बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और पीओके के भंवर में फंसा पाकिस्तान: भारत-पाकिस्तान संबंधों के आईने में एक विश्लेषणात्मक लेख
पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर और जटिल दौर से गुजर रहा है। देश की आंतरिक और बाहरी नीतियां एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुकी हैं, जिससे निकलना उसके लिए लगभग असंभव सा प्रतीत होता है। एक तरफ बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) की सुलगती हुई आग है, तो दूसरी तरफ परमाणु हथियारों और मिसाइलों के बावजूद देश की चरमराई अर्थव्यवस्था है। इन सबके बीच, पाकिस्तान की कूटनीति का यह सच भी सामने आया है कि संकट के समय न तो तुर्की काम आया, न चीन और न ही संयुक्त राज्य अमेरिका।
आंतरिक अशांति और भू-राजनीतिक विफलताएं
पाकिस्तान की स्थापना के समय से ही उसकी नीतियां क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने पर आधारित रहीं। लेकिन आज वही नीतियां उसके अपने अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी हैं:
* बलूचिस्तान का असंतोष: क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में लंबे समय से मानवाधिकारों के हनन और संसाधनों के दोहन को लेकर आक्रोश है। बलूच राष्ट्रवादियों का संघर्ष अब उग्र रूप ले चुका है, जिसे दबाने में पाकिस्तानी सेना विफल साबित हो रही है।
* पख्तूनिस्तान और सीमाई तनाव: खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में पख्तून पहचान और अधिकारों की मांग लगातार जोर पकड़ रही है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और अन्य विद्रोही समूहों की गतिविधियों ने इस क्षेत्र को गृहयुद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
* पीओके (PoK) का यथार्थ: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लोग भी अब खुले तौर पर बुनियादी अधिकारों, महंगाई के खिलाफ और पाकिस्तान के दमनकारी रवैये के विरुद्ध सड़कों पर उतर रहे हैं।
सामरिक ताकत बनाम आर्थिक खोखलापन
पाकिस्तान ने दशकों तक अपनी प्राथमिकताओं को ताक पर रखकर केवल सैन्य ताकत बढ़ाने पर जोर दिया। परमाणु बम और आधुनिक मिसाइलें देश की सुरक्षा का ढिंढोरा पीटने के लिए तो ठीक हैं, लेकिन वे भूखे पेट को रोटी और बेरोजगार युवाओं को रोजगार नहीं दे सकतीं।
* मित्र देशों की सीमाएं: पाकिस्तान यह मान बैठा था कि तुर्की, चीन (CPEC के जरिए) या अमेरिका जैसे देश हर संकट में उसे बचा लेंगे। लेकिन भू-राजनीतिक हित हमेशा स्वार्थी होते हैं। चीन का निवेश भी पाकिस्तान के लिए 'डेट ट्रैप' (कर्ज के जाल) से अधिक कुछ साबित नहीं हुआ, और तुर्की या अमेरिका भी केवल अपने सामरिक लाभ के लिए ही सीमित सहयोग करते हैं। जब देश की आंतरिक व्यवस्था ध्वस्त हो रही हो, तो बाहरी मदद भी बेअसर साबित होती है।
भारत के साथ संबंधों का अनसुना अध्याय
इस पूरी त्रासदी का सबसे बड़ा विमर्श यह है कि यदि पाकिस्तान ने अपनी ऊर्जा और संसाधन भारत विरोध में झोंकने के बजाय, क्षेत्र में शांति, विश्वास और भाईचारे को बढ़ावा देने में लगाए होते, तो आज तस्वीर कुछ और ही होती।
* विश्वास और सहयोग का अभाव: यदि विभाजन के बाद या उसके बाद के दशकों में दोनों देशों ने एक-दूसरे पर भरोसा किया होता और कदम से कदम मिलाकर चलते, तो आज दक्षिण एशिया की आर्थिक ताकत दुनिया के नक्शे पर सबसे आगे होती।
* विकास के नए मानक: भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तकनीकी, अंतरिक्ष तथा चिकित्सा के क्षेत्र में नित नए आयाम छू रहा है। यदि पाकिस्तान ने वैमनस्य छोड़कर भारत के साथ आर्थिक सहयोग और मुक्त व्यापार को अपनाया होता, तो आज वहां के नागरिकों को गरीबी, बेरोजगारी और आतंकवाद का सामना न करना पड़ता। दोनों देश मिलकर गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रगति के नए मानक स्थापित कर रहे होते।
निष्कर्ष
आज आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान अपनी विफल नीतियों की आत्म-समीक्षा करे। हथियारों की होड़ और छद्म युद्ध की नीति ने उसे प्रगति के मार्ग से मीलों दूर कर दिया है। क्षेत्र में स्थायी शांति और समृद्धि का एकमात्र मार्ग आपसी संवाद, क्षेत्रीय सहयोग और भारत के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना है। जब तक पाकिस्तान इस यथार्थ को नहीं समझेगा, तब तक वह बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और पीओके जैसी आंतरिक समस्याओं के दलदल से बाहर नहीं निकल पाएगा।









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