एक परजीवी राष्ट्र की त्रासदी: भारत की प्रगति और पाकिस्तान का कृत्रिम अस्तित्व
1. प्रस्तावना: अस्तित्व का संकट और भारत-विरोध की धुरी
विश्व इतिहास में कई राष्ट्रों का उदय और पतन देखा गया है, लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं जिनका पूरा भूगोल, इतिहास और भविष्य केवल किसी अन्य राष्ट्र के विरोध और उसकी सफलताओं से ईर्ष्या की नींव पर खड़ा हुआ है। 1947 में जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से उपमहाद्वीप को मुक्ति मिली, तब भारत ने अपने लिए लोकतंत्र, विज्ञान, आर्थिक स्वावलंबन और बहुलतावादी विकास का कठिन लेकिन उज्ज्वल मार्ग चुना। इसके विपरीत, पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रीय पहचान की आधारशिला 'भारत-विरोध' और संकीर्ण वैचारिक कट्टरता पर रखी।
दशकों बीत चुके हैं, और आज वैश्विक परिदृश्य यह गवाही देता है कि भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक महाशक्ति, अंतरिक्ष विज्ञान के सिरमौर और तकनीकी नवाचार के केंद्र के रूप में तेजी से आगे बढ़ रहा है; वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान एक ऐसे 'परजीवी' (Parasitic) राष्ट्र में बदल चुका है जिसका अस्तित्व केवल बाहरी बैसाखियों और भारत के विरोध की कृत्रिम ऑक्सीजन पर टिका हुआ है।
2. परजीवी राष्ट्र का स्वरूप: बिना भारत-विरोध के पाकिस्तान की राजनीतिक शून्यता
एक सामान्य राष्ट्र अपनी जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और आंतरिक शांति के आधार पर परिभाषित करता है। लेकिन पाकिस्तान का राजनीतिक और सैन्य तंत्र अपनी जनता को देने के लिए इन बुनियादी जरूरतों के बजाय केवल एक ही नैरेटिव पर जीवित रहता है—"भारत से खतरा"।
* आंतरिक विफलताओं से ध्यान भटकाना: जब भी पाकिस्तान में महंगाई आसमान छूती है, आटा-बिजली के लिए दंगे होते हैं, या बलूचिस्तान और पख्तूनिस्तान में सैन्य जुल्म के खिलाफ बगावत फूटती है, तो वहाँ की सत्ता जनता के गुस्से का रुख मोड़ने के लिए तुरंत भारत विरोधी बयानबाजी या छद्म युद्ध का सहारा लेती है।
* सैन्य तंत्र की व्यावसायिकता: पाकिस्तान की सेना ने देश की पूरी अर्थव्यवस्था और संसाधनों को अपने कब्जे में इसलिए रखा है क्योंकि उसे डर है कि यदि भारत के साथ तनाव खत्म हो गया, तो देश की आम जनता सेना से उसके दशकों के भ्रष्टाचार, कुशासन और तख्तापलट का हिसाब मांगने लगेगी। इसलिए, पाकिस्तान का सैन्य-औद्योगिक परिसर भारत के विरोध को ही अपनी आजीविका का एकमात्र साधन मानता है।
3. बाहरी बैसाखियाँ और चीन-पश्चिम एशिया का कृत्रिम संबल
एक परजीवी जीव की तरह, पाकिस्तान कभी भी अपने आंतरिक संसाधनों या उत्पादन के दम पर आत्मनिर्भर नहीं बन पाया। यदि उसे बाहरी ताकतों का पोषण न मिले, तो वह एक सप्ताह भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं रह सकता:
* चीन की 'डेट-ट्रैप' और सामरिक गुलामी: पाकिस्तान ने अपनी संप्रभुता को चीन के हाथों गिरवी रखकर 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे' (CPEC) और भारी-भरकम कर्ज के जरिए अपनी सांसे चला रखी हैं। ग्वादर से लेकर बलूचिस्तान तक चीन द्वारा संसाधनों का दोहन और पाकिस्तान का एक चीनी कॉलोनी बन जाना इस बात का प्रमाण है कि यह राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता का सौदा कर चुका है।
