अपने पारंपरिक सहयोगियों के प्रलोभन और भारत-विरोध के बीच फंसा एक असफल राष्ट्र
पाकिस्तान की वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक त्रासदी इस तथ्य का सबसे प्रमाणिक उदाहरण है कि जब कोई राष्ट्र अपनी विदेश नीति और आंतरिक विकास को केवल অন্ধ भारत-विरोध और बाहरी ताकतों के प्रलोभनों पर आधारित कर लेता है, तो उसका पतन तय होता है।
1. पारंपरिक सहयोगियों के प्रलोभन और भू-राजनीतिक जाल
पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने अपनी स्थापना के बाद से ही अपनी संप्रभुता को आत्मनिर्भरता के बजाय बाहरी महाशक्तियों और मित्र देशों के सामरिक प्रलोभनों के सामने गिरवी रख दिया:
* महाशक्तियों का मोहरा: शीत युद्ध के दौर में अमेरिका से मिलने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता हो, या फिर चीन के 'बेल्ट एंड Road' (BRI) और CPEC के नाम पर दिखाया गया विकास का सब्जबाग, पाकिस्तान हमेशा दूसरों के भू-राजनीतिक एजेंडे का मोहरा बनता रहा।
* डेट ट्रैप (कर्ज का जाल): चीन और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मिलने वाले प्रलोभन ने पाकिस्तान को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय एक ऐसा 'भिखारी राष्ट्र' बना दिया है, जो अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी दूसरों की शर्तों पर निर्भर है। पारंपरिक सहयोगियों ने उसे केवल संकट टालने के लिए तात्कालिक राहत दी, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कभी कोई वास्तविक और दीर्घकालिक निवेश नहीं किया।
2. अंधा भारत-विरोध और आंतरिक पतन
पाकिस्तान के शासकों (विशेषकर सैन्य तंत्र) ने अपनी हर आंतरिक विफलता, कुशासन और भ्रष्टाचार से जनता का ध्यान भटकाने के लिए हमेशा 'भारत-विरोध' को अपनी राष्ट्रीय नीति का केंद्रबिंदु बनाए रखा।
* प्राथमिकताओं का भटकाव: जिस देश को शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन और बुनियादी ढांचे पर ध्यान देना चाहिए था, उसने अपनी सारी ऊर्जा और संसाधन भारत के खिलाफ छद्म युद्ध (Proxy War), आतंकवाद को पालने और परमाणु हथियारों की अंधी होड़ में झोंक दिए।
* अपने ही बोझ से दबा राष्ट्र: भारत-विरोधी नीतियों के तहत पाले गए चरमपंथी संगठन (जैसे TTP और अन्य गुट) आज खुद पाकिस्तान के गले की फांस बन चुके हैं। देश का आंतरिक ताना-बाना बिखर चुका है।
3. बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और पीओके का यथार्थ
इसी भारत-केंद्रित और दमनकारी मानसिकता का परिणाम है कि आज पाकिस्तान अपने ही भीतर से खोखला हो चुका है:
* बलूचिस्तान के संसाधन लूटे जाने के कारण वहां खुला विद्रोह है।
* खैबर पख्तूनख्वा में पख्तून जनता और पाकिस्तानी सेना के बीच गृहयुद्ध जैसे हालात हैं।
* पीओके की जनता भी पाकिस्तान के दोहरे चरित्र और आर्थिक शोषण से त्रस्त होकर आज़ादी और अधिकारों की मांग कर रही है।
* अफगानिस्तान और तालिबान भी अब पाकिस्तान की धौंस मानने को तैयार नहीं हैं, जिससे उसकी पश्चिमी सीमाएं भी पूरी तरह असुरक्षित हो चुकी हैं।
निष्कर्ष
पाकिस्तान आज एक ऐसे असफल राष्ट्र (Failed State) के रूप में तब्दील हो चुका है, जो न तो अपने पारंपरिक सहयोगियों के झूठे प्रलोभनों से बाहर निकल पा रहा है और न ही अपनी पुरानी भारत-विरोधी मानसिकता को छोड़ पा रहा है। जब तक वह अपनी इन आत्मघाती नीतियों का त्याग कर क्षेत्रीय सहयोग, आंतरिक सुधार और शांति के मार्ग को नहीं अपनाता, तब तक उसका इस दलदल से उबर पाना असंभव है।









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