दक्षिण एशिया का अकेला लोकतांत्रिक स्तंभ और भू-राजनीतिक चक्रव्यूह
आज के भू-राजनीतिक मानचित्र का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए, तो भारत की स्थिति एक ऐसे अनूठे और कठिन केंद्र के रूप में उभरती है, जो एक तरफ मुस्लिम बहुल देशों की आंतरिक व बाहरी अस्थिरता (कट्टरता और अराजकता), दूसरी तरफ उत्तर में चीन की आक्रामक तानाशाही, और अपने चारों तरफ विफल या नाजुक लोकतंत्रों के घेरे के बीच अकेला जूझ रहा है।
इस भू-राजनीतिक दुष्चक्र में भारत की स्थिति और उसकी चुनौतियों को इन तीन मुख्य मोर्चों पर समझा जा सकता है:
1. पश्चिम और उत्तर-पश्चिम: मुस्लिम जगत की आंतरिक अराजकता और कट्टरता
भारत के पश्चिम और उत्तर-पश्चिम का पूरा भू-भाग (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कुछ हिस्से) दशकों से राजनीतिक अस्थिरता, चरमपंथ, गृहयुद्ध और कट्टरता की आग में सुलग रहा है:
* विफल और परजीवी राज्य: पाकिस्तान जैसी व्यवस्थाएं, जो धर्म और भारत-विरोध की नींव पर खड़ी हैं, आज आतंकवाद के भस्मासुर और आर्थिक बदहाली के कारण खुद अपने ही बोझ से बिखरने की कगार पर हैं।
* कट्टरता का निर्यात: इन क्षेत्रों में शासन प्रणालियों की विफलता और कट्टरपंथी विचारधाराओं का प्रसार न केवल उनके अपने नागरिकों के लिए अभिशाप बन चुका है, बल्कि लगातार भारत की आंतरिक सुरक्षा (सीमा पार आतंकवाद और घुसपैठ) के लिए भी एक स्थायी खतरा बना हुआ है।
2. उत्तर और पूर्वोत्तर: चीन की विस्तारवादी तानाशाही
भारत की उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर दुनिया की सबसे ताकतवर और क्रूर तानाशाही में से एक यानी चीन बैठा है:
* घेराबंदी की नीति: चीन ने 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' और CPEC जैसी रणनीतियों के जरिए भारत के पड़ोसी देशों (पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार) को अपने कर्ज के जाल में फंसाकर भारत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश की है।
* लोकतंत्र बनाम तानाशाही का संघर्ष: चीन एक ऐसी सर्वसत्तावादी (Authoritarian) व्यवस्था का प्रतीक है, जो अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर एशिया और दुनिया भर में अपने वर्चस्व को थोपना चाहती है। इसके ठीक विपरीत, भारत का जीवंत लोकतंत्र उसकी विस्तारवादी नीतियों के सामने सबसे बड़ी वैचारिक और रणनीतिक दीवार बनकर खड़ा है।
3. चारों तरफ विफल लोकतंत्रों का घेरा (Ring of Fragile States)
भारत की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दक्षिण एशिया में उसके जितने भी पड़ोसी देश हैं, वहां या तो सेना का शासन है, या अंतरिम सरकारें हैं, या फिर वे लोकतंत्र जो अत्यधिक कमजोर, अस्थिर और बाहरी ताकतों (विशेषकर चीन और पश्चिमी देशों) के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं:
* श्रीलंका का आर्थिक संकट और राजनीतिक उथल-पुथल,
* बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकार के पतन के बाद उपजी कट्टरपंथी और अनिश्चित परिस्थितियां,
* म्यांमार में सेना (जुंटा) और विद्रोहियों के बीच चल रहा खूनी गृहयुद्ध,
* मालदीव में लगातार बदलते सत्ता समीकरण और बाहरी हस्तक्षेप।
इन सभी देशों में या तो लोकतंत्र पनप नहीं पाया या वह आंतरिक भ्रष्टाचार और बाहरी साजिशों के कारण बिखर गया।
निष्कर्ष: वैश्विक लोकतंत्र की अंतिम और सबसे बड़ी उम्मीद
इन तमाम विकट परिस्थितियों के बीच—एक तरफ मुस्लिम जगत की अराजकता, दूसरी तरफ चीन की तानाशाही, और चारों तरफ विफल या गिरते हुए लोकतंत्रों का घेरा—भारत दुनिया का कलौता ऐसा विशाल, बहुसांस्कृतिक और मजबूत लोकतांत्रिक राष्ट्र है जो इन सभी दबावों को झेलते हुए भी न केवल मजबूती से खड़ा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, विज्ञान और शांति का एक नया ध्रुव बन चुका है।
यही कारण है कि भारत की सफलता या विफलता केवल उसकी अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं है; भारत का यह संघर्ष पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यों के भविष्य का सबसे बड़ा इम्तिहान है।









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