अमेरिका–ईरान और अमेरिका–अफगानिस्तान : मोहरा बस पाकिस्तान
पाकिस्तान की विदेश नीति के इतिहास में दो घटनाएँ विशेष महत्व रखती हैं। पहली, अमेरिका और तालिबान के बीच हुआ अफगानिस्तान शांति समझौता, जिसे सामान्यतः "दोहा समझौता" कहा जाता है। दूसरी, 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता तथा संघर्षविराम स्थापित करने के प्रयास, जिनमें पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा किया।
इन दोनों घटनाओं में पाकिस्तान स्वयं को एक अनिवार्य कूटनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहा। इस्लामाबाद ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि दक्षिण और पश्चिम एशिया में कोई भी बड़ा समझौता उसकी भागीदारी के बिना संभव नहीं है। किंतु प्रश्न यह है कि इन प्रयासों से पाकिस्तान को वास्तव में क्या मिला? क्या वह क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरा या केवल महाशक्तियों के बीच संदेशवाहक बनकर रह गया?
अफगानिस्तान : पाकिस्तान की सबसे बड़ी रणनीतिक परियोजना
अफगानिस्तान पाकिस्तान की विदेश नीति का केंद्र रहा है। पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक सोच में यह धारणा लंबे समय तक प्रभावी रही कि पश्चिमी सीमा पर एक मित्रवत अफगानिस्तान उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
1980 के दशक में सोवियत संघ के विरुद्ध युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका का प्रमुख सहयोगी बना। अरबों डॉलर की सहायता पाकिस्तान पहुँची और अफगान मुजाहिदीनों को समर्थन देने में उसकी केंद्रीय भूमिका रही।
बाद में तालिबान के उदय में भी पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण कारक माना गया। इसलिए जब अमेरिका ने अफगानिस्तान से निकलने का रास्ता खोजा तो पाकिस्तान की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो गई।
दोहा समझौते तक पहुँचने में पाकिस्तान
2020 के अमेरिका–तालिबान समझौते तक पहुँचने की प्रक्रिया में पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अमेरिका लंबे समय से तालिबान नेतृत्व तक पहुँच बनाना चाहता था। पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में था जिसके पास तालिबान नेतृत्व के साथ संवाद के चैनल मौजूद थे।
कई विश्लेषकों का मानना है कि तालिबान नेताओं को वार्ता की मेज तक लाने, कैदियों की रिहाई तथा संवाद को आगे बढ़ाने में पाकिस्तान की भूमिका निर्णायक रही।
इस कारण वाशिंगटन में पाकिस्तान की उपयोगिता फिर बढ़ गई। एक समय जो देश आतंकवाद को लेकर आलोचना झेल रहा था, वही अमेरिका के लिए समाधान का हिस्सा बन गया।
पाकिस्तान ने क्या सोचा था?
पाकिस्तान के रणनीतिक समुदाय को विश्वास था कि अमेरिकी वापसी के बाद अफगानिस्तान में ऐसी सरकार बनेगी जो इस्लामाबाद के हितों के अनुरूप होगी।
यह भी माना गया कि भारत का प्रभाव कम होगा और पाकिस्तान को "रणनीतिक गहराई" प्राप्त होगी।
तालिबान की सत्ता वापसी को पाकिस्तान के भीतर अनेक लोगों ने अपनी कूटनीतिक विजय के रूप में प्रस्तुत किया।
लेकिन इतिहास ने अलग दिशा ली।
जीत जो संकट में बदल गई
तालिबान सत्ता में तो लौट आए, लेकिन वे पाकिस्तान की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चले।
सबसे बड़ा विवाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को लेकर सामने आया।
पाकिस्तान का आरोप रहा कि टीटीपी के लड़ाके अफगान क्षेत्र का उपयोग पाकिस्तान में हमलों के लिए कर रहे हैं।
अफगान तालिबान और पाकिस्तान के बीच संबंध तेजी से तनावपूर्ण होते गए।
सीमा पर झड़पें बढ़ीं।
डूरंड रेखा का विवाद पुनः उभर आया।
जिस तालिबान को पाकिस्तान कभी रणनीतिक संपत्ति समझता था, वही उसके लिए सुरक्षा चुनौती बन गया।
अमेरिका को क्या मिला?
अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलने का अवसर मिला।
दो दशकों से अधिक समय तक चलने वाला युद्ध समाप्त हुआ।
अमेरिकी सैनिक वापस लौटे।
लेकिन अफगानिस्तान में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी।
इसलिए कुछ आलोचक मानते हैं कि दोहा समझौते ने युद्ध समाप्त किया, पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया।
पाकिस्तान की वास्तविक उपलब्धि
यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने अमेरिका और तालिबान के बीच संवाद स्थापित कराया।
लेकिन वह उस राजनीतिक व्यवस्था को नियंत्रित नहीं कर सका जो बाद में बनी।
अर्थात् उसने समझौते तक पहुँचने में भूमिका निभाई, पर परिणामों को अपने अनुसार नहीं ढाल सका।
अमेरिका–ईरान वार्ता और पाकिस्तान
2026 में पाकिस्तान को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर महत्व मिला जब वह अमेरिका और ईरान के बीच संवाद प्रक्रिया में शामिल हुआ।
कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच संदेश पहुँचाने, संघर्षविराम की संभावनाओं पर चर्चा कराने और वार्ता का मंच उपलब्ध कराने में सक्रिय भूमिका निभाई।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते में पाकिस्तान गवाह और मध्यस्थ के रूप में उपस्थित था।
पाकिस्तान को यह भूमिका क्यों मिली?