* पश्चिम और मध्य एशिया की दलाली: कभी अमेरिका और पश्चिमी देशों की गोद में बैठकर 'आतंक के खिलाफ युद्ध' के नाम पर डॉलर बटोरने वाला पाकिस्तान, अब तुर्किए और सऊदी अरब जैसे देशों से तात्कालिक कर्ज और रियायती तेल के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को घसीट रहा है।
यदि चीन की आर्थिक बैसाखियाँ और पश्चिम एशिया से मिलने वाली कूटनीतिक-वित्तीय भीख हटा ली जाए, तो पाकिस्तान का ढांचा एक पल में ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा।
4. भारत की प्रगति: पाकिस्तान के जिंदा रहने की एकमात्र कृत्रिम शर्त
भू-राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह अकाट्य सत्य स्वीकार किया जाने लगा है कि "जब तक भारत आगे बढ़ रहा है, पाकिस्तान जीवित है।"
* भारत की निरंतर आर्थिक वृद्धि, अंतरिक्ष में चंद्रयान और गगनयान की सफलताएं, डिजिटल रेवोल्यूशन और वैश्विक कूटनीति में बढ़ता कद पाकिस्तान के शासक वर्ग के लिए भले ही ईर्ष्या का कारण हो, लेकिन विडंबना यह है कि यही भारत की प्रगति ही वह ईंधन है जिसके नाम पर पाकिस्तान की सेना अपनी जनता से चंदा वसूलती है, रक्षा बजट के नाम पर खजाना खाली करती है, और बाहरी देशों से यह कहती है कि "हमें बचाओ, वरना भारत हावी हो जाएगा।"
* यदि कल्पना कीजिए कि किसी दिन भारत अपनी प्रगति रोक दे या वैश्विक मानचित्र से उसकी प्रासंगिकता कम हो जाए, तो पाकिस्तान के पास अपनी पहचान बनाए रखने का कोई दूसरा तर्क ही नहीं बचेगा। उसका पूरा वजूद इस बात पर निर्भर करता है कि वह भारत की हर सफलता के सामने रोना रोता रहे।
5. आंतरिक विखंडन और अपरिहार्य अंत
एक ऐसा देश जो अपनी भलाई के बजाय दूसरों के पतन की कामना करता हो, और अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवाद, ड्रग्स तस्करी और बाहरी महाशक्तियों के प्रॉक्सी युद्ध के लिए करता हो, उसका भविष्य कभी सुरक्षित नहीं हो सकता।
* बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की सुलगती आग: पाकिस्तान के अपने भीतर बलूच राष्ट्रवादियों और पख्तून आवाम का जो आक्रोश उबल रहा है, वह इस बात का संकेत है कि जबरन थोपे गए इस देश का आंतरिक ताना-बाना अब चुक चुका है।
* टीटीपी (TTP) और चरमपंथ का भस्मासुर: जिस आतंकवाद को पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ पाल-पोसकर बड़ा किया था, आज वही तालिबान और टीटीपी रूपी भस्मासुर उसकी अपनी छावनियों को नेस्तनाबूद कर रहा है।
6. निष्कर्ष
पाकिस्तान का वर्तमान और उसका भविष्य एक ऐसे परजीवी का है जो अपनी किसी मौलिक ताकत के बल पर नहीं, बल्कि दूसरों की छाती पर मूंग दलकर और बाहरी ताकतों के टुकड़ों पर पल रहा है।
जब तक भारत अपनी विकास यात्रा पर निरंतर आगे बढ़ता रहेगा, तब तक पाकिस्तान का यह कृत्रिम ढांचा अपनी जनता को झूठे भय दिखाकर किसी तरह सांसें लेता रहेगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि परजीवी कभी अमर नहीं होते। आंतरिक भ्रष्टाचार, बाहरी गुलामी, आतंकवाद के जहर और अंधी भारत-विरोधी सनक के इस दलदल में डूबा पाकिस्तान अपने ही कर्मों के भार से एक दिन अपने स्वाभाविक और अपरिहार्य पतन की ओर निश्चित ही अग्रसर होगा।









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