पाकिस्तान मध्यस्थ, साझेदार या रणनीतिक लाभार्थी?

अमेरिका का एशियाई युद्ध बाज़ार और पाकिस्तान की भू-राजनीतिक प्रासंगिकता संकटों के बीच उभरती भूमिका : मध्यस्थ, साझेदार या रणनीतिक लाभार्थी? America's Asian Conflict Architecture and Pakistan's Geopolitical Relevance
विश्व राजनीति में कुछ देशों की शक्ति उनकी अर्थव्यवस्था, तकनीक या सैन्य क्षमता से निर्धारित होती है, जबकि कुछ देशों की उपयोगिता उनके भूगोल से तय होती है। पाकिस्तान दूसरे प्रकार का राष्ट्र है। पिछले सात दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी पूंजी उसका भौगोलिक स्थान रहा है। शीत युद्ध से लेकर अफगान जिहाद, आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिकी अभियान और आज के ईरान-अमेरिका तनाव तक पाकिस्तान बार-बार वैश्विक शक्ति संघर्षों के केंद्र में दिखाई देता है। प्रश्न यह है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में क्षेत्रीय स्थिरता का कारक है या फिर वह संकटों को अपनी रणनीतिक प्रासंगिकता बढ़ाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करता रहा है? भूगोल से निर्मित शक्ति पाकिस्तान का भूगोल उसे एक विशिष्ट सामरिक महत्व प्रदान करता है। पश्चिम में ईरान, उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान, उत्तर में चीन और दक्षिण में अरब सागर से जुड़ा यह देश एशिया के कई महत्वपूर्ण शक्ति केंद्रों के बीच स्थित है। यही स्थिति उसे बार-बार महाशक्तियों की रणनीतियों में महत्वपूर्ण बनाती है। जब भी एशिया में कोई बड़ा संकट उत्पन्न होता है, पाकिस्तान अचानक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का आवश्यक हिस्सा बन जाता है। शीत युद्ध और अमेरिकी गठबंधन 1950 और 1960 के दशक में पाकिस्तान ने स्वयं को अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बना लिया। SEATO और CENTO जैसे गठबंधनों में शामिल होकर उसने सोवियत प्रभाव को रोकने वाली अमेरिकी रणनीति में स्थान प्राप्त किया। इसके बदले उसे सैन्य सहायता, आर्थिक सहयोग और राजनीतिक समर्थन मिला। पाकिस्तान की सेना का संस्थागत विस्तार इसी दौर में हुआ। इस प्रकार शीत युद्ध ने पाकिस्तान को केवल सुरक्षा सहयोगी ही नहीं बनाया, बल्कि उसे क्षेत्रीय महत्व भी प्रदान किया। अफगान जिहाद : भू-राजनीतिक अवसर का स्वर्णकाल 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान प्रवेश ने पाकिस्तान के रणनीतिक महत्व को कई गुना बढ़ा दिया। अमेरिका, सऊदी अरब और पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान को सोवियत विरोधी अभियान का मुख्य आधार बनाया। अरबों डॉलर की सहायता, हथियार और प्रशिक्षण कार्यक्रम इस्लामाबाद तक पहुंचे। यह वह दौर था जब पाकिस्तान ने पहली बार यह समझा कि उसकी भौगोलिक स्थिति स्वयं एक राजनीतिक और आर्थिक संसाधन है। आलोचक इसे पाकिस्तान की "भू-राजनीतिक किराएदारी" (Geopolitical Rent-Seeking) की शुरुआत मानते हैं। आतंकवाद विरोधी युद्ध और नई प्रासंगिकता 11 सितंबर 2001 के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान शुरू किया। एक बार फिर पाकिस्तान फ्रंटलाइन सहयोगी बन गया। वॉशिंगटन को अफगानिस्तान में अभियानों के लिए पाकिस्तान की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप अरबों डॉलर की सहायता और सैन्य सहयोग का नया दौर शुरू हुआ। हालांकि इस अवधि में अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में अविश्वास भी बढ़ा, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी सामरिक उपयोगिता बनाए रखने में सफल रहा। ईरान संकट और नई मध्यस्थता आज अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान को एक बार फिर कूटनीतिक अवसर प्रदान किया है। इस्लामाबाद स्वयं को मध्यस्थ, संवादकर्ता और संपर्क सेतु के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हाल के महीनों में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद को सुगम बनाने का प्रयास किया है। यही कारण है कि कुछ विश्लेषक पाकिस्तान को शांति का मध्यस्थ मानते हैं, जबकि अन्य इसे संकट से लाभ उठाने की रणनीति के रूप में देखते हैं। चीन, अमेरिका और पाकिस्तान त्रिकोण पाकिस्तान की वर्तमान रणनीति केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और बीजिंग के साथ बढ़ती सामरिक निकटता ने पाकिस्तान को चीन की क्षेत्रीय रणनीति का भी महत्वपूर्ण भाग बना दिया है। दिलचस्प तथ्य यह है कि पाकिस्तान आज एक साथ चीन के निकट भी है और अमेरिका के लिए उपयोगी भी बना रहना चाहता है। यही संतुलन उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है। क्या पाकिस्तान केवल अवसरवादी है? यह कहना आसान होगा कि पाकिस्तान केवल संकटों से लाभ कमाता है। लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अधिकांश देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार कार्य करते हैं। अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय शक्तियां भी ऐसा ही करती हैं। अंतर केवल इतना है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित होने के कारण उसकी रणनीति अक्सर सुरक्षा और भूगोल पर अधिक निर्भर दिखाई देती है। भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ भारत के लिए पाकिस्तान की यह भूमिका कई प्रश्न खड़े करती है। एक ओर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का प्रयास करता है, वहीं दूसरी ओर भारत अपनी वैश्विक स्थिति आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और कूटनीतिक विस्तार के आधार पर मजबूत कर रहा है। इस प्रकार दोनों देशों के वैश्विक महत्व के मॉडल अलग-अलग हैं। जहाँ पाकिस्तान संकटों के बीच अपनी उपयोगिता खोजता है, वहीं भारत स्थिरता, विकास और बहुध्रुवीय सहयोग के आधार पर अपनी भूमिका निर्मित करने का प्रयास करता है। निष्कर्ष : प्रासंगिकता की राजनीति पाकिस्तान का इतिहास यह दर्शाता है कि उसने अपनी भौगोलिक स्थिति को केवल सुरक्षा चुनौती के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे रणनीतिक अवसर में बदलने का प्रयास भी किया। शीत युद्ध, अफगान जिहाद, आतंकवाद विरोधी युद्ध और वर्तमान ईरान-अमेरिका तनाव—सभी ने पाकिस्तान को समय-समय पर वैश्विक राजनीति के केंद्र में पहुंचाया है। लेकिन बदलती विश्व व्यवस्था में प्रश्न यह है कि क्या केवल भूगोल किसी राष्ट्र की स्थायी शक्ति का आधार बन सकता है? 21वीं सदी में तकनीक, अर्थव्यवस्था और नवाचार शक्ति के नए स्रोत बन चुके हैं। ऐसे में पाकिस्तान के सामने चुनौती केवल अपनी रणनीतिक उपयोगिता बनाए रखने की नहीं, बल्कि उसे स्थायी राष्ट्रीय शक्ति में बदलने की भी है। यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में पाकिस्तान की भू-राजनीतिक प्रासंगिकता का वास्तविक परीक्षण करेगा।

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