दक्षिण एशियाई देशों की असफलता का मूल बीज: भारत-विरोध की राजनीति

 

दक्षिण एशिया और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों (जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार और अफगानिस्तान) के इतिहास और वर्तमान स्थिति का गहराई से अध्ययन करने पर एक स्पष्ट सच्चाई सामने आती है—इन देशों की आर्थिक बदहाली, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति के पीछे सबसे बड़ा वैचारिक बीज 'भारत-विरोध' की संकीर्ण राजनीति है।

1. भारत-विरोध: शासकों के लिए राजनीतिक ढाल

इनमें से कई देशों के राजनीतिक दलों और सत्ताधारी तंत्र (विशेषकर सैन्य शासन या अवसरवादी सरकारों) ने अपनी आंतरिक विफलताओं, भ्रष्टाचार और कुशासन से जनता का ध्यान भटकाने के लिए हमेशा 'भारत-विरोध' को एक आसान हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है:

 * दोषारोपण की संस्कृति: जब भी देश में महंगाई, बेरोजगारी या प्रशासनिक नाकामी चरम पर होती है, तो जनता के गुस्से को मोड़ने के लिए भारत को खलनायक के रूप में पेश किया जाता है।

 * लोकलुभावन राष्ट्रवाद: सत्ता हासिल करने या बचाए रखने के लिए कृत्रिम रूप से भारत-विरोधी भावनाएं भड़काना इन देशों की राजनीति का एक पुराना और खतरनाक नुस्खा रहा है, जिसका खामियाजा अंततः वहां की आम जनता को भुगतना पड़ता है।

2. क्षेत्रीय सहयोग और प्रगति का अवरोध

दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे कम एकीकृत (Least Integrated) क्षेत्रों में से एक है। यूरोप या दक्षिण-पूर्वी एशिया (आसियान) के विपरीत, जहाँ पड़ोसी देश आपसी व्यापार और सहयोग से आगे बढ़ रहे हैं, दक्षिण एशिया में यह प्रक्रिया ठप पड़ी है:

 * सार्क (SAARC) की विफलता: केवल भारत के विरोध की जिद के कारण क्षेत्रीय सहयोग के सारे मंच या तो निष्क्रिय हो गए हैं या आपसी अविश्वास का शिकार हैं।

 * आर्थिक नुकसान: यदि ये देश अपनी संकीर्ण मानसिकता को छोड़कर भारत के विशाल बाजार, तकनीकी प्रगति और बुनियादी ढांचे के विकास का लाभ उठाते, तो आज उनके यहाँ गरीबी और बेरोजगारी की यह स्थिति न होती।

3. बाहरी ताकतों के लिए मु मुफ़्त का अवसर

जब पड़ोसी देश अपनी नीतियों को केवल भारत को रोकने या घेरने के केंद्रित कर लेते हैं, तो वैश्विक महाशक्तियां (जैसे चीन या शीत युद्ध के दौरान अन्य देश) इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाती हैं:

 * रणनीतिक गुलामी और 'डेट ट्रैप': भारत-विरोध के चक्कर में इन देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी ताकतों के हाथों में गिरवी रख दिया है। चीन जैसी ताकतों ने इसका लाभ उठाकर इन्हें कर्ज के जाल में फंसाया है, जिससे इनकी संप्रभुता खतरे में पड़ गई है।

निष्कर्ष

दक्षिण एशिया के इन देशों की असफलता इस बात का प्रमाण है कि नफरत और विरोध के आधार पर कोई भी राष्ट्र दीर्घकालिक प्रगति नहीं कर सकता। जब तक ये देश अपनी नीतियों से 'भारत-विरोध' के इस जहरीले बीज को उखाड़कर क्षेत्रीय सहयोग, शांति और सह-अस्तित्व के मार्ग को नहीं अपनाएंगे, तब तक वे आंतरिक और बाहरी संकटों के दलदल से बाहर नहीं निकल पाएंगे।


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