इंजीनियर से अफसर तक: क्या यूपीएससी भारत की तकनीकी प्रतिभा का कब्रिस्तान

भारत हर वर्ष लाखों इंजीनियर तैयार करता है। केंद्र और राज्य सरकारें तकनीकी शिक्षा पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करती हैं। Indian Institutes of Technology, National Institutes of Technology, सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों और तकनीकी विश्वविद्यालयों पर जनता का धन इसलिए लगाया जाता है कि देश को वैज्ञानिक, शोधकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ, डिज़ाइनर और नवोन्मेषी उद्योगपति मिल सकें। लेकिन विडंबना देखिए कि इस भारी निवेश का बड़ा हिस्सा अंततः यूपीएससी की कोचिंग मंडियों में जाकर समाप्त हो जाता है। आज सिविल सेवा परीक्षा के सफल अभ्यर्थियों की सूची उठाकर देखिए। उसमें इंजीनियरों की भरमार दिखाई देगी। पहली नजर में यह उनकी प्रतिभा का प्रमाण लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह भारतीय अर्थव्यवस्था और शिक्षा नीति की एक गंभीर विफलता का दस्तावेज बन जाता है। इंजीनियरिंग पढ़ो, प्रशासन करो देश एक छात्र को इंजीनियर बनाने में वर्षों की मेहनत और लाखों रुपये खर्च करता है। परिवार अपनी जमा-पूंजी लगा देता है। सरकार सब्सिडी देती है। संस्थान प्रयोगशालाएं बनाते हैं। शिक्षक तकनीकी प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन डिग्री हाथ में आते ही वही छात्र पुल बनाने, मशीन डिजाइन करने, चिप विकसित करने, ऊर्जा प्रौद्योगिकी सुधारने या औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के बजाय इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान और निबंध की तैयारी में जुट जाता है। यह ऐसा ही है जैसे कोई देश डॉक्टर तैयार करे और वे सभी न्यायाधीश बनने निकल पड़ें। प्रश्न यह नहीं है कि इंजीनियर प्रशासन में क्यों जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि वे अपनी मूल विशेषज्ञता में क्यों नहीं रह पा रहे हैं। यह सफलता नहीं, व्यवस्था की असफलता है यूपीएससी में इंजीनियरों की बढ़ती सफलता को अक्सर उनकी बौद्धिक श्रेष्ठता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वास्तव में यह भारतीय रोजगार व्यवस्था की कमजोरी का भी संकेत है। यदि तकनीकी क्षेत्र पर्याप्त अवसर दे रहा होता, यदि अनुसंधान संस्थानों में आकर्षक करियर होते, यदि विनिर्माण क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा होता, यदि नवाचार को प्रोत्साहन मिलता, तो क्या देश के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी छात्र प्रशासनिक सेवाओं की कतार में खड़े दिखाई देते? किसी भी विकसित देश में इंजीनियर बनने वाला युवा अपनी विशेषज्ञता को छोड़कर सरकारी प्रशासनिक नौकरी पाने के लिए पांच-पांच वर्ष नहीं लगाता। वहां तकनीकी प्रतिभा का मूल्य बाजार और समाज दोनों समझते हैं। भारत में स्थिति उलट है। यहां इंजीनियरिंग कई बार केवल यूपीएससी की तैयारी से पहले का एक पड़ाव बनकर रह गई है। क्या यूपीएससी का पैटर्न भी जिम्मेदार है? यूपीएससी का वर्तमान स्वरूप विश्लेषणात्मक क्षमता, तथ्यों की समझ और उत्तर लेखन को पुरस्कृत करता है। इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले छात्र स्वाभाविक रूप से इस ढांचे में बेहतर प्रदर्शन कर लेते हैं। परंतु इसका दूसरा पहलू भी है। परीक्षा उस विशेषज्ञता का परीक्षण नहीं करती जिसके लिए समाज ने वर्षों तक संसाधन लगाए थे। एक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर, मैकेनिकल इंजीनियर या कंप्यूटर वैज्ञानिक अंततः उसी प्रश्नपत्र पर आ जाता है जिस पर बाकी सभी अभ्यर्थी हैं। उसकी तकनीकी दक्षता का बड़ा हिस्सा अप्रासंगिक हो जाता है। अर्थात देश जिस कौशल के विकास पर निवेश करता है, चयन प्रक्रिया उसे महत्व ही नहीं देती। प्रतिभा का पलायन नहीं, प्रतिभा का विचलन भारत में अक्सर "ब्रेन ड्रेन" की चर्चा होती है, लेकिन उससे बड़ा संकट "ब्रेन डायवर्जन" है। प्रतिभा विदेश नहीं जा रही, बल्कि अपने मूल क्षेत्र से भटक रही है। एक उत्कृष्ट इंजीनियर प्रशासनिक अधिकारी बन रहा है। एक वैज्ञानिक बैंक अधिकारी बन रहा है। एक शोधकर्ता प्रतियोगी परीक्षाओं का अभ्यर्थी बन रहा है। इससे व्यक्ति को लाभ हो सकता है, लेकिन राष्ट्र को हमेशा लाभ नहीं होता। देश को जितने सक्षम प्रशासकों की आवश्यकता है, उतनी ही आवश्यकता वैज्ञानिकों, अभियंताओं और तकनीकी उद्यमियों की भी है। यदि सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा लगातार प्रशासन की ओर बहती रहेगी तो उत्पादन, अनुसंधान और नवाचार की कीमत पर ही ऐसा होगा। सरकारी निवेश का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि तकनीकी शिक्षा पर होने वाले सार्वजनिक निवेश का प्रतिफल आखिर क्या है? जब एक सरकारी तकनीकी संस्थान से निकला छात्र इंजीनियरिंग क्षेत्र में योगदान देने के बजाय पूरी तरह किसी अन्य क्षेत्र में चला जाता है, तो उस निवेश के उद्देश्य पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है। प्रत्येक नागरिक को अपना करियर चुनने का पूरा अधिकार है। लेकिन नीति-निर्माताओं को यह अवश्य सोचना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियां क्यों बन रही हैं जिनमें तकनीकी विशेषज्ञ अपने ही क्षेत्र में भविष्य नहीं देख पा रहे। निष्कर्ष यूपीएससी में इंजीनियरों की बढ़ती सफलता केवल उनकी प्रतिभा की कहानी नहीं है। यह उस विरोधाभास की कहानी है जिसमें एक विकासशील राष्ट्र तकनीकी शिक्षा पर विशाल धनराशि खर्च करता है, लेकिन उसी तकनीकी प्रतिभा को उसके मूल क्षेत्र में रोक पाने में असफल रहता है। जब इंजीनियरिंग कॉलेज प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रतीक्षालय बनने लगें, जब प्रयोगशालाएं कोचिंग नोट्स के सामने हार मानने लगें, और जब तकनीकी विशेषज्ञता का सर्वोच्च उपयोग फाइल प्रबंधन में दिखाई देने लगे, तब समस्या केवल रोजगार की नहीं रहती; वह राष्ट्रीय विकास मॉडल पर प्रश्नचिह्न बन जाती है। भारत को अधिक प्रशासकों की आवश्यकता अवश्य है, पर उससे कहीं अधिक आवश्यकता उन इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की है जो राष्ट्र की उत्पादन क्षमता, अनुसंधान शक्ति और तकनीकी आत्मनिर्भरता का निर्माण कर सकें। अन्यथा हम डिग्रियां तो इंजीनियरिंग की बांटते रहेंगे, लेकिन तैयार अंततः प्रशासक ही करते रहेंगे।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट