आत्मनिर्भरता के दबाव में मंद हुई है भारत की सैन्य प्रगति क्या स्वदेशीकरण की नीति ने सुरक्षा तैयारियों की रफ्तार धीमी कर दी है?

 

भारत आज दो समानांतर लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है। पहला लक्ष्य है—देश की सीमाओं की रक्षा के लिए सशस्त्र सेनाओं को शीघ्रातिशीघ्र आधुनिक हथियार उपलब्ध कराना। दूसरा लक्ष्य है—रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनकर विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना। दोनों लक्ष्य अपने-अपने स्थान पर उचित हैं, किंतु जब इन दोनों के बीच संतुलन बिगड़ता है, तब प्रश्न उठता है कि क्या आत्मनिर्भरता के दबाव में भारत की सैन्य प्रगति की गति मंद पड़ गई है?

यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और विदेश नीति से जुड़ा हुआ है। भारत विश्व के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में रहा है। दशकों तक सेना की आवश्यकताएँ रूस, फ्रांस, अमेरिका, इज़राइल और अन्य देशों से पूरी होती रहीं। इससे सेना को आधुनिक हथियार तो मिले, लेकिन देश में रक्षा उद्योग अपेक्षित गति से विकसित नहीं हो पाया।

2014 के बाद "मेक इन इंडिया" और बाद में "आत्मनिर्भर भारत" के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को नीति का प्रमुख आधार बनाया गया। रक्षा आयात की नकारात्मक सूची बनाई गई, रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा घरेलू खरीद के लिए आरक्षित किया गया, निजी क्षेत्र और स्टार्टअप को प्रोत्साहन मिला तथा रक्षा निर्यात बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। इन प्रयासों से कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी मिली हैं, लेकिन साथ ही कई गंभीर चुनौतियाँ सामने आई हैं।

आत्मनिर्भरता की आवश्यकता क्यों?

रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि युद्ध के समय वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ बाधित हो सकती हैं। यदि किसी देश की सेना पूरी तरह विदेशी हथियारों पर निर्भर हो, तो संकट के समय उसे स्पेयर पार्ट्स, गोला-बारूद और रखरखाव में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत ने 1965, 1971 और विशेषकर 1999 के कारगिल युद्ध से यह सीखा कि युद्ध केवल सैनिकों के साहस से नहीं, बल्कि निरंतर सैन्य आपूर्ति और औद्योगिक क्षमता से भी जीते जाते हैं। इसलिए दीर्घकाल में आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है।

लेकिन समस्या कहाँ है?

समस्या तब उत्पन्न होती है जब स्वदेशी विकल्प अभी पूर्णतः विकसित नहीं हुए हों, फिर भी विदेशी खरीद में अनावश्यक देरी होने लगे। सेना की आवश्यकताएँ तत्काल होती हैं, जबकि रक्षा अनुसंधान और उत्पादन में वर्षों लगते हैं। यदि दोनों के बीच समन्वय न हो, तो सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।

उदाहरण के लिए, लड़ाकू विमानों की संख्या लंबे समय से भारतीय वायुसेना की स्वीकृत क्षमता से कम बनी हुई है। स्वदेशी प्रयास जारी हैं, लेकिन नई प्रणालियों के विकास, परीक्षण और बड़े पैमाने पर उत्पादन में समय लगता है। इसी प्रकार पनडुब्बियों, उन्नत इंजन, लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणालियों और कुछ अत्याधुनिक सेंसरों के क्षेत्र में भी भारत अभी विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भर है।

अनुसंधान एवं विकास की चुनौती

किसी भी विकसित रक्षा उद्योग की नींव अनुसंधान एवं विकास (R&D) होती है। भारत में इस क्षेत्र में प्रगति हुई है, परंतु वैश्विक प्रतिस्पर्धा की तुलना में निवेश और निजी भागीदारी अभी भी सीमित है।

रक्षा अनुसंधान में सफलता केवल धन से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पारिस्थितिकी, उद्योग, विश्वविद्यालयों और सेना के बीच घनिष्ठ सहयोग से मिलती है। अमेरिका, चीन और यूरोप ने दशकों तक निरंतर निवेश कर अपनी तकनीकी बढ़त बनाई है। भारत इस दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

क्या रक्षा खरीद प्रक्रिया भी जिम्मेदार है?

