचा नहीं सकते। जब तक राज्य स्तर पर चरमपंथ को पनाह दी जाती रहेगी, तब तक वहां स्थिरता नहीं आ सकती।

 * आर्थिक साझेदारी का लाभ: भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तकनीकी व अंतरिक्ष क्षेत्र में वैश्विक सिरमौर बन रहा है। भारत का विशाल बाजार और उसकी 'पड़ोसी पहले' (Neighbourhood First) नीति इस बात का प्रमाण है कि संकट के समय (जैसा कि श्रीलंका के मामले में देखा गया) भारत ने बिना किसी राजनीतिक शर्त के अपने पड़ोसियों की सबसे बड़ी मदद की है।

 * क्षेत्रीय शांति और व्यापार: यदि दक्षिण एशिया के देश अपनी संकीर्ण मानसिकता को छोड़कर भारत के साथ ऊर्जा गलियारों, मुक्त व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रास्ते खोल दें, तो इस क्षेत्र से गरीबी और बेरोजगारी का नामोनिशान मिट सकता है।

8. निष्कर्ष

बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा तक, और पीओके से लेकर पाकिस्तान के आर्थिक दिवालियापन तक, यह स्पष्ट हो चुका है कि अंधा भारत-विरोध और बाहरी महाशक्तियों की गुलामी किसी भी राष्ट्र को रसातल में ले जाने के लिए पर्याप्त है।

तुर्की, चीन या अमेरिका के प्रलोभन कभी भी किसी देश की आंतरिक कमजोरी को दूर नहीं कर सकते। दक्षिण एशिया का असली विकास तभी संभव है जब इस क्षेत्र के सभी देश नफरत के चश्मे को उतारकर, इतिहास की कड़वाहट को पीछे छोड़कर, अमेरिका-कनाडा की तर्ज पर आपसी सहयोग और भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का ऐतिहासिक निर्णय लें। यही दक्षिण एशिया के डेढ़ अरब से अधिक लोगों के उज्ज्वल और समृद्ध भविष्य की एकमात्र गारंटी है।


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