भारत का अंतरराष्ट्रीय ग्राफ क्यों गिर रहा है?

चीन और रूस के बीच संतुलन की रस्सी कमजोर पड़ी और भारत की एक अवसरवादी, आक्रामक छवि गढ़ दी गई 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत को विश्व राजनीति में एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जा रहा था। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, तीव्र आर्थिक विकास, डिजिटल क्रांति और वैश्विक मंचों पर बढ़ती सक्रियता ने भारत को एक नए आत्मविश्वास से भर दिया था। लेकिन हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की छवि को लेकर कई प्रश्न उठने लगे हैं। विशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन के साथ बढ़ते तनाव, पश्चिमी देशों के साथ गहरे होते संबंध और पड़ोसी देशों में घटते प्रभाव के कारण भारत की विदेश नीति पर बहस तेज हुई है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत की पारंपरिक "रणनीतिक स्वायत्तता" की नीति कमजोर हुई है और चीन तथा रूस के बीच संतुलन साधने वाली रस्सी अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। इसके साथ ही वैश्विक मीडिया और कुछ कूटनीतिक हलकों में भारत की एक "अवसरवादी" तथा "आक्रामक" शक्ति की छवि भी निर्मित हुई है। यह धारणा कितनी सही है और इसके पीछे कौन से कारण हैं, इसकी गंभीर समीक्षा आवश्यक है। गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता तक स्वतंत्रता के बाद भारत ने शीत युद्ध के दौर में किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया। भारत की विदेश नीति का मूल आधार था—राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक संतुलन बनाए रखना। सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद भारत ने पश्चिम से संवाद बनाए रखा। शीत युद्ध समाप्त होने के बाद भी भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और विकासशील देशों के साथ समानांतर संबंधों को प्राथमिकता दी। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह संतुलन चुनौतीपूर्ण हो गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की दुविधा 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत एक कठिन कूटनीतिक स्थिति में फंस गया। एक ओर रूस दशकों से भारत का विश्वसनीय रक्षा साझेदार रहा है, दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय देश भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक एवं तकनीकी सहयोगी बन चुके हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ कई प्रस्तावों पर मतदान से दूरी बनाई और सस्ता रूसी तेल खरीदना जारी रखा। भारत ने इसे अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय बताया। हालांकि पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से ने इसे नैतिक तटस्थता के बजाय अवसरवाद के रूप में प्रस्तुत किया। यह धारणा बनी कि भारत युद्ध की परिस्थितियों का लाभ उठाकर सस्ता तेल खरीद रहा है और दोनों पक्षों से लाभ लेने की कोशिश कर रहा है। यद्यपि भारत का तर्क था कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की प्राथमिक आवश्यकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विमर्श में यह संदेश उतनी प्रभावी ढंग से स्थापित नहीं हो पाया। रूस का झुकाव चीन की ओर रूस-यूक्रेन युद्ध का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस आर्थिक और रणनीतिक रूप से चीन पर अधिक निर्भर हो गया। एक समय रूस भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार था। लेकिन अब रूस और चीन की बढ़ती निकटता भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन भारत का प्रमुख सामरिक प्रतिद्वंद्वी है और दोनों देशों के बीच सीमा विवाद लगातार तनाव पैदा करते रहे हैं। रूस पहले भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की स्थिति में था, लेकिन अब वह स्वयं चीन के प्रभाव क्षेत्र में जाता दिखाई देता है। इससे भारत की कूटनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हुई है। चीन के साथ बढ़ता टकराव 2020 की गलवान घाटी की घटना ने भारत-चीन संबंधों में गहरा अविश्वास पैदा कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव लगातार बना हुआ है। भारत ने चीन के खिलाफ आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंधों का सहारा लिया, चीनी ऐप्स पर रोक लगाई और सीमा क्षेत्रों में सैन्य