भारत: प्रतिभाओं की कब्रगाह — आपदा में अवसर से आपदा की अर्थव्यवस्था तक
भारत: प्रतिभाओं की कब्रगाह — आपदा में अवसर से आपदा की अर्थव्यवस्था तक
जब प्रतिभा व्यवस्था से हार जाती है और आक्रामकता लोकतंत्र व अर्थव्यवस्था को कमजोर करती है
परिचय: दो बड़ी त्रासदियाँ
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है। फिर भी यह सवाल बार-बार उठता है — क्या हम अपनी प्रतिभाओं को सही मंच दे पा रहे हैं? दूसरी ओर, "आपदा में अवसर" जैसे नारों के पीछे आर्थिक नीतियों और राजनीतिक शैली ने कितना नुकसान किया है? इन दोनों मुद्दों का गहरा संबंध है।
प्रतिभाओं की कब्रगाह: वास्तविकता या अतिशयोक्ति?
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। हर साल लाखों युवा IIT, IIM, NEET, UPSC जैसी परीक्षाओं में सफल होते हैं। लेकिन बहुत से प्रतिभाशाली लोग अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पाते। शिक्षा प्रणाली रट्टा मारने पर आधारित है। विश्वविद्यालयों में मौलिक शोध की जगह डिग्री और नौकरी की होड़ है।
शिक्षा, नौकरशाही और सामाजिक बाधाएँ
स्कूलों में प्रश्न पूछने वाले बच्चे को अक्सर अनुशासनहीन कहा जाता है। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरशिप में वरिष्ठता मेरिट से ज्यादा महत्व रखती है। नौकरशाही नवाचार को रोके रखती है। जाति, क्षेत्र, परिवार और राजनीतिक संपर्क अभी भी अवसरों को प्रभावित करते हैं।
राजनीति में प्रतिभा का संकट
वंशवाद, व्यक्तिपूजा और चाटुकारिता ने योग्य नेतृत्व को पीछे धकेला है। स्वतंत्र विचारक राजनीति से दूर रहते हैं। परिणामस्वरूप नीति निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
आपदा में अवसर: एक विवादित नारा
कोविड महामारी के दौरान "आपदा में अवसर" का नारा दिया गया। इसका मतलब आत्मनिर्भरता और नवाचार था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि कई नीतियाँ संकट को और गहरा करती गईं। अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी, निजी निवेश की कमी और उपभोग में गिरावट देखी गई।
आक्रामक राजनीति का आर्थिक प्रभाव
आधुनिक विश्व में विदेशी निवेशक स्थिरता, कानून का शासन और संस्थागत विश्वसनीयता देखते हैं। अत्यधिक ध्रुवीकरण, आक्रामक राष्ट्रवाद और अप्रत्याशित नीतियाँ निवेशकों को डराती हैं। लोकतंत्र मजबूत हो तो अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है।
भारत के सामने चुनौतियाँ और समाधान
- शिक्षा में रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा
- शोध एवं विकास पर GDP का कम से कम 2% खर्च
- विश्वविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता
- मेरिट-आधारित अवसर, वंशवाद पर अंकुश
- नौकरशाही को सरल और नवाचार-अनुकूल बनाना
- लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना
- आर्थिक नीतियों में स्थिरता और पूर्वानुमेयता
निष्कर्ष
किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी प्रतिभाएँ हैं। यदि हम प्रतिभाओं को कब्र में दफनाते रहे और आक्रामकता को आर्थिक रणनीति बनाते रहे, तो "विश्वगुरु" और "विकसित भारत" के सपने अधूरे रह जाएंगे।
सच्ची महाशक्ति वह है जो अपनी युवा प्रतिभाओं को सम्मान दे, उन्हें उड़ान दे और लोकतांत्रिक स्थिरता के बल पर विश्वास अर्जित करे।










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