तथाकथित लोकतांत्रिक शक्तियों का पाखंड: असफल देशों और तानाशाही में रणनीतिक निवेश

 

यह टिप्पणी वैश्विक राजनीति की सबसे कड़वी, नग्न और अकाट्य सच्चाई को उजागर करती है। पश्चिमी जगत और तथाकथित 'विकसित लोकतांत्रिक शक्तियां' (जैसे अमेरिका और यूरोपीय देश) मंचों से भले ही मानवाधिकारों, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की बड़ी-बیں۔ बातें करती हैं, लेकिन उनकी वास्तविक विदेश नीति का इतिहास और वर्तमान इस बात का गवाह है कि उन्हें मजबूत और स्वतंत्र भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले असफल देशों, परजीवी राष्ट्रों और क्रूर तानाशाही व्यवस्थाओं में रणनीतिक निवेश करने में कहीं अधिक रुचि रही है।

इस दोहरे चरित्र और भू-राजनीतिक स्वार्थ के निहितार्थ को स्पष्ट रूप से इन बिंदुओं में देखा जा सकता है:

1. तानाशाही और असफल राष्ट्रों में पश्चिमी निवेश के निहित स्वार्थ

पश्चिमी लोकतंत्रों का यह पुराना चरित्र रहा है कि वे उन देशों में सबसे ज्यादा सहज महसूस करते हैं जहाँ जनता की कोई आवाज नहीं होती या जहाँ सत्ता पर किसी तानाशाह, सैन्य जुंटा या भ्रष्ट शासक का कब्जा होता है:

 * कठपुतली शासकों से आसानी से सौदेबाजी: एक मजबूत और लोकतांत्रिक देश के साथ कूटनीतिक या व्यापारिक समझौते करने के लिए पारदर्शिता, संप्रभुता के प्रति सम्मान और बराबरी के समझौतों की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, पाकिस्तान जैसे असफल राष्ट्रों या म्यांमार जैसे सैन्य तानाशाहों के साथ वे चंद भ्रष्ट जनरलों या शासकों को पैसे और हथियार देकर अपने मनमुताबिक खनिज संसाधनों, बंदरगाहों और रणनीतिक ठکانों के सौदे आसानी से कर लेते हैं।

 * 'नियंत्रित अस्थिरता' का सिद्धांत: पश्चिमी महाशक्तियां कभी नहीं चाहतीं कि दक्षिण एशिया या पश्चिम एशिया के देश पूरी तरह स्थिर और आत्मनिर्भर बन जाएं। यदि ये देश पूरी तरह स्थिर हो गए, तो इन महाशक्तियों का हथियार बाजार और हस्तक्षेप करने का बहाना खत्म हो जाएगा। इसलिए, वे असफल देशों और तानाशाही व्यवस्थाओं को जिंदा रखती हैं ताकि वे अपनी भू-राजनीतिक रोटियां सेक सकें।

2. भारत के प्रति पश्चिमी शक्तियों की दोहरी और शंकालु नीति

जहाँ एक तरफ पश्चिमी देश चीन को काउंटर करने के लिए भारत को अपना 'रणनीतिक साझीदार' बताते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे भारत की स्वतंत्रता और उसकी मजबूत होती आर्थिक-सैन्य ताकत से भीतर ही भीतर भयभीत भी रहते हैं:

 * स्वायत्तता से परेशानी: भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार रूस, पश्चिम एशिया या अन्य देशों से स्वतंत्र संबंध रखने की नीति पश्चिमी ताकतों को चुभती है। वे एक ऐसा भारत चाहते हैं जो उनकी कठपुतली बनकर उनके इशारे पर काम करे, न कि एक विश्वगुरु या स्वतंत्र महाशक्ति के रूप में उभरे।

 * अंदरूनी मामलों में दखल का पाखंड: तथाकथित लोकतांत्रिक शक्तियां अक्सर मानवाधिकार या आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उंगली उठाती हैं, जबकि वे खुद सऊदी अरब जैसे देशों के साथ तेल और हथियारों के अरबों डॉलर के अनुबंध करने में कभी संकोच नहीं करतीं। यह उनका सबसे बड़ा पाखंड है।

3. लोकतंत्र के मुखौटे के पीछे का भू-राजनीतिक बाजार

पश्चिमी देशों के लिए 'लोकतंत्र' और 'मानवाधिकार' केवल कूटनीतिक हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल वे अपने विरोधियों पर दबाव बनाने या अपनी पसंद की सरकारें थोपने के लिए करते हैं। जब बात अपने वास्तविक आर्थिक और सामरिक मुनाफे की आती है, तो वे बिना एक पल गंवाए सबसे क्रूर तानाशाहों और असफल अर्थव्यवस्थाओं के साथ हाथ मिला लेते हैं:

 * पाकिस्तान की सेना को दशकों तक अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देना (यह जानते हुए भी कि वह आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है),

 * मध्य पूर्व के तेल समृद्ध राजतंत्रों (Monarchies) के साथ अटूट व्यापारिक रिश्ते रखना,

 * और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत) की हर स्वतंत्र पहल पर लगातार शक की नजर से देखना।

निष्कर्ष

वैश्विक मंच का यह सच अब छुपा नहीं है कि तथाकथित लोकतांत्रिक शक्तियां केवल दिखावे के लिए लोकतंत्र का राग अलापती हैं, लेकिन उनकी गहरी दिलचस्पी असफल देशों, परजीवी राष्ट्रों और तानाशाही व्यवस्थाओं में रणनीतिक निवेश करने में ही होती है, क्योंकि वहीं उन्हें अपने स्वार्थों को साधने का सबसे आसान अवसर मिलता है। ऐसे में, भारत का अपने दम पर, अपनी संप्रभुता के साथ और अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर आगे बढ़ना ही इन दोहरी नीतियों का एकमात्र और सबसे बड़ा जवाब है।


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