रक्षा खरीद प्रणाली वर्षों से धीमी और जटिल रही है। अनेक परियोजनाएँ फाइलों, परीक्षणों, पुनर्मूल्यांकन और प्रक्रियागत देरी में फँस जाती हैं। परिणामस्वरूप, हथियारों की आवश्यकता और उनकी उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर पैदा हो जाता है।

यदि आत्मनिर्भरता की नीति के साथ प्रक्रियाओं का सरलीकरण न हो, तो स्वदेशीकरण का उद्देश्य भी प्रभावित होता है और सेना की तैयारी भी।

निजी क्षेत्र की भूमिका

भारत में लंबे समय तक रक्षा उत्पादन मुख्यतः सरकारी उपक्रमों तक सीमित रहा। अब निजी कंपनियाँ, स्टार्टअप और MSME भी रक्षा उत्पादन में प्रवेश कर रहे हैं। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य समाधान और रक्षा सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र उल्लेखनीय योगदान दे रहा है।

यदि इन्हें समान अवसर, दीर्घकालिक अनुबंध और अनुसंधान सहायता मिले, तो भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता अधिक तेज़ी से आगे बढ़ सकती है।

क्या उपलब्धियाँ नहीं हुई हैं?

यह कहना उचित नहीं होगा कि आत्मनिर्भरता की नीति केवल बाधा बनी है। भारत ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हासिल की हैं—

स्वदेशी युद्धपोतों का निर्माण।

आधुनिक मिसाइल कार्यक्रमों में उल्लेखनीय सफलता।

तोप, रडार और ड्रोन तकनीक में प्रगति।

रक्षा निर्यात में वृद्धि।

निजी रक्षा उद्योग का विस्तार।

अंतरिक्ष और साइबर क्षमताओं का विकास।

इन उपलब्धियों से स्पष्ट है कि भारत रक्षा उद्योग की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चुनौती केवल गति और पैमाने की है।

चीन से तुलना

चीन ने 1980 के दशक से रक्षा उद्योग में निरंतर निवेश किया। प्रारंभ में उसने विदेशी तकनीक प्राप्त की, फिर उसका अध्ययन किया, संयुक्त उत्पादन किया और अंततः स्वदेशी प्रणालियाँ विकसित कीं। आज वह युद्धपोत, लड़ाकू विमान, मिसाइल, ड्रोन और अंतरिक्ष तकनीक में विश्व की अग्रणी शक्तियों में है।

भारत भी इस दिशा में आगे बढ़ सकता है, लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक निवेश, तकनीकी शिक्षा, उद्योग-शोध सहयोग और नीति की निरंतरता आवश्यक होगी।

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिली सीख

इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक युद्ध केवल महंगे प्लेटफॉर्म से नहीं, बल्कि ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर क्षमता, सटीक मिसाइलों और बड़े पैमाने पर गोला-बारूद उत्पादन से भी लड़े जाते हैं।

भारत को भविष्य के युद्धों की तैयारी के लिए रक्षा उद्योग का विस्तार करना होगा। केवल आयात या केवल स्वदेशीकरण—दोनों में से कोई भी अकेला समाधान नहीं है।

संतुलित रणनीति ही समाधान

भारत को "आत्मनिर्भरता बनाम आयात" की बहस से आगे बढ़कर "आत्मनिर्भरता के साथ क्षमता" की नीति अपनानी चाहिए।

जहाँ स्वदेशी तकनीक उपलब्ध है, वहाँ उसे प्राथमिकता मिले। जहाँ तत्काल आवश्यकता है और स्वदेशी विकल्प अभी विकसित नहीं हुए हैं, वहाँ विदेशी खरीद या संयुक्त उत्पादन में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए।

साथ ही निम्न सुधार आवश्यक हैं—

रक्षा अनुसंधान पर अधिक निवेश।

निजी उद्योग को व्यापक अवसर।

विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच सहयोग।

रक्षा खरीद प्रक्रिया का सरलीकरण।

इंजन, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर तकनीक में विशेष मिशन।

संयुक्त उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर बल।

सेना, उद्योग और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय।

निष्कर्ष

"आत्मनिर्भरता के दबाव में भारत की सैन्य प्रगति मंद हुई है"—यह कथन आंशिक रूप से सही है, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं बताता। वास्तविकता यह है कि सैन्य आधुनिकीकरण की धीमी गति के पीछे कई कारण हैं—जटिल खरीद प्रक्रिया, तकनीकी निर्भरता, अनुसंधान में सीमित निवेश, उत्पादन क्षमता की चुनौतियाँ और संसाधनों का संतुलन।

आत्मनिर्भरता स्वयं समस्या नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब उसे पर्याप्त तकनीकी तैयारी, औद्योगिक क्षमता और यथार्थवादी समयसीमा के बिना लागू किया जाता है। दूसरी ओर, यदि भारत केवल विदेशी आयात पर निर्भर रहता है, तो वह दीर्घकाल में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता खो सकता है।

इसलिए भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग वही है जिसमें स्वदेशीकरण और त्वरित सैन्य आधुनिकीकरण साथ-साथ चलें। राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतीक्षा नहीं कर सकती, और आत्मनिर्भरता अधूरी नहीं रहनी चाहिए। यही संतुलन भारत को एक सुरक्षित, सक्षम और वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति बना सकता है।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट