भारत के प्रति ट्रंप प्रशासन का बदलता रवैया: अपमान से उपेक्षा तक?

 

क्या बदल रही है भारत–अमेरिका साझेदारी की दिशा?


अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मित्रता स्थायी नहीं होती, केवल राष्ट्रीय हित स्थायी होते हैं। भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए। रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, हिंद-प्रशांत रणनीति और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों ने निकट सहयोग विकसित किया। लेकिन Donald Trump के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती संकेतों ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या वाशिंगटन की प्राथमिकताओं में भारत का स्थान बदल रहा है?


कुछ विश्लेषकों का मानना है कि शुरुआती महीनों में अमेरिका का रवैया भारत के प्रति अपेक्षाकृत कठोर और दबाव-आधारित था। व्यापार, शुल्क, बाज़ार तक पहुँच और रणनीतिक अपेक्षाओं जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक दबाव ने यह धारणा बनाई कि भारत को साझेदार से अधिक एक ऐसे देश के रूप में देखा जा रहा है, जिससे अधिक रियायतें प्राप्त की जा सकती हैं। समय बीतने के साथ कुछ पर्यवेक्षकों ने यह भी महसूस किया कि अमेरिकी प्राथमिकताओं में भारत का उल्लेख पहले की तुलना में कम प्रमुख हो गया है और ध्यान चीन, यूरोप तथा पश्चिम एशिया की ओर अधिक केंद्रित है।


हालाँकि इस निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। अमेरिका आज एक साथ कई मोर्चों पर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। चीन के साथ तकनीकी और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता, यूरोप की सुरक्षा, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और घरेलू आर्थिक चुनौतियाँ उसकी विदेश नीति को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में किसी भी साझेदार देश के साथ संबंध अधिक व्यावहारिक और लेन-देन आधारित दिखाई दे सकते हैं।


भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदेश है। विदेश नीति भावनाओं से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति से संचालित होती है। यदि भारत स्वयं आर्थिक, तकनीकी और सैन्य दृष्टि से अधिक सक्षम होगा, तो विश्व की महाशक्तियाँ उसके साथ समानता के आधार पर व्यवहार करेंगी। यदि वह केवल रणनीतिक आवश्यकता के कारण महत्वपूर्ण रहेगा, तो परिस्थितियाँ बदलने पर उसका महत्व भी बदल सकता है।


यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत-अमेरिका संबंध केवल किसी एक राष्ट्रपति या सरकार पर निर्भर नहीं हैं। रक्षा सहयोग, उच्च प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, ऊर्जा, शिक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों के साझा हित अभी भी मजबूत हैं। इसलिए यह कहना कि संबंध कमजोर हो गए हैं, अतिशयोक्ति होगी।


भारत को इस बदलते परिदृश्य से तीन प्रमुख सबक लेने चाहिए। पहला, किसी एक महाशक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना। दूसरा, रक्षा और प्रौद्योगिकी में वास्तविक आत्मनिर्भरता विकसित करना। तीसरा, अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और पश्चिम एशिया के देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना।


यदि भारत आर्थिक रूप से अधिक शक्तिशाली, तकनीकी रूप से अधिक आत्मनिर्भर और सैन्य दृष्टि से अधिक सक्षम बनता है, तो कोई भी अमेरिकी प्रशासन उसे न तो नज़रअंदाज़ कर सकेगा और न ही केवल दबाव की नीति से अपने हित साध पाएगा।


निष्कर्ष


यह कहना कि ट्रंप प्रशासन का रवैया "अपमानजनक से उपेक्षापूर्ण" हो गया है, एक राजनीतिक और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण है, न कि निर्विवाद तथ्य। अधिक सटीक निष्कर्ष यह होगा कि अमेरिकी नीति पहले की तुलना में अधिक लेन-देन आधारित और राष्ट्रीय हित केंद्रित दिखाई देती है। ऐसे वातावरण में भारत की सबसे बड़ी शक्ति किसी विदेशी समर्थन में नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक क्षमता, तकनीकी उत्कृष्टता, सैन्य तैयारी और रणनीतिक स्वायत्तता में निहित होगी। यही किसी भी महाशक्ति के साथ सम्मानजनक संबंधों का सबसे मजबूत आधार है।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट