अमेरिका-ईरान युद्ध : पाकिस्तान मध्यस्थ या सौदागर?

पश्चिम एशिया में चल रहे अमेरिका-ईरान तनाव और युद्धविराम प्रयासों के बीच एक देश अचानक वैश्विक कूटनीति के केंद्र में दिखाई देने लगा है—Pakistan। सवाल यह है कि पाकिस्तान वास्तव में शांति का मध्यस्थ है या इस संकट को अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए अवसर में बदलने वाला एक सौदागर? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच कई अप्रत्यक्ष वार्ताओं, संघर्षविराम प्रस्तावों और इस्लामाबाद वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका लगातार बढ़ी है। पाकिस्तान अचानक इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया? पाकिस्तान की स्थिति अनोखी है। उसकी सीमा ईरान से लगती है। उसके संबंध अमेरिका से भी रहे हैं। वह चीन का रणनीतिक साझेदार है। खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब और कतर, से भी उसके गहरे संबंध हैं। इसी कारण वह कई विरोधी ध्रुवों के बीच संवाद का माध्यम बन सका। कई रिपोर्टों के अनुसार इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेशों के आदान-प्रदान तथा संघर्षविराम प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई। मध्यस्थ की भूमिका पाकिस्तान ने स्वयं को युद्ध रोकने वाले देश के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। रिपोर्टों के अनुसार अप्रैल 2026 के संघर्षविराम और बाद की वार्ताओं में पाकिस्तान ने संवाद मंच उपलब्ध कराया तथा दोनों पक्षों के बीच संचार बनाए रखने में भूमिका निभाई। यदि इस दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता दिखाई देता है। लेकिन क्या केवल मध्यस्थ? यहीं से दूसरा प्रश्न शुरू होता है। हर मध्यस्थ पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता। कई बार मध्यस्थता स्वयं एक रणनीतिक निवेश होती है। पाकिस्तान के सामने उस समय कई चुनौतियाँ थीं— आर्थिक संकट, ऊर्जा असुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय प्रभाव में कमी, और क्षेत्रीय प्रासंगिकता बनाए रखने की आवश्यकता। ऐसे में अमेरिका-ईरान संकट में सक्रिय भूमिका उसे अचानक वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ले आई। कूटनीति के बदले रणनीतिक लाभ? कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस भूमिका के माध्यम से कई लाभ प्राप्त करना चाहता है— 1. अमेरिका के साथ संबंध सुधारना अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद पाकिस्तान का रणनीतिक महत्व कम हुआ था। अमेरिका-ईरान वार्ता में भूमिका निभाकर इस्लामाबाद फिर से वॉशिंगटन के लिए उपयोगी बनना चाहता है। 2. आर्थिक लाभ यदि पाकिस्तान क्षेत्रीय संवाद का केंद्र बनता है तो उसे निवेश, सहायता और कूटनीतिक समर्थन मिल सकता है। 3. चीन के हित चीन और पाकिस्तान ने हाल ही में अपने रणनीतिक सहयोग और क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत करने की बात की है। बीजिंग ने भी पाकिस्तान की मध्यस्थता की सराहना की है। इसलिए कुछ विश्लेषक मानते हैं कि पाकिस्तान केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं बल्कि चीन की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का भी एक माध्यम बन सकता है। क्या सभी पाकिस्तान पर भरोसा करते हैं? नहीं। अमेरिकी राजनीतिक वर्ग के भीतर भी पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह मौजूद है। अमेरिकी सीनेटर Lindsey Graham ने पाकिस्तान की मध्यस्थता को "समस्याग्रस्त" बताया और उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए। इसका कारण पाकिस्तान के ईरान, चीन, खाड़ी देशों और इस्लामी दुनिया के साथ जटिल संबंध हैं। ईरान की नजर से पाकिस्तान ईरान पाकिस्तान को पूरी तरह निष्पक्ष शक्ति के रूप में नहीं देखता, लेकिन वह उसे उपयोगी संवाद-सेतु मानता है। हाल की रिपोर्टों में कहा गया कि वार्ता रुकने के बावजूद तेहरान पाकिस्तान के संपर्क में बना हुआ है। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। भारत के दृष्टिकोण से India के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। यदि पाकिस्तान पश्चिम एशिया की कूटनीति में स्थायी भूमिका हासिल कर लेता है तो उसका क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ सकता है। लेकिन भारत की अपनी ताकतें भी हैं— ऊर्जा बाजार में बड़ी भूमिका, खाड़ी देशों से मजबूत संबंध, वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ता प्रभाव, और बहुध्रुवीय विदेश नीति। इसलिए भारत के लिए चुनौती पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि अपनी रणनीतिक उपस्थिति को और मजबूत करना है। मध्यस्थ और सौदागर के बीच की रेखा वास्तविकता यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शुद्ध मध्यस्थ बहुत कम होते हैं। अधिकांश देश शांति प्रयासों के साथ अपने हित भी साधते हैं। इस दृष्टि से पाकिस्तान न तो पूरी तरह निष्पक्ष मध्यस्थ है और न ही केवल अवसरवादी सौदागर। वह एक ऐसा देश है जो संकट को कूटनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। निष्कर्ष "अमेरिका-ईरान युद्ध में पाकिस्तान मध्यस्थ है या सौदागर?"—इसका उत्तर शायद दोनों के बीच कहीं मौजूद है। पाकिस्तान ने वास्तव में संवाद के रास्ते खोलने और संघर्षविराम प्रयासों में भूमिका निभाई है। लेकिन साथ ही उसने इस भूमिका का उपयोग अपनी क्षेत्रीय और वैश्विक प्रासंगिकता बढ़ाने के लिए भी किया है। भू-राजनीति में अक्सर शांति भी एक रणनीतिक निवेश होती है। इसलिए पाकिस्तान को केवल मध्यस्थ या केवल सौदागर कहना वास्तविकता को सरल बना देना होगा। वह फिलहाल दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है—एक ऐसा खिलाड़ी जो युद्ध रोकने की मेज पर बैठा है, लेकिन उस मेज से अपने लिए लाभ भी तलाश रहा है।

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