ईरान का नया मिसाइल परीक्षण : क्या यह अमेरिकी मिसाइल का संशोधित रूप है?

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Iran लगातार अपने मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। हाल के वर्षों में ईरान ने कई नई बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइल प्रणालियों का परीक्षण किया है, जिनमें लंबी दूरी, अधिक सटीकता और भारी वारहेड क्षमता पर विशेष ध्यान दिया गया है। लेकिन एक दिलचस्प प्रश्न बार-बार उठता है—क्या ईरान की नई मिसाइलें पूरी तरह स्वदेशी हैं, या वे अमेरिकी तकनीक के संशोधित रूप हैं? 1979 की क्रांति और अमेरिकी विरासत आज का ईरान और अमेरिका कट्टर प्रतिद्वंद्वी दिखाई देते हैं, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान अमेरिका का प्रमुख सहयोगी था। शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के दौर में ईरानी सेना को बड़ी मात्रा में अमेरिकी हथियार, विमान और मिसाइल प्रणालियाँ प्राप्त हुई थीं। क्रांति के बाद जब संबंध टूट गए, तब भी ईरान के पास बड़ी मात्रा में अमेरिकी सैन्य उपकरण मौजूद थे। इसी दौर में ईरानी इंजीनियरों ने पश्चिमी तकनीकों का अध्ययन शुरू किया और कई प्रणालियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया। “कॉपी, संशोधन और स्वदेशीकरण” की रणनीति ईरान का रक्षा उद्योग लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के अधीन रहा। ऐसी स्थिति में उसके पास दो विकल्प थे— विदेशी हथियारों का इंतजार करना, या उपलब्ध तकनीकों को संशोधित करके अपना रक्षा उद्योग विकसित करना। ईरान ने दूसरा रास्ता चुना। उसने अमेरिकी, रूसी, चीनी और उत्तर कोरियाई तकनीकों का अध्ययन कर उन्हें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया। यही कारण है कि कई ईरानी हथियार प्रणालियों में विदेशी तकनीकी प्रभाव दिखाई देता है, लेकिन वे मूल प्रणालियों की सीधी प्रतिलिपि नहीं होतीं। मिसाइल कार्यक्रम की वास्तविक जड़ें ईरान के अधिकांश बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम की नींव अमेरिकी नहीं बल्कि उत्तर कोरियाई और सोवियत तकनीकी प्रभावों से जुड़ी मानी जाती है। विशेष रूप से: स्कड (Scud) आधारित प्रणालियाँ शाहाब श्रृंखला घद्र मिसाइल इमाद मिसाइल जैसी प्रणालियों में सोवियत और उत्तर कोरियाई डिजाइन की छाप देखी जाती है। हालांकि मार्गदर्शन प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ नियंत्रण तकनीकों में पश्चिमी प्रणालियों से प्रेरणा लेने की चर्चा विशेषज्ञों द्वारा की जाती रही है। नया मिसाइल परीक्षण क्या संकेत देता है? हाल के वर्षों में ईरान ने अपनी मिसाइलों में तीन प्रमुख सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया है— अधिक सटीकता (Precision) लंबी दूरी (Range) भारी वारहेड क्षमता (Payload) रिपोर्टों के अनुसार ईरान अब बड़े वारहेड और अधिक प्रभावी प्रहार क्षमता वाली मिसाइलों पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी की ईरानी मिसाइलों में कई विदेशी तकनीकी अवधारणाओं का प्रभाव हो सकता है, लेकिन उन्हें सीधे अमेरिकी मिसाइलों की प्रतिलिपि कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। अमेरिकी मिसाइल का संशोधित रूप—कितनी सच्चाई? यह दावा अक्सर राजनीतिक बहसों और मीडिया चर्चाओं में दिखाई देता है, लेकिन अधिकांश मामलों में स्थिति अधिक जटिल होती है। आधुनिक मिसाइल तकनीक में कई सामान्य सिद्धांत होते हैं— मार्गदर्शन प्रणाली वायुगतिकीय डिजाइन प्रणोदन तकनीक नियंत्रण सतहें इसलिए दो मिसाइलों में समानता दिखाई देने का अर्थ यह नहीं कि एक दूसरी की सीधी नकल है। ईरान ने दशकों तक विभिन्न स्रोतों से प्राप्त तकनीकी अनुभवों को मिलाकर अपना मॉडल विकसित किया है। असली चिंता क्या है? अमेरिका और उसके सहयोगियों की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि ईरानी मिसाइलें अमेरिकी डिजाइन से प्रेरित हैं या नहीं। चिंता इस बात की है कि ईरान का मिसाइल भंडार लगातार अधिक उन्नत और अधिक सटीक होता जा रहा है। विश्लेषणों के अनुसार ईरान अभी भी पश्चिम एशिया के सबसे बड़े और विविध मिसाइल भंडारों में से एक रखता है। अमेरिकी खुफिया आकलनों में भी संकेत मिले हैं कि हालिया संघर्षों के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल अवसंरचना का बड़ा हिस्सा पुनः सक्रिय करने में सफल रहा है। निष्कर्ष ईरान के नए मिसाइल परीक्षण को केवल “अमेरिकी मिसाइल का संशोधित रूप” कह देना पूरी तस्वीर नहीं बताता। ईरानी मिसाइल कार्यक्रम दशकों की तकनीकी उधारी, इंजीनियरिंग संशोधनों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय विकास का मिश्रण है। इसमें अमेरिकी, सोवियत, उत्तर कोरियाई और चीनी तकनीकी प्रभावों के विभिन्न स्तर दिखाई दे सकते हैं, लेकिन आज की अधिकांश प्रमुख ईरानी मिसाइलें अपने अलग परिचालन स्वरूप और डिजाइन के साथ विकसित की गई हैं। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि मिसाइल की मूल प्रेरणा कहाँ से आई, बल्कि यह है कि ईरान ने प्रतिबंधों और दबावों के बावजूद ऐसी क्षमता विकसित कर ली है जो आज पश्चिम एशिया के सामरिक संतुलन को सीधे प्रभावित करती है। यही कारण है कि ईरान का हर नया मिसाइल परीक्षण केवल तकनीकी घटना नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक संदेश भी माना जाता है।

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