ईरान और अफगानिस्तान: शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी प्रभाव और उसके ऐतिहासिक मोड़

 

यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि आज के दौर में अमेरिका के धुर विरोधी नजर आने वाले देश—ईरान और अफगानिस्तान—कभी शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी भू-राजनीतिक रणनीति के सबसे अहम और करीबी 'मोहरे' या सहयोगी रहे थे। समय और महाशक्तियों की चालों ने इन दोनों देशों के इतिहास को पूरी तरह से उलट दिया।

1. ईरान: शाह का दौर और अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक अड्डा (1953–1979)

 * ऑपरेशन अजाक्स (1953): ईरान के इतिहास में अमेरिका का सीधा हस्तक्षेप 1953 में हुआ, जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी (CIA) ने ब्रिटेन के साथ मिलकर एक तख्तापलट (Operation Ajax) कराया। इसके जरिए ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसाद्देह को सत्ता से हटा दिया गया और अमेरिका समर्थक राजा मोहम्मद रजा पहलवी (शाह ऑफ ईरान) को पूर्ण ताकतों के साथ गद्दी पर बैठाया गया।

 * अमेरिका का प्रमुख पिछलग्गू: इसके बाद के ढाई दशकों तक ईरान, मध्य पूर्व में अमेरिका और पश्चिमी देशों का सबसे भरोसेमंद और प्रमुख सामरिक सहयोगी रहा। ईरान ने सस्ते तेल की आपूर्ति और सोवियत संघ (USSR) की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अमेरिका को अपने देश में सैन्य अड्डे और खुफिया ठिकाने बनाने की पूरी छूट दी थी।

 * 1979 की इस्लामी क्रांति: अमेरिकी समर्थन पर पलने वाला शाह का तानाशाही शासन ईरान की जनता को नागवार गुजरा। 1979 की इस्लामी क्रांति (Islamic Revolution) के बाद अयातुल्ला खोमैनी के नेतृत्व में वहां धर्मतंत्र की स्थापना हुई। इसके बाद अमेरिका के दूतावास पर कब्जा (Iran Hostage Crisis) हुआ और जो ईरान कभी अमेरिका का सबसे खास एजेंट हुआ करता था, वह रातों-रात अमेरिका का 'ग्रेट सैतान' (शत्रु नंबर एक) बन गया।

2. अफगानिस्तान: सोवियत संघ के खिलाफ 'जिहाद' और अमेरिका-पाकिस्तान का गठजोड़

 * 1970 के दशक का उदार अफगानिस्तान: आज के कट्टर तालिबान शासित अफगानिस्तान की तस्वीर इसके बिल्कुल विपरीत थी। 1970 के दशक के शुरुआती दौर में काबुल एक आधुनिक, सांस्कृतिक और अपेक्षाकृत उदार शहर था, जहाँ सोवियत संघ का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था।

 * ऑपरेशन साइक्लोन और मुजाहिदीन का निर्माण: जब दिसंबर 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में अपनी सेनाएँ उतारीं, तो अमेरिका ने सोवियत संघ को हराने और उसे सबक सिखाने के लिए एक बहुत बड़ा गुप्त अभियान (Operation Cyclone) चलाया। अमेरिका (CIA), सऊदी अरब और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) ने मिलकर इस्लामिक कट्टरपंथियों और 'मुजाहिदीन' को भारी मात्रा में फंड, हथियार और ट्रेनिंग दी।

 * भस्मासुर जैसी स्थिति: उस समय अमेरिका और उसके सहयोगियों ने सोवियत संघ को घेरने के लिए जिन चरमपंथी नेटवर्कों (जिनसे आगे चलकर अल-कायदा और तालिबान का जन्म हुआ) को पाला-पोसा, वे अमेरिका के लिए ही भस्मासुर साबित हुए। 9/11 के हमलों के बाद अमेरिका को खुद उसी अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं उतारनी पड़ीं, जिसे उसने कभी सोवियत संघ के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था।

निष्कर्ष

ईरान और अफगानिस्तान का यह अतीत इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भू-राजनीति में कोई देश स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता, केवल सामरिक हित होते हैं। जिन ताकतों को अमेरिका ने अपने अल्पकालिक शीत युद्ध के स्वार्थों के लिए पाला था, जब वही ताकतें नियंत्रण से बाहर हुईं या वहां की जनता का आक्रोश फूटा, तो उन देशों ने अमेरिका के खिलाफ ही स्थायी शत्रुता का रास्ता चुन लिया।


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