इसके पीछे कई कारण थे।
पहला, पाकिस्तान के अमेरिका और ईरान दोनों से संबंध थे।
दूसरा, ईरान से उसकी सीमा लगती है।
तीसरा, पश्चिम एशिया में युद्ध का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव पाकिस्तान पर पड़ सकता था।
तेल की कीमतें बढ़तीं, व्यापार बाधित होता और क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रभाव पाकिस्तान पर पड़ता।
इसलिए पाकिस्तान के लिए मध्यस्थता केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं थी बल्कि राष्ट्रीय हित का विषय भी थी।
क्या पाकिस्तान वास्तव में निर्णायक मध्यस्थ था?
यहीं से बहस शुरू होती है।
कई विशेषज्ञ पाकिस्तान को महत्वपूर्ण मध्यस्थ मानते हैं। उनका तर्क है कि उसने दोनों पक्षों के बीच संपर्क स्थापित किया और वार्ता को आगे बढ़ाया।
लेकिन दूसरी ओर कई विश्लेषकों का मानना है कि अंतिम सफलता में कतर और अन्य क्षेत्रीय देशों की भूमिका अधिक प्रभावशाली थी। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि पाकिस्तान ने मंच तैयार किया, लेकिन निर्णायक समझौते तक पहुँचाने में कतर अधिक प्रभावी साबित हुआ।
यानी पाकिस्तान महत्वपूर्ण था, पर अकेला नहीं।
पाकिस्तान की अपेक्षाएँ
इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि इस मध्यस्थता से उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरेगी।
वह स्वयं को केवल सुरक्षा समस्याओं से जुड़े देश के रूप में नहीं बल्कि समाधान प्रस्तुत करने वाले देश के रूप में दिखाना चाहता था।
साथ ही उसे यह आशा थी कि अमेरिका के साथ उसके संबंध मजबूत होंगे और आर्थिक सहयोग के नए अवसर खुलेंगे।
क्या अमेरिका–ईरान समझौते से पाकिस्तान को लाभ मिला?
प्रतिष्ठा के स्तर पर अवश्य।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में चर्चा मिली।
उसकी कूटनीतिक सक्रियता की सराहना हुई।
लेकिन आर्थिक और रणनीतिक लाभ अभी भी सीमित दिखाई देते हैं।
जैसा कि कई विश्लेषकों ने संकेत किया है, मध्यस्थता की सफलता और राष्ट्रीय शक्ति की सफलता अलग-अलग बातें हैं।
दोनों समझौतों की तुलना
अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका अधिक गहरी और दीर्घकालिक थी।
वहाँ उसके दशकों पुराने संबंध, सुरक्षा हित और रणनीतिक निवेश जुड़े हुए थे।
ईरान के मामले में उसकी भूमिका मुख्यतः मध्यस्थ और संवाद-सुविधाकर्ता की थी।
लेकिन दोनों मामलों में एक समानता दिखाई देती है—
पाकिस्तान ने वार्ता की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, किंतु अंतिम परिणामों पर उसका नियंत्रण सीमित रहा।
अफगानिस्तान में तालिबान उसके अनुसार नहीं चले।
ईरान के मामले में भी अंतिम शक्ति अमेरिका, ईरान और अन्य प्रमुख क्षेत्रीय खिलाड़ियों के हाथों में रही।
निष्कर्ष
अमेरिका–तालिबान समझौता और अमेरिका–ईरान वार्ता, दोनों ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अस्थायी महत्व प्रदान किया। उसने स्वयं को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया जो विरोधी पक्षों को वार्ता की मेज तक ला सकता है।
किन्तु इन दोनों घटनाओं का सबसे बड़ा सबक यह है कि मध्यस्थता और शक्ति में अंतर होता है। पाकिस्तान कई बार वार्ता का पुल बना, लेकिन पुल बनने और मंजिल तय करने में बड़ा अंतर है।
अफगानिस्तान में उसने अमेरिका और तालिबान को बातचीत की मेज तक पहुँचाया, पर आज वही अफगानिस्तान उसके लिए सुरक्षा संकट बना हुआ है। ईरान के मामले में उसने अमेरिका और तेहरान के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया, पर इससे उसकी आर्थिक और सामरिक समस्याएँ स्वतः समाप्त नहीं हुईं।
इसलिए पाकिस्तान की कहानी केवल कूटनीतिक सफलता की नहीं, बल्कि उस विडंबना की भी कहानी है जिसमें कोई देश महाशक्तियों के बीच समझौते कराने में सक्षम तो हो जाता है, पर स्वयं अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में संघर्ष करता रहता है।









टिप्पणियाँ