विश्व शक्तियों की रणनीतिक दुविधा और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति
आज की बहुध्रुवीय (Multipolar) वैश्विक व्यवस्था में भारत दुनिया की तमाम बड़ी महाशक्तियों (जैसे अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय संघ) के लिए एक साथ सबसे बड़ी आवश्यकता भी है और एक जटिल 'दुविधा' (Dilemma) भी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा देश रहा हो, जिसने महाशक्तियों के बीच बिना किसी गुट में शामिल हुए, अपनी शर्तों पर दुनिया को इस तरह प्रभावित किया हो। वैश्विक शक्तियों के लिए भारत आज एक ऐसी पहेली बन चुका है, जिसे न तो वे नजरअंदाज कर सकती हैं और न ही पूरी तरह अपने नियंत्रण में रख सकती हैं।
1. अमेरिका और पश्चिमी देशों की दुविधा: एक लोकतांत्रिक साझीदार बनाम रणनीतिक स्वायत्तता
पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) के लिए भारत आज चीन के बढ़ते आक्रामक प्रभाव (Rise of China) को रोकने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में सबसे मजबूत और स्वाभाविक लोकतांत्रिक साझीदार है। क्वाड (QUAD) का गठन इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
* दुविधा क्या है? अमेरिका चाहता है कि भारत पूरी तरह उसके पश्चिमी खेमे में शामिल होकर चीन और रूस के खिलाफ खुलकर खड़ा हो जाए। लेकिन भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति (जैसे रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली और भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना) अमेरिका और पश्चिमी देशों को हमेशा असमंजस में डालती है। वे भारत के बिना चीन को काउंटर नहीं कर सकते, और भारत उनकी हर बात मानने को तैयार नहीं है।
2. रूस की दुविधा: पारंपरिक मित्र और चीन का बढ़ता प्रभाव
भारत और रूस के संबंध दशकों पुराने और बेहद गहरे रहे हैं। रक्षा क्षेत्र से लेकर कूटनीतिक मंचों तक रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है।
* दुविधा क्या है? आज यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण आर्थिक और रणनीतिक रूप से चीन पर अत्यधिक निर्भर हो चुका है। रूस यह जानता है कि यदि वह चीन पर पूरी तरह निर्भर हो गया, तो उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए, रूस के लिए भारत एक ऐसा संतुलनकारी शक्ति (Balancing Power) है, जो उसे बीजिंग के पूरी तरह शिकंजे में फंसने से बचाता है। रूस चाहता है कि भारत वैश्विक मंचों पर उसके साथ खड़ा रहे, लेकिन भारत के पश्चिमी देशों के साथ बढ़ते संबंधों को लेकर भी मास्को में एक अनकही चिंता रहती है।
3. चीन की दुविधा: उभरती एशियाई महाशक्ति और क्षेत्रीय चुनौती
चीन के लिए भारत का आर्थिक, तकनीकी और सैन्य रूप से लगातार मजबूत होना सबसे बड़ी रणनीतिक और भू-राजनीतिक चुनौती है।
* दुविधा क्या है? बीजिंग यह अच्छी तरह जानता है कि एशिया में यदि कोई एक ऐसा देश है जो उसकी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को सीधी टक्कर दे सकता है, तो वह केवल भारत है। चीन सीमा विवाद, पाकिस्तान को प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल करने और हिंद महासागर में बाधाएं डालने की कोशिशें लगातार करता रहता है, फिर भी वह भारत के विशाल बाजार और वैश्विक कूटनीतिक दबाव से पूरी तरह बेपरवाह नहीं हो सकता। भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष-तकनीक ने चीन की नींद उड़ाई हुई है।
निष्कर्ष: भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (Multi-alignment) की कूटनीति
वैश्विक शक्तियों की इस दुविधा के केंद्र में भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (यानी सभी प्रमुख देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर संबंध रखना) की नीति है। भारत अब किसी एक महाशक्ति के दबाव में काम करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह खुद वैश्विक राजनीति का एक 'ध्रुव' बन चुका है।
यही कारण है कि आज दुनिया की हर महाशक्ति भारत के साथ अपने रिश्तों को साधना चाहती है, भले ही उनके मन में भारत की इस स्वतंत्र और अडिग चाल को लेकर एक गहरी रणनीतिक दुविधा क्यों न हो।









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