दक्षिण एशिया का भविष्य: बाहरी हस्तक्षेप और अलगाववाद के मंडराते खतरे

 

बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (पख्तूनिस्तान) के सुलगते बवंडर के बाद, यदि आने वाले समय में अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों में भी क्षेत्रीय विखंडन, गृहयुद्ध या अलगाववाद के बीज बोए जाते हैं, तो इसके लिए चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों की अवसरवादी और आक्रामक भू-राजनीति प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होगी।

यह क्षेत्र पहले से ही आंतरिक कुशासन और आर्थिक संकटों से जूझ रहा है, और जब इसमें महाशक्तियों का हस्तक्षेप जुड़ जाता है, तो पूरा उपमहाद्वीप भयंकर अस्थिरता की चपेट में आ जाता है।

1. अफगानिस्तान: महाशक्तियों के छद्म युद्ध का अंतहीन शिकार

 * ऐतिहासिक हस्तक्षेप: शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका द्वारा मुजाहिदीन को पालने और फिर बाद में 'आतंक के खिलाफ युद्ध' के नाम पर दो दशकों तक देश को तबाह करने का खामियाजा आज पूरा अफगानिस्तान भुगत रहा है।

 * चीन की नजरें: अब जब अमेरिकी सेनाएँ जा चुकी हैं, तो चीन की नजरें अफगानिस्तान के विशाल दुर्लभ खनिज भंडारों (Lithium and Rare Earth Elements) पर टिकी हैं। चीन तालिबान शासन को आर्थिक मदद का लालच देकर देश को अपने 'डेट ट्रैप' में फंसा रहा है। यदि यह आर्थिक और सामरिक दोहन जारी रहा, तो अफगानिस्तान के भीतर विभिन्न जातीय समूहों (ताजिक, उज्बेक, हजारा) के बीच अलगाववाद और गृहयुद्ध की आग और अधिक भड़क सकती है, जिसका मुख्य कारण चीन का स्वार्थी निवेश होगा।

2. श्रीलंका: हिंद महासागर में महाशक्तियों का अखाड़ा

 * कर्ज का जाल और रणनीतिक कब्जा: श्रीलंका को दिवालिया बनाने में चीन की 'डेट-ट्रैप कूटनीति' (जैसे हंबनटोटा बंदरगाह का अधिग्रहण) की बहुत बड़ी भूमिका रही है।

 * भू-राजनीतिक दबाव: हिंद महासागर के सामरिक केंद्र में स्थित होने के कारण अमेरिका, पश्चिमी देश और चीन लगातार श्रीलंका की राजनीति और नीतियों को अपने पाले में करने के लिए दबाव बनाते रहते हैं। यदि बाहरी ताकतें वहां के आंतरिक राजनीतिक और जातीय तनाव (सिंहली और तमिल समुदायों के बीच) का फायदा उठाकर हस्तक्षेप करती हैं, तो देश में एक बार फिर अलगाववाद या आंतरिक संघर्ष के बीज अंकुरित हो सकते हैं।

3. बांग्लादेश: बाहरी ताकतों के भू-राजनीतिक खेल का नया केंद्र

 * सत्ता परिवर्तन और अस्थिरता: बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता परिवर्तन के पीछे विभिन्न वैश्विक ताकतों की खुफिया और रणनीतिक गतिविधियों की चर्चाएँ आम रही हैं।

 * अखंडता पर खतरा: बंगाल की खाड़ी के पास स्थित होने के कारण बांग्लादेश महाशक्तियों (विशेषकर अमेरिका और चीन) के बीच वर्चस्व की लड़ाई का नया मैदान बनता जा रहा है। यदि बाहरी ताकतें अपने सामरिक हितों के लिए वहां की घरेलू राजनीति, कट्टरपंथी तत्वों या क्षेत्रीय अल्पसंख्यकों को हवा देती हैं, तो देश की आंतरिक स्थिरता और क्षेत्रीय अखंडता खतरे में पड़ सकती है, जिससे नए अलगाववादी या चरमपंथी स्वर उभर सकते हैं।

4. म्यांमार: जातीय संघर्ष और महाशक्तियों का परोक्ष युद्ध

 * गृहयुद्ध के हालात: म्यांमार की सेना (जुंटा) और विभिन्न जातीय सशस्त्र संगठनों (Ethnic Armed Organizations) के बीच चल रहे खूनी संघर्ष ने देश को लगभग विघटन के कगार पर ला खड़ा किया है।

 * चीन और अमेरिका की भूमिका: चीन म्यांमार के रास्ते हिंद महासागर तक अपनी सीधी पहुँच (Kyaukphyu Port) बनाने के लिए जुंटा सरकार को खुला समर्थन दे रहा है, जबकि पश्चिमी देश और अमेरिका लोकतंत्र समर्थक ताकतों और विद्रोही समूहों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। म्यांमार की भूमि पर इन दो महाशक्तियों की खींचतान देश को कई टुकड़ों में बांटने (अलगाववाद) की ओर ले जा रही है।

निष्कर्ष

यह अकाट्य सत्य है कि यदि आने वाले समय में अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश या म्यांमार जैसी रियासतें और देश आंतरिक अलगाववाद, क्षेत्रीय विखंडन या गृहयुद्ध की आग में जलते हैं, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी चीन और अमेरिका जैसी उन महाशक्तियों की होगी जिन्होंने स्थानीय जनता के कल्याण या क्षेत्रीय शांति को ताक पर रखकर केवल अपने भू-राजनीतिक वर्चस्व और संसाधनों की लूट को प्राथमिकता दी है। जब-जब बाहरी ताकतें किसी क्षेत्र में अपनी रोटियां सेकने के लिए हस्तक्षेप करती हैं, तब-तब उस क्षेत्र के राष्ट्र आंतरिक रूप से टूटने और बिखरने लगते हैं।


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