तैनाती बढ़ाई। इसके समानांतर भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ चतुष्कोणीय सुरक्षा समूह (QUAD) में सक्रिय भूमिका निभाई। चीन ने इसे अपने विरुद्ध घेराबंदी की रणनीति के रूप में देखा। परिणामस्वरूप एशिया में प्रतिस्पर्धा और तीव्र हुई। विश्व राजनीति में जब कोई देश लगातार सैन्य शक्ति और सुरक्षा मुद्दों पर जोर देता है, तो उसकी छवि एक "आक्रामक शक्ति" के रूप में भी बन सकती है। भारत के साथ यही चुनौती दिखाई देने लगी है। पड़ोस में घटता प्रभाव भारत की विदेश नीति की एक बड़ी परीक्षा उसके पड़ोसी देशों में प्रभाव बनाए रखने की रही है। Nepal, Sri Lanka, Bangladesh और Maldives जैसे देशों में चीन का आर्थिक प्रभाव लगातार बढ़ा है। बेल्ट एंड रोड परियोजना के माध्यम से चीन ने दक्षिण एशिया में बड़े पैमाने पर निवेश किया। कई देशों ने चीन से बुनियादी ढांचे के लिए ऋण और सहायता प्राप्त की। भारत अब भी क्षेत्रीय स्तर पर सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यह धारणा मजबूत हुई है कि वह अपने पड़ोस में पहले जैसा प्रभाव नहीं रखता। इससे उसकी क्षेत्रीय नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठते हैं। पश्चिम के साथ बढ़ती निकटता भारत और अमेरिका के संबंध पिछले एक दशक में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। United States के साथ रक्षा समझौते, तकनीकी सहयोग, सेमीकंडक्टर साझेदारी और इंडो-पैसिफिक रणनीति में सहयोग बढ़ा है। हालांकि इसके साथ यह आलोचना भी उभरती है कि भारत अपनी पारंपरिक स्वतंत्र विदेश नीति से हटकर पश्चिमी खेमे के अधिक निकट दिखाई दे रहा है। यद्यपि भारत किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है, फिर भी रूस और चीन दोनों में यह धारणा बढ़ी है कि नई दिल्ली पश्चिमी रणनीति का अप्रत्यक्ष सहयोगी बनती जा रही है। क्या वास्तव में भारत का अंतरराष्ट्रीय ग्राफ गिर रहा है? यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि भारत का अंतरराष्ट्रीय ग्राफ पूरी तरह गिर रहा है। भारत आज भी: विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। जी-20 की महत्वपूर्ण शक्ति है। वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ बनने का दावा करता है। डिजिटल तकनीक और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ रखता है। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक आवश्यक शक्ति माना जाता है। लेकिन समस्या छवि की है। भारत स्वयं को संतुलित, जिम्मेदार और स्वतंत्र शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, जबकि उसके आलोचक उसे अवसरवादी और क्षेत्रीय रूप से आक्रामक राष्ट्र के रूप में चित्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। कूटनीति में वास्तविक शक्ति जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी धारणा भी होती है। आगे का रास्ता भारत को अपनी विदेश नीति में कुछ महत्वपूर्ण संतुलन पुनः स्थापित करने होंगे— रूस के साथ ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखना। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते खुले रखना। अमेरिका और पश्चिम के साथ सहयोग करते हुए रणनीतिक स्वतंत्रता की छवि बचाए रखना। दक्षिण एशिया में विश्वास और सहयोग आधारित नेतृत्व को मजबूत करना। वैश्विक मंचों पर अपने निर्णयों का प्रभावी नैरेटिव प्रस्तुत करना। निष्कर्ष भारत आज एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। वह न तो शीत युद्ध काल का कमजोर विकासशील देश है और न ही अभी पूर्ण वैश्विक महाशक्ति बना है। इस बीच की स्थिति में उसे अनेक विरोधाभासों का सामना करना पड़ रहा है। चीन और रूस के बीच संतुलन की रस्सी वास्तव में पहले की तुलना में कमजोर हुई है। रूस का चीन की ओर झुकाव और भारत का पश्चिम के साथ बढ़ता सहयोग नई चुनौतियाँ पैदा कर रहा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत की एक अवसरवादी तथा आक्रामक छवि गढ़ी जा रही है। किन्तु यह अंतिम सत्य नहीं है। यदि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, पड़ोसी देशों के साथ विश्वास और बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूत करने में सफल होता है, तो वह न केवल अपनी छवि सुधार सकता है बल्कि 21वीं सदी की विश्व व्यवस्था में निर्णायक भूमिका भी निभा सकता है।

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