विश्व राजनीति में भारत क्यों अब भी 'अछूत' जैसा व्यवहार झेलता है?

 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, G7 और वैश्विक शक्ति-संरचना का विश्लेषण


भारत आज विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, परमाणु शक्ति है, अंतरिक्ष कार्यक्रम में अग्रणी है और वैश्विक दक्षिण (Global South) की महत्वपूर्ण आवाज़ माना जाता है। इसके बावजूद भारत को आज भी United Nations Security Council की स्थायी सदस्यता नहीं मिली है। वह Group of Seven का भी स्थायी सदस्य नहीं है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या विश्व राजनीति में भारत के साथ "अछूत" जैसा व्यवहार हो रहा है?


"अछूत" शब्द राजनीतिक दृष्टि से एक रूपक है, क्योंकि भारत को वैश्विक मंचों से बाहर नहीं रखा गया है। वह Group of Twenty, BRICS, Shanghai Cooperation Organisation और Quad जैसे महत्वपूर्ण मंचों का सदस्य है। इसलिए अधिक सटीक प्रश्न यह है कि भारत को उसकी बढ़ती शक्ति के अनुरूप प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला?


1. द्वितीय विश्व युद्ध की विरासत


संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना 1945 की शक्ति-व्यवस्था को दर्शाती है। सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य उस समय के विजेता देशों पर आधारित हैं। तब भारत स्वतंत्र भी नहीं था। आज विश्व बदल चुका है, लेकिन संस्थागत ढाँचा लगभग वैसा ही है।


2. वीटो राजनीति


सुरक्षा परिषद में किसी भी बड़े सुधार के लिए मौजूदा स्थायी सदस्यों की सहमति आवश्यक है। उनमें से प्रत्येक के अपने भू-राजनीतिक हित हैं। इसलिए सुधार पर व्यापक सहमति बनना कठिन रहा है।


3. G7 का स्वरूप


G7 कोई वैश्विक प्रतिनिधि संस्था नहीं, बल्कि विकसित औद्योगिक लोकतांत्रिक देशों का समूह है। इसकी सदस्यता ऐतिहासिक और राजनीतिक कारणों से बनी है, न कि केवल जनसंख्या या वर्तमान आर्थिक आकार के आधार पर। भारत को कई बार अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है, लेकिन वह इसका स्थायी सदस्य नहीं है।


4. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता


भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय "रणनीतिक स्वायत्तता" की नीति अपनाता है। वह अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और पश्चिम एशिया—सभी के साथ संबंध रखता है। यह नीति भारत को लचीलापन देती है, लेकिन कुछ पश्चिमी देशों की दृष्टि में उसे पूर्ण रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखना कठिन भी बना सकती है।


5. क्षेत्रीय राजनीति


भारत की स्थायी सदस्यता का कुछ देश विरोध करते रहे हैं। क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और विभिन्न देशों के हित भी इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं।


6. क्या भारत वास्तव में हाशिए पर है?


यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत वैश्विक राजनीति में हाशिए पर है। पिछले दो दशकों में उसका प्रभाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है—


वैश्विक आर्थिक महत्व बढ़ा है।


हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी भूमिका मजबूत हुई है।


अनेक देशों के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ा है।


जलवायु, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और विकास जैसे विषयों पर उसकी आवाज़ अधिक प्रभावशाली हुई है।



भारत के लिए सबसे बड़ा सबक


विश्व व्यवस्था में सम्मान केवल नैतिक दावों से नहीं, बल्कि शक्ति, आर्थिक क्षमता, तकनीकी नेतृत्व और कूटनीतिक प्रभाव से मिलता है। यदि भारत अपनी अर्थव्यवस्था, रक्षा, विज्ञान और नवाचार को लगातार मजबूत करता है, तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर सुधार का दबाव भी बढ़ेगा।


निष्कर्ष


भारत के साथ "अछूत" जैसा व्यवहार हो रहा है, यह कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि वर्तमान वैश्विक संस्थाएँ आज की शक्ति-संतुलन को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करतीं। भारत का बढ़ता महत्व और उसे न मिलने वाला समान प्रतिनिधित्व, दोनों के बीच एक स्पष्ट असंतुलन है।


वास्तविक चुनौती केवल United Nations Security Council की स्थायी सदस्यता या Group of Seven में स्थान प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसी आर्थिक, तकनीकी और सामरिक शक्ति बनना है कि वैश्विक संस्थाएँ स्वयं भारत की भूमिका को नज़रअंदाज़ न कर सकें। यही दीर्घकालिक और टिकाऊ मार्ग है।

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